मुज़फ्फरनगर दंगों की पृष्ठभूमि में अरुण कुमार अपना एक सोचा समझा “प्रोजेक्शन” कर रहे हैं

Abhishek Upadhyay : यूपी की निलंबित आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ वास्तविक हमदर्दी महसूस होती थी और होती है, पर यूपी के एडीजी लॉ एंड आर्डर आईपीएस अरूण कुमार के साथ………एक हजार किलोमीटर दूर तक भी नहीं…….। मुज़फ्फरनगर दंगों की पृष्ठभूमि में अरुण कुमार अपना एक सोचा समझा "प्रोजेक्शन" कर रहे हैं कि वो एक सताए हुए मगर तेज तर्रार अफसर हैं। उन्हें यूपी सरकार कानून व्यवस्था ठीक करने का मौका नहीं दे रही है। उनके हाथ बंधे हुए हैं….आदि आदि….पर इनमें से एक भी बात वास्तविकता के तराजू पर खरी साबित नहीं होती है। नवंबर 2012 में अरूण कुमार ने एडीजी लॉ एंड आर्डर के मलाइदार ओहदे को हासिल कर लिया। इतना ही नहीं, उन्हें एसटीएफ और एटीएस जैसे महत्वपूर्ण महकमों का जिम्मा भी सौंपा गया।

इससे पहले वे एडीजी टेक्निकल सर्विस हुआ करते थे। पिछले 10-11 महीनो के अपने कार्यकाल में अरूण कुमार कानून व्यवस्था के मोर्चे पर बुरी तरह विफल रहे हैं। एटीएस और एसटीएफ यूपी में हैं भी, इस पर लोगों को शक होने लगा। कोई उपलब्धि नहीं, कोई खास एक्टिविटी नहीं। एक तो समाजवादी पार्टी की सरकार में जो अधिकारी एडीजी कानून व्यवस्था जैसा मलाईदार पद हासिल कर लेता है और वह भी जगमोहन यादव जैसे मुलायम के दुलारे आईपीएस को हटाकर, उसकी काबिलियत वैसे ही संदेह के घेरे में आ जाती है। दूसरे अरूण कुमार ने एडीजी के अपने कार्यकाल में एक भी ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे उनकी सख्ती या सक्षमता का पता चलता हो। पूरे कार्यकाल में वे सिर्फ अपने राजनीतिक आकाओं को सलाम ठोंकते रहे। अब जब इस बेहद ही बुरी परफारमेंस की गाज गिरने का वक्त आया है, तो उन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति यानि सेंट्रल डेप्युटेशन याद आ रही है। अरुण कुमार मुझे कभी भी सक्षम अधिकारी नहीं लगे।

उनका एक ग्लैमर था, जो मीडिया ने बनाया था, जो मीडिया का बनाया हुआ था। यूपी के कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर में जिस तरह से सर्विलांस तकनीकी व उपकरणों का इस्तेमाल किया गया, उसने उस वक्त यूपी एसटीएफ की अगुवाई कर रहे अरुण कुमार को बहुत शोहरत दी। उन पर "सहर" नाम की फिल्म भी बनी। अरूण कुमार के किरदार को अरशद वारसी ने निभाया था। उस फिल्म में भी गैंगस्टर श्री प्रकाश शुक्ला के किरदार में अभिनेता सुशांत सिंह अरशद वारसी पर बहुत भारी पड़े थे। जानकारों की माने तो रियाल लाइफ स्टोरी का भी यही हाल था। श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर को लेकर आज भी खासा विवाद है कि ये वास्तव में एनकाउंटर था या फिर सब कुछ पहले से "फिक्स" था।

अरुण कुमार एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने जब सीबीआई में रहते हुए, आरुषि कांड की जांच की कमान उन्हें सौंपी गई। अरुण कुमार यहां भी सिस्टम के साथ खडे हो गए और पूरी जांच की दिशा की "ऐसी कम तैसी" कर दी। बेचारी आरुषी को इंसाफ मिलने की सारी उम्मीद ही ग्लूकोज वाले पानी के साथ गटक कर पी गए। गरीब नौकरों को अरुण कुमार की अगुवाई में फंदे में ले लिया गया और रसूखदारों को सिरे से बाहर रखने का रास्ता साफ कर दिया गया। अरुण कुमार के साथ दिक्कत यही है कि उनके पास जमीन पर करने या दिखाने को अधिक कुछ नहीं है। मगर राजनीतिक होशियारी में बहुत कम ही अधिकारी उनके समकक्ष होंगे। यही वजह है कि अब जब पिछले दस ग्यारह महीनों के किए धरे को काटने का वक्त आया तो बड़ी सफाई से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का पासा फेंककर सहानुभूति की फसल पका ली। क्या अरुण कुमार आज ये साफ करेंगे कि जिस सरकार में कभी भी कानून व्यवस्था कायम नहीं रही और न रहनी थी, उस सरकार में उन्हें एडीजी कानून व्यवस्था का ये मलाईदार रूतबा कैसे हासिल हो गया? अगर उनकी सक्षमता को देखते हुए अखिलेश सरकार ने ये फैसला लिया तो एक भी उदाहरण बता दें जब उन्होंने नेताओं की इच्छा के आगे समर्पण करने की जगह अपनी सक्षमता का परिचय देने की कोशिश की है। अगर ये सच है कि मुजफ्फरनगर के एसएसपी सुभाष दूबे को हटाने के मुद्दे पर वो आहत हैं, तो उसी वक्त इसका विरोध क्यों नहीं किया? वे तो खुद मुज़फ्फरनगर पहुंच गए थे या पहुंचा दिए गए थे हालात पर काबू पाने की खातिर, मगर वहां भी वे मीडिया के कैमरों के आगे सुबह, शाम, दोपहर और रात सिर्फ चेहरा ही चमकाते दिखे।

हिंसा और तनाव मुज़फ्फर नगर के गावों में फैला था, मगर अरुण कुमार और उनकी पुलिस पूरे वक्त शहर में कर्फ्यू लगाकर सूनी सड़कों पर अपनी ताकत का इज़हार करती रही। अखबारों के पन्ने और टीवी चैनलों की स्क्रीन आज भी इस तरह के बयानों से भरी पूरी है कि कवाल से लेकर फुगाना, कुटबा-कुटबी और दुलेहरा तक मुज़फ्फरनगर के गांवों में पुलिस तब पहुंची जब "खेल" हो चुका था। यानि रोम जल रहा था और "नीरो" टीवी चैनलों खासकर अंग्रेजी चैनलों पर कानून व्यवस्था चुस्त कर देने की बंशी बजा रहा था। अरुण कुमार जब मुज़फ्फरनगर पहुंचे, उस वक्त तक भड़काऊ भाषण देकर मुज़फ्फरनगर समेत पूरे पश्चिमी यूपी को दंगे की आग में झोंकने की साजिश रचने वाले बीजेपी, सपा, बीएसपी और कांग्रेसी नेताओं के नाम सरेआम हो चुके थे। मगर अरुण कुमार ने किसी को हाथ तक नहीं लगाया। बड़े ईमानदार और सक्षम थे तो एक राई रत्ती भर का भी स्टैंड क्यों नहीं लिया? हर बात में सरकार के राजनीतिक नफा-नुकसान के साझीदार बने रहे। दोनो कदम मिलाकर और जमीन पर जोर से जूते पटककर अपने राजनीतिक आकाओं को "यस सर" कहते रहे। मगर सरकार तो सरकार होती है, जब खुद की गर्दन पर तलवाल लटक जाए तो जगमोहन यादव भी किनारे कर दिए जाते हैं और गुजरात के एनकाउंटर किंग डीजी वंजारा भी जेल में ठूंस दिए जाते हैं। कोई नजर तक नहीं घुमाता है।

मेरी नजर में आज भी दुर्गा शक्ति नागपाल जैसी तेज तर्रार और ईमानदार अधिकारी की बहुत इज्जत है, जिन्हें खनन माफिया पर कार्यवाही के बदले में मस्जिद की दीवाल गिराने के पूरी तरह झूठे और फर्जी मामले में निलंबित कर दिया गया और जो आज तक अपनी पोस्टिंग का इंतजार कर रही हैं। मगर यूपी के ये एडीजी अरुण कुमार जिनके कार्यकाल में मुज़फ्फरनगर जैसा भयानक दंगा हुआ, प्रदेश की कानून व्यवस्था के परखच्चे उड़ गए, अपनी भयानक नाकामी को अब अपनी शहादत के पर्दे में छिपाकर केंद्र सरकार में अगली मलाईदार पोस्टिंग हथियाने की जुगत में है। उनका अचानक छुट्टी पर चले जाना, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा की खबर लीक होना, उनके अचानक ही नेताओं से मर्माहत होने की खबर सामने आने के मायने क्या हैं, हर कोई समझता है। यूपी के आईजी ला एंड आर्डर आरके विश्वकर्मा हाल ही में प्रमोट होकर एडीजी बने हैं। ये बात क्या समझ में नहीं आती है। अरुण कुमार की असम्मानजनक विदाई का वक्त अब आ पहुंचा था, सो आरूषि कांड के मशहूर जांचकर्ता ने लगे हाथ एक और दांव खेल दिया। वाकई, राजनेताओं को तो अफसरों से सीखना चाहिए कि राजनीति कैसी की जाती है:)

अभिषेक उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *