मुसलमानों के विकास में बाधक रहे बिरादरी वाले

सच्चा मुसलमान वतन के लिए कुर्बान होता है। यहां तक कि हिन्दू से भी ज्यादा हमदर्द होता है। उसकी गरीबी के कारणों में उसकी मजहबी कट्रता भी शामिल है। सबसे ज्यादा वह अपनी बिरादरी में ऊँचे पर बैठे लोगों द्वारा ही ठगा गया है। स्वारथी लोगों ने इस वर्ग को गलत रास्ते पर ढ़केल दिया। जिससे कि वह जीवन भर अपनों से ही अपनी गुलामी करा सकें। आज वही हुआ अपने आप तो काफी आगे चले गए अपनों को अपने पीछे ही रखा। फिर भी मुसलमान अपने जातिवादी प्रेम विचार धारा के चक्रव्यूह को नहीं तोड़ सका। जिससे मुसलमान अपने उस मुकाम तक नहीं पहुँच सका जहाँ तक उसको पहुँचना चाहिए था।
ग्रामीण पत्रकार होने के नाते शहरी और उच्चस्तरीय जाति बिरादरी के मसलों पर अनुभव हीन हूँ। मेरे भी मन में मुसलमानों के प्रति भावनाओं का जो गुबार था अनुभव देखा सुना और परखा था उसको बयाँ कर रहा हूँ। पत्रकारिता के दौरान तमाम ऐसे लोगों से मिलने और बात करने का मौका मिला जिनसे बातों ही बातों में उनके भाव देखे सुने और अपनी बात उनसे मुँह खोलकर नहीं कह पाया। जीवन का दुर्भाग्य कहिए कि जो बात मन में रही वह वह बाहर नहीं आ सकी। क्योंकि बात बाहर होती तो हम अन्दर होते जिनके लिए अन्दर होते वह हमसे बाहर होते। कड़वा अनुभव है कि मुसलमान अपनी जाति बिरादरी पर मर मिटने वाला होता है अपेक्षा अन्य जाति धर्म के। सच्चाई की कसौटी पर यह भी है कि अगर किसी मुसलमान ने आपका दामन थाम लिया तो फिर उसकी जान जाने के बाद ही दामन छूटेगा।
 
मुसलमान की कमजोर नस जाति बिरादरी के प्रति वफादारी को इस बिरादरी में ऊँचाइयों को छूने वालों ने बखूबी भुनाया है। मुसलमान जाति के अमीरों मन्त्रियों को बखूबी जानता हूं। उनके कारनामों को देखा है। जब वह वोट लेते हैं तो दाढ़ी खुजलाते हैं कि इस दाढ़ी की लाज रखना हममें तुममें कोई भेद नहीं। जब चुनाव में जीत जाते हैं। तो कहते कि ठीक है तुम तो हमारे हो ही अन्य लोगों की डील करने के लिए जरूरी है अपनों की उपेक्षा। यह कहकर मुसलमानों को भरमा दिया जाता है। जिससे वह अपनी मूल स्थिति से उबर नहीं पाते। चुनाव के समय घर परिवार सहित तन्मयता के साथ मद्द करते। जब नेता बहुत खुश होता है तो कहता है कि अवैध कटान कराओ, या फिर बताओ तो बूचड़ खाने की लाइसेन्स मंजूर करा दें आदि धन्धों में अपने नजदीकियों को डालकर जीवन भर अपनी गुलामी कराता है। अवैध कारोबार की खासियत है कि बिना किसी संरक्षण के चलना नहीं। जिससे दया कृपा पर कुछ दिन धन्धा चला और जरा सी भी सम्बन्धों में खटास हुई तो बन्द हो गया। इस तरह ऐसे तमाम लोग विकास की मुख्यधारा से जुड़े और बह गए।
 
जहाँ तक शिक्षा दीक्षा का सवाल है तो इसके मजहबी स्कूल भी कम हैं। जो स्कूल हैं भी वह कागजों पर आँकड़ेबाजी दर्शा रहे हैं। मौके की हकीकत और आँकड़ों में काफी भेद है। जिससे इस बिरादरी का शिक्षा प्रतिशत नहीं सुधर सका। अल्प शिक्षा के कारण कोई सड़क किनारे बैठकर पिंचर जोड़ता है तो कोई बाल काटता है। गरीब मुसलमान इस तरह छोटे छोटे धन्धेकर मेहनत मजदूरी से अपना काम चला रहा है। पाँच वक्त की नमाज भी तो अदा करनी है इसलिए नौकरी के प्रति मुसलमानों को अधिक दिलचस्पी भी नहीं देखी। नियम धर्म से चलने वाले मुसलमान गरीब भले ही हैं उनके पास सबूरी है। उनके पास बैठ जाओ तो ऐसा अनुभव बताते हैं कि जीवन की थकान भूल जाओ।
 
मजहबी धर्म के नाम पर मुसलमानों को सबसे ज्यादा मुसलमानों ने गुमराह कर अपना उल्लू सीधा किया। हर पार्टी में एक चर्चित मुसलमान चेहरा बिरादरी की कमजोरी को ठगने के लिए मोहरा बना हुआ है। मुस्लिम हितों की बात सिर्फ मंच से की जाती है। फिर भी मुस्लिम वर्ग जागरूक नहीं हुआ जिससे आज भी ठगा जा रहा है।  ऐसे आस्था वान कटट्र हिन्दू भी हैं जिनको मुस्लिमों से कोई शिकवा नहीं और ऐसे कट्टर मुसलमान भी हैं जिनको हिन्दुओं के प्रति बड़ी आस्था है। जो पूरे समाज के हित की बात करते हैं। मुसलमान भाई अपने घर की तस्वीर को संवारें तभी देश की तस्वीर संभरेगी। एक मुसलमान नहीं हर इंसान की तकदीर बदल जाएगी। स्वारथी ठगों सत्ता के लोलुपों से सावधान रहें। राजनीतिक मुखौटों से बचना जरूरी है नहीं तो यह पूरे जीवन गुलामी कराकर शोषण करते रहेगें।
 
जनसंख्या की बड़ोत्तरी से उत्थान नहीं पतन होगा। जैसे एक सूर्य पूरे देश को रोशन करता है असंख्य सितारे टिमटिमाते रहते हैं। उस तरह टिमटिमाते तारे नहीं सूर्य बनिए। तबलमंजनी से अपने समाज के विकास की कल्पना करना अच्छा नहीं। अपने आप अपनी मंजिल को तलाशो और उसको पाने के लिए भरसक प्रयत्नकर सफलता को पाओ। ठगने वाले मुखौटे इतनी आसानी से चक्रव्यूह बनाकर ठगते हैं। आम मतदाता उनकी चाल को नहीं समझ पाता। जातिवादी झांसे में आकर अमूल्य मतदान कर बैठता है। वोट के बदले फूट मिलती। आपसी भाईचारे अमन चैन को आग लगाने में वही लोग आगे देखे जाते हैं जो मंच से शान्ति का उपदेश देते हैं।
 
सरकारों ने मुस्लिम समाज का उत्थान तो नहीं कर पाया लेकिन उसके उत्थान के नाम पर सरकारी धन को ठगने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ग्राम सभा स्तर पर देखो तो पता चल जाता है कि मुसलमान किस तरह अपना जीवन जी रहे हैं। तमाम हिन्दू-मुस्लिम परिवार ऐसे हैं अगर उनका हिन्दू साथ छोड़ दें तो वह भूँखों मर जाएंगे। चुनाव के समय में मुस्लिम समाज के लोग दाढ़ी दिखाकर अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। लेकिन ईमान पर डटा मुसलमान उनके फरमान को नकार देता है। क्योंकि वह जानता है कि जिसकी बदौलत उसकी रोजी रोटी चल रही है जो शुभचिन्तक है, उसको वह कैसे छोड़ सकता है। हमारे यहाँ के काफी मुसलमान गरीब हैं। उनके त्यौहार पर उनके हौसले को बढ़ाने के लिए जो अपनी ताजिया भी उठाते हैं तो हिन्दुओं के द्वारा उनका सहयोग किया जाता है। मुस्लिम नेताओं को हमने कभी भी ग्रामीण इलाकों के गरीब मुसलमानों के साथ त्यौहार में नहीं पाया। हाँ होली मिलन समारोह में खूब देखा है।
 
आरक्षण पर गौर करें तो उसमें भी मुसलमानों के साथ भेदभाव हुआ है। मुसलमानों में भी हिन्दुओं की तरह ऊंची नीची बिरादरी का प्रावधान है। उसमें गरीब गुनबे वाले मुसलमानों को क्या मिला? मुसलमानों की स्थिति पर विचार नहीं हुआ। इन्हीं सब कारणों के चलते मुसलमान जमाने के साथ कदम ताल न कर सका। मुसलमानों मे सम्पन्न लोगों द्वारा विरादरी को बहकाकर स्वार्थ सिद्व किया गया। मुसलमानों की गरीबी और पिछड़ापन का कारण अपनों से उपेक्षित होना है। जातिवादी विचारधारा के कारण मुसलमान दोनों पक्षों से उपेक्षित हुआ।
 
लेखक सुधीर अवस्थी 'परदेशी' हरदोई जिले में ग्रामीण पत्रकार हैं.

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