मृत्यु से डरते हो तो क्या खाक ‘कबीर’ को खेलोगे?

Om Thanvi : शेखर सेन से दोस्ती जापान-यात्रा में हुई थी। वे एकल अभिनय के लिए प्रसिद्ध हैं। देश-विदेश में अपना नाटक 'कबीर' 345 बार खेल चुके हैं। 'कबीर' के बाद 'तुलसीदास' का सिलसिला शुरू हुआ। नया नाटक उन्होंने 'सूरदास' लिखा है, जिसे कल दिल्ली के फिक्की हाल में खेला। पत्नी तो कल देख आईं, मैं चाहकर भी नहीं जा सका। इसलिए नहीं कि कोई कहता, देखिए मिड-डे मील की खबर के बाद भी नाटक देखने चला गया। वजह महज दफ्तरी थी। बहरहाल।

नाटक के बाद मेरी पत्नी प्रेमाजी शेखर को भोजन के लिए ले आईं। शेखर ने फेसबुक पर मेरी कल की टिप्पणी पढ़ ली थी। इस संदर्भ में उन्होंने एक वाकया सुनाया। बोले, 2001 में पिताजी का आकस्मिक निधन हो गया था। मुंबई में ही अगले रोज उन्हें 'कबीर' मंचित करना था। पिता की मृत्यु के बाद कार्यक्रम रद्द होता ही। लेकिन इसकी भनक लगने पर मां बोलीं — नाटक हरगिज रद्द नहीं होगा। "मृत्यु से डरते हो तो क्या खाक 'कबीर' को खेलोगे? मृत्यु को जीने वाले का नाम कबीर था। मृत्यु हताश करने के लिए नहीं, ताकत देने के लिए आती है। जाकर 'कबीर' खेलो और यह संदेश हर देखने वाले को दो!"

शेखर सेन कहते हैं, मां का यह रूप देखकर उनमें साहस का ऐसा संचार हुआ कि अगले रोज 'कबीर' खेलकर आए। खयाल रहे, अपने सभी नाटकों में मंच पर लगभग डेढ़ घंटे शेखर अकेले अभिनय करते हैं। शेखर सेन को सलाम। उनमें जीवट जगाने वाली (अब दिवंगत) माता को प्रणाम।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

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