मेरी इस एक पोस्ट से सारे बांभन महराजों की धोती की कांछ सरेआम खुल गई, आप भी पढ़ें

शंभूनाथ शुक्ल : मेरी इस एक पोस्ट से सारे बांभन महराजों की धोती की कांछ सरेआम खुल गई। कुछ ने बेशर्मी से कहा कि जिन्हें जाति का अभिमान नहीं है वे नरपशु हैं तो किसी-किसी ने खुद को सेकुलर बताने और जातिपात से दूर बताने का दिखावा करते हुए कहा कि आप अपनी जाति बदल लीजिए फिर ऐसे उपदेश दीजिए। अब हिंदुस्तान में आप जाति नहीं बदल सकते। अगर ऐसा था तो आपने जाति बदलने का यह अधिकार आज से ६६ साल पहले दलितों और पिछड़ों को क्यों नहीं सौंपा?

गालियां तो लगभग सब ब्राह्मणों ने दी। मुझे जी भरकर कोसा तथा दांतों में तिनका दबाकर मेरे खिलाफ आंदोलन करने, मेरा तर्पण करने और मुझे सरेआम जाति बाहर करने का आह्वान किया। मैने पहले भी कहा है कि मुझे शुक्ल उपनाम से कोई मोह नहीं रहा है पर इसे हटाने का भी कोई मतलब नहीं। मैं फिर कहता हूं कि शुक्ल लिखकर भी मैं जातिपात के बंधन से आजाद हूं। शुक्ल हटा लूं तो भी क्या लोग मेरी जाति नहीं तलाश लेंगे? और एक बात जो ब्राह्मण जातिनाम नहीं लगाते वे कहीं ज्यादा जातिवादी होते हैं। नीचे पढ़ें मेरी ओरीजनल पोस्ट…

शंभूनाथ शुक्ल :  महाराज आप बड़े चूतिया हो! एक व्यक्ति के तौर पर ब्राह्मण भला भी हो सकता है और प्रगतिशील भी लेकिन एक समुदाय के तौर पर यह कौम अत्यंत पिछड़ी, दकियानूस और जाहिल है। एक उदाहरण देखिए ब्राह्मण पैर छुआना बहुत पसंद करता है। इतना कि कुछ लोग तो मात्र पैर छू लेने से ही आशुतोष हो जाते हैं। पैर छूकर आप इनकी धोती भी खोल दो तो बरदाश्त कर लेंगे। इनके पैर छू लीजिए फिर बोलिए महाराज आप हौ बड़े चूतिया तो बेचारे खुश हो जाएंगे और आपके व्यंग्य को पूरी श्रद्धा से सिरोधार्य कर लेंगे। मजे की बात ब्राह्मण चाहे वह कांग्रेस का हो, भाजपा का हो, सपा का हो या बसपा का अथवा कम्युनिस्ट भी पैर छुआना और छूना दोनों ही पसंद करता है।

अब जरा इस परंपरा का स्रोत देखिए किसी को अपमानित करना हो तो उसके पैर छूने का अधिकार छीन लो। इस कौम में लड़की वाले को इतना गिरा हुआ समझा जाता है कि कोई भी ब्राह्मण पुरुष अपने ससुर, अपने साले और अपने मामा के पैर नहीं छूता है। मजे की बात कि मामा का पुत्र अगर उम्र में बड़ा हुआ तो छुएगा पर मामा के नहीं। और ब्राह्मण समाज इसे मान्यता देता है यह कहकर कि लड़की वाला छोटा होता है। जबकि भांवरों के समय जो सात बचन बताए जाते हैं उसमें बराबरी के अधिकार की बात तो की जाती है लेकिन हकीकत यह है कि उसी भांवर के कुछ पहले जब कन्यादान होता है तो उसका भावी दामाद परात में पैर रखकर यूं बैठा रहता है जैसे वह अपने ससुर को एक टुच्चे भिखारी से अधिक कुछ नहीं समझता। जबकि वही टुच्चा भिखारी अपने दामाद के घर चम्मच से लेकर हर जरूरत की चीज भेजता है। पूरा जीवन दामाद अपने ससुर को इसी नजर से देखता है। इस तरह ब्राह्मण समाज अपने से नीचे कुल वाले ब्राह्मण के पैर नहीं छूता। जिसे भी अपमानित करना हो उसके पैर छूने का अधिकार छीन लो। काश अगर आने वाले चुनाव में कोई ऐसी पार्टी चुनाव जीते जो पहले तो इस बिरादरी के चार जूते लगाकर इसे मैला ढोने के काम में लगा दे तो मुझसे अधिक खुशी किसी को नहीं होगी। क्योंकि यह कौम मनुष्य कहलाने के लायक ही नहीं है।

अमर उजाला, जनसत्ता समेत कई अखबारों में संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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