मेरा दिल किया कि कॉमरेड की आंखें नोच लूं

Manisha Pandey : ये एक पुरानी एफबी पोस्‍ट, जरा फिर से बांची जाए। इस पोस्‍ट से जुड़ा एक तथ्‍य यह भी है कि इस पर मेरे इन बॉक्‍स में सबसे ज्‍यादा लड़कियों के मैसेज आए थे और उन्‍होंने अपने सिमिलर अनुभव मेरे साथ साझा किए थे…  ये कोई गल्प कथा नहीं, आंखों देखा किस्सा है…

21 साल की एक लड़की जिला दरभंगा, बिहार से नई-नई दिल्ली आई थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी, थिएटर करती थी और जिंदगी में कुछ बनना चाहती थी। सुख, स्वप्न और आजादी के अरमानों से लबरेज। लेकिन इस आजादी का कोई ठीक-ठीक नक्शा उसके दिमाग में नहीं था। एक बहुत पिछड़े, पारंपरिक परिवार की पैदाइश वह लड़की दरभंगा में किसी महिला संगठन के संपर्क में आई और वहीं से तसलीमा नसरीन, सिमोन द बोवुआर, संगठन के नारी मुक्ति के पर्चे और "इस आंचल का तू एक परचम बना लेती तो अच्छा था," जैसी कविताएं पढ़कर उसे इतना समझ में आ गया था कि उसके हिस्से में आई ये जिंदगी भी कोई जिंदगी है। और दूसरा ये कि बदलाव मुमकिन है। सो चलो दिल्ली।

संगठन से जुड़े संगठनबाज यहां भी कम नहीं थे। लड़की सपनों से भरी थी, लेकिन संस्कार, परवरिश, दिमाग, डरा हुआ व्‍यक्तित्‍व, अस्तित्व की असुरक्षाएं और डर तो वही दरभंगा वाले थे। 21 साल की देह में हॉर्मोन अपने तरीके से काम कर रहे थे। शरीर का भी तो अपना लॉजिक होता है। यहां उसे कई ऐसे संगठनबाज मर्द मिले, जिनकी किसी भी सिंगल लड़की को देखते ही लार टपकने लगती है। और वो इसी फिराक में रहते हैं कि कैसे इसे अपने बिस्तर तक ले आया जाए।

एक दिन श्रीराम सेंटर में मैंने ऐसे ही एक आदमी को उसका ब्रेन वॉश करते देखा। वो उसे बता रहा था कि वो कितनी तेज, उत्साही और कमाल की लड़की है। लेकिन छोटे शहरों वाले कुछ गुण अभी भी उसमें बचे रह गए हैं। कि जिंदगी का आजाद और उन्मुक्‍त होना कितना जरूरी है और उन सज्जन के शब्दों में Indirectly आजादी और उन्‍मुक्‍तता का मतलब था, देह की उन्‍मुक्‍तता। बिंदास होना मतलब किसी भी कॉमरेड के साथ सो जाना। बेशक, उस कॉमरेड के साथ, जो सिमोन द बोवुआर को पढ़ने और नारीवादी होने का दावा करता हो। उसने कहा कि सिमोन जैसी बनो। बिंदास बनो। शरीर के बंधन से ऊपर उठो। सिमोन के तो कितने दोस्ते थे, सार्त्र, कामू और जाने कौन-कौन। फ्री, फ्री, फ्री। बस फ्री हो जाओ।

लड़की बहुत गंभीर आंखों से उसकी बातें सुन रही थी। और मेरा दिल किया कि कॉमरेड की आंखें नोच लूं। उसकी नजर में सिमोन की महानता सिर्फ इतनी ही थी कि वह देह से उन्‍मुक्‍त और आजाद थी। उसके कई रिश्ते थे। लेकिन उस आदमी ने दरभंगा की लड़की से एक भी बार ये नहीं कहा कि –

1- सिमोन बहुत हिम्मती थी और हिम्मत का मतलब सिर्फ देह से मुक्त होने की हिम्मत नहीं होता।

2- वह बला की परिश्रमी थी। बहुत बार वह लगातार 14-14 घंटों तक लिखती रहती थी।

3- रोज बिना नागा कम-से-कम दस घंटे लिखती-पढ़ती थी।

4- एक बार अफ्रीका में 48 डिग्री टैंपरेचर में भी वह हाय-तौबा मचाने की बजाय वह लिखाई करती रही थी।

5- "द सेकेंड सेक्स" लिखते हुए वह कई बार लगातार अठारह घंटे स्टडी टेबल से ही चिपकी रही।

6- उसने संसार की सैकड़ों किताबें पढ़ी थीं। बेशक वह बचपन से बुद्धिमान रही होगी, लेकिन उसकी उपलब्धियां दरअसल कठोर परिश्रम से अर्जित थीं। उसने मेहनत की, अपना जीवन लगाया, इसलिए आज दुनिया उसे सिमोन द बोवुआर के नाम से जानती है।

7- और सबसे महत्वनपूर्ण बात कि वो फ्रांस में पैदा हुई थी। उसका मुल्क अलग था, उसके हालात अलग थे, उसकी जिंदगी के सवाल अलग थे।

8- जो तुम्हें सचमुच अपनी शर्तों पर, अपने तरीके से जीना है तो दिल्ली में घूम-घूमकर आज प्रलेस के इस लेखक से और कल जलेस के उस लेखक से, आज इस संगठनबाज से और कल उस धरनेबाज से मिलने में अपना वक्त जाया न करो। जान लगाकर पढ़ो। दिन के चौबीस घंटों का सबसे रचनात्मक इस्तेमाल करो। अपना लक्ष्य तय करो। सबसे पहले तो सिमोन की सारी किताबें पढ़ जाओ। किसी के साथ सोना बुरा नहीं है, लेकिन अपना साथी अपनी मर्जी से, अपनी शर्तों पर चुनो और ये चुनने के लिए पहले इस काबिल तो बनो।

9- तुम दरभंगा के एक गरीब घर की लड़की हो। तुम वृंदा करात की बेटी नहीं, न ही तुम ऑक्सफोर्ड से पढ़कर आई हो।

तुम्हारे हालात अलग हैं, तुम्हारी जिंदगी के सवाल अलग।

तुम्हारी लड़ाई भी तो सबसे अलग होगी और सबसे कठिन भी।

पत्रकार मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.


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