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मेराज फैजाबादी का जाना आजादी के बाद गरीब हुई उर्दू को और बेसहारा कर गया

आज के दौर में जहां मुशायरे मज़हबी रंग अख्तियार कर चुके हैं, और हालात यहां तक खराब हो चुके हैं कि अगर आप किसी अपने गैर मुस्लिम दोस्त के साथ मुशायरे में चले जायें तो अगली सुबह आप उससे शर्म के मारे आंख नहीं मिला सकेंगे. कुछ वैसी ही बल्कि इससे भी खस्ता हालत कवि सम्मेलनों की हो गई है वहां भी सुबह होते-होते लगता है कि लगता है कि भारत में हिंदुत्व का परचम लहराया जा चुका है और बाकी लोग अपनी जान बचाते इधर-उधर भागे फिर रहे हैं। 
आज के दौर में जहां मुशायरे मज़हबी रंग अख्तियार कर चुके हैं, और हालात यहां तक खराब हो चुके हैं कि अगर आप किसी अपने गैर मुस्लिम दोस्त के साथ मुशायरे में चले जायें तो अगली सुबह आप उससे शर्म के मारे आंख नहीं मिला सकेंगे. कुछ वैसी ही बल्कि इससे भी खस्ता हालत कवि सम्मेलनों की हो गई है वहां भी सुबह होते-होते लगता है कि लगता है कि भारत में हिंदुत्व का परचम लहराया जा चुका है और बाकी लोग अपनी जान बचाते इधर-उधर भागे फिर रहे हैं। 
 
मुशायरों और कविसम्मेलनों के इस भौंडेपन के दौर में अलग राहें निकालने वाले शायर का नाम है मैराज फैजाबादी अपनी शायरी में इंसानी रिश्तों को अहमियत देने वाला शायर आज हमारे बीच नहीं है. बीते 30 नवंबर को वह कभी ना टूटने वाली नींद में हमेशा हमेशा के लिये खो गया। मैराज फैजाबादी का जन्म फैजाबाद के एक गांव कौला शरीफ में 1941 में हुआ था उनका बचपन का नाम सैय्यद मैराज उल हक था। 2003 में वे सुन्नी वक्फ बोर्ड से सेवानिवृत हुऐ थे, उनकी तबीयत पिछले साल से खराब चल रही थी।
 
उर्दू के सच्चे खादिम मेराज फैजाबादी ने राष्ट्रीय स्तर के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी शायरी का लोहा मनवाया यह जरूर है कि घटाटोप अंधेरे का चीरते उनके ‘अगिभनधर्मी शब्द’ लोगों के मस्तिष्क को शुद्ध करते रहे। कोला शरीफ ही नहीं समूचे अदबी जगत में खामोशी छाई हुई है। वे छोटे से गांव से निकले और अदब की दुनिया को अपनी शायरी से रोशन कर दिया। जहां भी गए, फैजाबाद की छाप नुमाया की। कोला की माटी से उठी शायरी की खुशबू बहुत दूर तक गई। यहां की उर्वर माटी ने अदब की दुनिया की अजीम हस्ती को जना। अनुभव के ताप पर रची-बसी उनकी रचनाएं जिस्म से सीधे रूह तक उतर जाती थी। शायद इसी लिए उनकी रचनाओं को ‘कंठावास’ जैसा अहम मुकाम हासिल हुआ। 71 वर्ष की उम्र में कैंसर के कारण उनकी सांसों की डोर लखनऊ में टूट गई। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। लेकिन ऐसे लोग मरते कहां हैं वे तो आने वाली नस्लों को को मुंहजबानी याद हो जाया करते हैं। जब कोई खुद्दार बेटा अपने पिता के सम्मान में उनका ये शेर गुनगुनायेगा तो यकीनन मेराज फिर से जिंदा हो उठेंगे
 
हमें पढ़ाओ न रिश्तों की और किताब
पढ़ी हैं बाप के चेहरों की झुर्रियां हमने।
 
सोचिये इस शेर को पढ़कर कौन सी तस्वीर उभरी हो सकती है। आज की इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में इंसानी रिश्तों की कद्र न समझने वाले इंसान को इसकी अहमियत का अंदाजा न हो मगर उस बेटे को इस शेर की अहमियत का जरूर अंदाजा होगा जिसने अपनी स्कूल की फीस भरने के लिये बाप को रिक्शा खींचते देखा होगा। बहरहाल कोला के सिराजुल हक के घर 71 वर्ष पहले जिस बच्चे ने इस दुनिया में कदम रखा, उसमें असीम संभावनाएं छिपी थी। जो अदब की दुनिया में मेराज फैजाबादी नाम से रोशन हुआ। वर्ष 1962 में लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी करने वाले शायर मेराज के तीन संग्रहों ‘नामूश’, ‘थोड़ा सा चंदन’ और ‘बेख्वाब साअते’ ने लोगों के दिलोदिमाग को मथ कर रख दिया। अपनी शायरी के जरिए वे चिंतन के ऐसे आकाश पर पहुंचा देते थे, जहां पर वैचारिक खेमेबंदी, धार्मिक हदबंदी, सियासी मोर्चेबंदी सब के सब खुद-ब-खुद टूट जाती थी। मेराज की शायरी उन हर कोनों को स्पर्श करती है जहां दर्द है, तड़प है, नाइंसाफी है। उनकी शायरी में इंकलाब है मगर नारा नहीं, जज्बाती जरूर है मगर भड़काऊ नहीं, शिकायत जरूर है मगर हिंसा के लिये गुंजाईश नहीं एक मतअले में वे कहते हैं
 
यूं मिले हमसे वतन के लोग आजादी के बाद
जैसे बेहिस बाप दूसरी शादी के बाद।
 
यकीनन ये वो सच्चाई जिसे भारत का अल्पसंख्यक आजादी से आज तक सहन करता आ रहा है, सांप्रदायिक लोगों के ताने सुनते आ रहा है। मगर सच्चाई तो सच्चाई ही रहेगी चाहे दरबार में बोली जाये या बाजार में। घरेलू व पारिवारिक वफादारियों की शायरी की एक मिसाल तो देखिए
 
मुझे थकने नहीं देता है जरूरत का पहाड़,
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते..’।
 
उनकी शायरी ने गुरबत के स्वाभिमान की रक्षा करना दूसरे को सिखाया। सांप्रदायिक नफरत की सियासत और उसकी कोख से पैदा हुए फसाद की विभीषिका पर उन्होंने चेताया।
 
हमारी नफरतों की आग में सब कुछ न जल जाए,
कि इस बस्ती में हम दोनों को रहना भी है’।
 
शहर में झोपड़पट्टियों के बराबर में बने ऊंचे–ऊंचे फ्लैटों पर उनका कटाक्ष कुछ इस तरह था कि सुनने वालों को लगता था मानो उनका ही दर्द को कोई उनका हमदर्द बयां कर रहा है जब मुशायरे के डाईज से वे कहते थे कि
 
ऊंची इमारतों से मकान मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए
 
उनके कलम से निकले ये वो अल्फाज थे जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाते, जिनको कहने की हिम्मत कोई मेराज फैजाबादी जैसा कलंदर ही कर सकता है। आज के दौर में जब ईनाम पाने के लिये कवियों और साहित्यकारों की लंबी-लंबी इस तरह लगी रहती हैं, जैसे अल्संख्यकों के कत्ल के बाद उनके साथ हुई ज्यादती के बाद कोई मौलाना लालबत्ती मिलने के लिये खड़े रहते हैं और बत्ती मिलते ही वे उस दर्द को भूल जाते हैं जिसके लिये उन्हें वो ईनाम मिला था। कहने का मतलब है कि अपनी खुद्दारियां रख देते हैं ऐसे में उनके अंदर का शायर चीख पड़ता है और उनकी कलम से निकलता है
 
मेरी खुद्दारियां थकने लगीं हैं
मैं तोहफे पा के खुश होने लगा हूं।
 
ये वो अल्फाज हैं जो मेराज फैजाबादी को मुशायरों का ताजदार बनाते हैं, उर्दू को उसके सच्चे सिपाही की याद दिलाते हैं। मशहूर शायर मुनव्वर राना कहते हैं कि मेराज़ फ़ैज़ाबादी का गुजर जाना न केवल उर्दू अदब, हिन्दुस्तानी साहित्य और उर्दू शेरो-शायरी से शग़फ रखने वालों बल्कि तमाम प्रोग्रेसिव ताकतों के लिए भी एक गहरा सदमा है. हाफिज खालिद जाहिद मुजफ्फरनगरी कहते हैं मेराज के जाने से एक ऐसा खला पैदा हो गया है जिसकी भरपाई करना बहुत मुश्किल है। वे कहते हैं कि उर्दू ने अपना कोहिनूर खो दिया है, क्योंकि आज के जो हालात हैं उनमें हालत ये है कि मुशायरा अब एक फैक्ट्री बन गया है, लोग उर्दू शायर का लेबल लगाकर मंचों पर आते हैं और तुकबंदी में हिंदी में लिखे गये वे कलाम सुनाते हैं जिन्हें कलाम कहते हुऐ भी शर्म महसूस होती है। ऐसे में मेराज फैजाबादी का चले जाना आजादी के बाद गरीब हुई और उर्दू को बेसहारा कर गया। जाहिद कहते हैं कि ऐसे सच्चे साहित्यकार कम ही हैं जिन्हें न केवल शायरी से बल्कि अदब से मोहब्बत है और मैराज फैजाबादी उन लोगों में शुमार किये जाते थे। जहां गजल के मायने महबूब से बातें करना हो, जहां शायरों की कलम महबूब के आंख, बाल, गाल, लिख रही हो और उसे ही गजल का नाम दिया जा रहा हो वहां मेराज फैजाबादी कहते हैं
 
झील आंखों को नम होठों को कमल कहते हैं
हम तो जख्मों की नुमाइश को ग़ज़ल कहते हैं
 
बढ़ती सांप्रदायिकता, और उससे होने वाली मासूमों की मौत और दिनों-दिन बढ़ते सांप्रदायिकता के खतरे पर उनकी कलम खामोश नहीं रहती बल्कि एहतिजाज करती है जब वे कहते हैं कि
 
मांगते हैं भीख अब अपने मुहल्लों में फकीर
भूख भी मोहतात हो जाती है खतरा देखकर
 
जाहिर है जिसकी शायरी में दर्द छिपा हो, जो सिर्फ दर्द बयां करने को ही गजल कहता हो क्या ऐसे मुखलिस का जाना उर्दू की क्षति नहीं है? क्या इसकी भरपाई कर पाना आसान है? आखिर इतने नाम ही कितने हैं जो उर्दू के सच्चे खादिम हों? बहरहाल हमने उर्दू अदब की खिदमत करने वाले एक नायाब हीरे और एक ऐसी शख्सियत जिसके शेर वाकई दहाड़ते हैं, जिसका लहजा लोगों के जेहन में उतर जाता हो, और जिसका कलाम शायरी की पाकीजगी को हमेशा अपने अंदर संझोये रहता हो एसे कोहिनूर जनाब मेराज फ़ैज़ाबादी साहब को हमेशा के लिए खो दिया, वो आज हमारे बीच नहीं हैं मगर वो लोगों के जेहन में अल्फाज़ बनकर हमेशा जिन्दा रहेंगे।
 
सुना है बंद कर लीं उसने आंखें
कई रातों से वो सोया नहीं था।
 
                         लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 09927972718, 09716428646 के जरिए किया जा सकता है.
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