”मुझे तो यह भी नहीं पता कि जनसंदेश किस ग्रुप का है और इसका संपादन कौन करता है?”

पत्रकारों की दुनियां में लोकप्रिय साइट्स कुछ भी लिख सकते हैं। इनमें भड़ास जरूर अपवाद है। मैंने आज सुबह अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि २००९ में मायावती सरकार के करीबी एक कारपोरेट घराने ने मुझे बुलाया और अनुरोध किया कि मैं उनके लिए उत्तर प्रदेश के लगभग सभी बड़े शहरों से अखबार निकलवा दूं। वह बड़ा कारपोरेट घराना था और यूपी, यूके तथा एमपी में उसका इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र से लेकर भवन निर्माण तक का कारोबार है। उनके लगभग सारे शहरों में अपने विशालकाय भवन हैं।

वे अपने अखबार का मुख्यालय नोएडा में रखना चाहते थे। मैंने उनसे कहा कि मैं इसी शर्त पर रहूंगा कि मेरे काम में कोई दखल नहीं देगा। मालिक तो राजी थे लेकिन उनके दो सहयोगी जिनमें से एक उत्तर प्रदेश में मैनपुरी समेत कई जिलों का कलेक्टर रह चुका था तथा दूसरा राजस्थान से था और भारत सरकार के रेवेन्यू विभाग से रिटायर था, ने मेरे इस आग्रह को नहीं माना और वीटो लगा दिया। मेरे काम करने का तरीका अलग है मैं उसमें प्रबंधन का अनावश्यक हस्तक्षेप बरदाश्त नहीं कर सकता। पत्रकारिता मेरे लिए एक ध्येय है कोई पैसा कमाने का जरिया नहीं। मैं मेहनतकश हूं इसलिए पैसा कमाना चाहूं तो और भी कुछ कर सकता था। इसलिए मैने उनसे विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। बाद में उस ग्रुप ने अखबार नहीं निकाला और कहा कि आप राजी नहीं तो हम भी नहीं निकालेंगे।

अब मजा देखिए कि इस पोस्ट को भड़ास ने तो जस का तस छापा लेकिन अभी मुझे किसी ने बताया कि जनसत्ता एक्सप्रेस ने लिखा है कि जनसंदेश ने पहले शंभूनाथ शुक्ला को अखबार निकालने के लिए आमंत्रित किया था। मुझे तो यह भी नहीं पता कि जनसंदेश किस ग्रुप का है और इसका संपादन कौन करता है? कृपया वही छापें जो मैं कह रहा हूं।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वॉल से साभार.

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