मुहब्बत ज़िंदाबाद

Arbind Kumar Mishra : मित्रों,  कल वैलेंटाइन दिवस था.अन्य मित्रों की तरह मैंने भी शुभकामना का पोस्ट डाला था. अपनी आदत के अनुसार मैंने प्रिय मित्रों को मेसेज से भी शुभकामना दी.मित्रों ने बहुत पसंद किया.उन सब मित्रों को बहुत-बहुत धन्यबाद !! पर कुछ मित्रों को थोड़ी सी कुंठा इस पर्व पर रही जिसे उन्होंने अभिव्यक्त भी किया. साथ ही कल फेस बुक पर और आज समाचार पत्रों में भी इसके विरोध का समाचार देखा. उनके विचार में यह उत्सव अपसंस्कृति का द्योतक है. उनकी कुंठाओं के निवारण के लिए मैं यह पोस्ट डाल रहा हूँ.

भारतीय समाज प्राचीनकाल में मध्यकाल से ज्यादा खुला हुआ था. बहुत सी कुंठाएं कई कारणों से मध्यकाल में घर गयीं. प्रेम उत्सव की परंपरा हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है. यद्यपि उनका समय और नाम भिन्न रहा है. संत वैलेंटाइन भारतीय पारिवारिक सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति से बहुत प्रभावित थे. प्राचीन यूरोप में नारी की स्थति बहुत बदतर थी ,नारी को बस उपभोग की वस्तु समझा जाता था. यह बात तत्कालीन पाश्चात्य दार्शनिक प्लेटो,अरस्तु आदि के लेखन से पूर्णतः स्पष्ट है. नारी के सम्मान का प्रतिष्ठापन संत वैलेंटाइन ने किया और उन्होंने भारतीय पारिवारिक पद्धति के अनुसरण की सलाह दी. इसकी सजा उन्हें दी गयी और उनका जीवन हरण कर लिया गया.१४ फरबरी ४९८ ई. को उन्हें फांसी दे दी गयी .पर उस तिथि को उनके अनुयायियों ने प्रेम और प्रणय उत्सव के रूप में मनाना जारी किया. वही प्रेम उत्सव का पर्व आज हम वैलेंटाइन डे के रूप में मनाते हैं. पर संत वैलेंटाइन की प्रेरणा भारतीय संस्कृति के किन पहलुओं से आयी ये समझना जरूरी है— नारी सम्मान के लिए भारतीय पारिवारिक वैवाहिक व्यवस्था के अनुसरण को उन्होंने हमारे प्रेम-उत्सव से प्रेरणा लेकर उत्सव और समारोह का रूप दिया था. हमारे देश में हमारी संस्कृति में प्रेम उत्सव का पर्व कौमुदी-महोत्सव , मदनोत्सव के रूप में मनाया जाता रहा था. जिसे हमने तो भुला दिया लेकिन आज वही मदनोत्सव फिर से पुनर्स्थापित हुआ है .भले रूप थोडा भिन्न हो ,पर भाव वही हैं.

हम जब संस्कृति की बात करते हैं तो चैती ,मधुमास और प्राचीन मदनोत्सव को कैसे भूल जाते है..प्रेम की यह परंपरा आज इस दिन के कारण अपसंस्कृति लगती हो पर हमारे देश और संस्कृति में कोई रंग अछूता नहीं है..मदनोत्सव पर जब आप दृष्टि डालेंगे सब स्पष्ट हो जायेगा. संस्कृत साहित्य के नाटक चारूदत्त में कामदेवानुमान उत्सव का वर्णन है. ‘मृच्छकटिकम्’में इसका वृहद् वर्णन आपको मिलेगा. वर्ष-क्रिया कौमुदी में भी इसकी विशेषता वर्णित है . सम्राट हर्ष के समय तो यह प्रमुख पर्व था ही रत्नावली और हर्ष चरित में मदनोत्सव के रंग को देखिये .दसकुमार चरित्रको देखिये . संस्कृत की पुस्तक कुट्टनीमतम् में भी गणिका और वेष्याओं के साथ मदनोत्सव मनाने का विषद वर्णन है..संस्कृति इस देश का क्या रहा है .यह तो प्राचीन ग्रंथों के अवलोकन से स्पष्ट होता है..

कालिदास के ऋतुसंहार में षष्ठ सर्ग को देखिये.सम्राट हर्ष ने नागानंद में भी ऋतु-उत्सव यानि मदनोत्सव का विषद वर्णन किया है.राजशेखर की काव्य-मीमांसा में भी इसका वर्णन है.वासवदत्ता नामक नाटक में सुबंधु ने बसंत के आगमन की ख़ुशी में राजा उदयन तथा राजकुमारी वासवदत्ता के माध्यम से बसंतोत्सव का वर्णनकिया है.आप यहाँ के इस देश के रास नृत्य को देखिये.उनके भाव को समझिये.अपनी प्राचीन मूर्तिकला स्थापत्य और चित्रकला को देखिये.मदनोत्सव का पूरा चित्र उभर आएगा.संपूर्ण प्राचीन भारतीय वाड्ंगमय काम की सत्ता को स्वीकार करता है और जीवन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को मानकर जीवन जीने की सलाह देता है.उपनिषदों, वेदों, पुराणों में भी काम के प्रति सहजता का एक भाव पाया गया है.सबसे प्राचीन साहित्य ऋग्वेद को देखिये .काम की महत्ता सर्वत्र व्याप्त है.मदनोत्सव कामकुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव है, कौमुदी महोत्सव का वर्णन चाणक्य ने भी किया है.

अब समझिये कौमुदी महोतसव क्या था . प्राचीन काल में भारत में भी वैलेंटाइन डे जैसा त्योहार मनाते थे.इस त्योहार का नाम कौमुदी महोत्सव था और यह उत्सव शरद पूर्णिमा के दिन मनाया जाता था. कौमुदी महोत्सव हमारे लोक जीवन का अनुराग पर्व था. इसे मनाने के लिए राजाज्ञा जारी होती थी और नगर के सभी पथ, गोपुर, वीथिकाएं एवं राजमार्ग सुगंधित द्रव्यों एवं पुष्परागों से सुवासित किए जाते थे. इस महोत्सव में युवक, युवती, प्रेमी युगल, दम्पती सुसज्जित एवं सुवासित होकर सभा स्थल पर पहुंचते थे और आनंद उठाते थे. वे अपने हृदय की कोमल भावनाओं को अपने प्रेमी के सामने प्रकट करते थे. इस दिन परस्पर प्रेम करने वाले युवक-युवती, पति-पत्नी या मित्र एक -दूसरे को उपहार दे कर भी अपने प्रेम को अभिव्यक्त करते थे. इन उपहारों में आम तौर पर पुष्प, सुगंधियां, प्रतीक चिन्ह, वस्त्र- अलंकार, दुर्लभ कृतियां आदि शामिल होती थीं. इस अवसर पर साथ उत्तम भोजन करने और एक-दूसरे के लिए साहित्यिक पद रचने तथा समर्पित करने का भी रिवाज था.

उस जमाने में भी भावयामि (आय लव यू) और परिभावयामि (आय लव यू टू) -ये दो शब्द कौमुदी महोत्सव के मूल मंत्र थे. इस दिन प्रेमी युगल नौका विहार, पतंगबाजी, अश्वारोहण, वन भोज (पिकनिक) आदि का आनंद लेते थे. इस रात लोग चंद्रमा की पूजा करके उनसे अपने प्रेम के दीर्घजीवन और अटूट संबंध का वरदान मांगते थे. ऐसी मान्यता थी कि जो प्रेमी युगल इस पूर्णिमा को दूध, घी, शक्कर और इक्षुरस से शिवलिंग को स्नान कराते हैं, उनका कभी संबंध विच्छेद नहीं होता और उनका प्यार अनंतकाल तक सजीव और जाग्रत बना रहता है.

वीर मित्रोदय नामक ग्रंथ में इस इस त्योहार का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसका आशय है- कौमुदी महोत्सव के दिन प्रेमी युगल साथ-साथ घूमें, आनंद करें, हंसे, गाएं, नृत्य करें, एक दूसरे को उपहार दें, भगवान शिव को दूध, पुष्प से स्नान सज्जित कर अपने प्यार के अमरत्व की याचना करें.इस पूजा में युवतियां अपने अभीष्ट का प्यार पाने के लिए भगवती पार्वती की प्रार्थना करती थीं –

हे गौरि शंकरार्धांगी यथा तं शंकरप्रिया तथा
मां कुरू कल्याणि: कान्तकान्तांसुदुर्भभाम्।

बस रूप बदला है, भाव वही है.

आचार्य वात्सात्यन ने अपने ग्रंथ के मंगलाचरण में लिखा है – ''धर्मार्थकामेभ्यो नम:'' अर्थात धर्म अर्थ और काम को नमस्कार है.'' 'धर्म' की वैशेषिक दर्शन की परिभाषा देखें – ''यतोsभ्यदुय नि:श्रेयस सिध्दिस: धर्म:'' अर्थात इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण करने वाला तत्व ही धर्म है इस लोक में अर्थात भौतिक संसार में सुख क्या है ?

चाणक्य का कथन है –

'भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वरांगना ।
विभवो दानशक्तिश्चनाल्पस्यतपसः फलम् ।।''

अर्थात भोज्य पदार्थ और भोजन करने शक्ति, रति अर्थात सैक्स शक्ति एवं सुन्दर स्त्री का मिलना, वैभव और दानशक्ति का प्राप्त होना 'कम तपस्या' का फल नहीं है।
स्पष्ट है कि भारतीय हिन्दू परम्परा में ''स्त्री और सेक्स'' सांसारिक सुखों का आधार है.

'काम' या सैक्स को लेकर कतिपय अन्य उदाहरण देखें –
कामो जज्ञे प्रथमे (अथर्ववेद – 9/12/19) कामस्तेदग्रे समवर्तत (अथर्ववेद – 19/15/17) (ऋग्वेद 10/12/18)

वृहदारव्यक में विषय-सुख की अनुभूति के लिए मिथनु अर्थात स्त्री पुरूष जोड़े की अनिवार्यता को वाणी दी गई है – ''स नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते। स द्वितीयमैच्छत।''

अर्थात किसी का अकेले में मन नहीं लगता ब्रहमा का भी नहीं। रमण के लिए उसे दूसरे की चाहत होती है.

मानव मन की मूलवासनाओं अथवा प्रवृत्तियों को हमारे आचार्यों ने इस प्रकार चिन्हित किया – ''वित्तैषणा, पुत्रषवणा तथ लोकेषणा'' इनको वर्गो में रखते हुए इनके मूल में ''आनन्द के उपभोग'' की प्रवृत्ति को माना है – ब्रहदारण्यक उपनिषद का कथन है – ''सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनम्'' अर्थात सभी सुख एकमात्र ''उपस्थ'' (योनिक एवं लिंग) के आधीन हैं.

मेरे कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि ऐसा नहीं कि वैलेंटाइन डे कोई अपसंस्कृतिवाचक हो या अजूबा हो ,यह तो इस देश की सांस्कृतिक परंपरा का अंग रहा है.
हर दिल में हर दिन प्रेम की गंगा बहे
दिल में खुशियों के सुवासित फूल खिले !!

मुहब्बत ज़िंदाबाद..

अरबिंद कुमार मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

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