मेरे कस्बेनुमा गाँव में मायूसी पसरी हुई है : मुकेश कुमार

Mukesh Kumar : घर से वापस लौट आया हूँ। इस बार मैंने पाया कि मेरे कस्बेनुमा गाँव में मायूसी पसरी हुई है। मंदी और मँहगाई और भ्रष्टाचार से पैदा हुई मायूसी। चेहरों के रंग उड़े हुए हैं। जीवन को लेकर उत्साह नहीं है। बाज़ार की रौनक़ गायब है। लोग बारिश के बाद सबसे ज़्यादा चर्चा आने वाले बुरे दिनों की कर रहे हैं, जिसका मतलब है कि वे नाउम्मीद भी हैं। स्थानीय राजनीति का इस कदर अपराधीकरण हो गया है कि एक तरह का आतंक लोगों के चेहरों पर पढ़ा जा सकता है।
 
माफ़िया राज कायम हो गया हो जैसे। हालाँकि ये सब अचानक हो गया हो ऐसा नहीं है। आसपास कोयला खदानें होने के कारण कोयला माफिया का गुंडा राज पहले ही कायम हो चुका था। राजनीति पर कब्ज़ा कर लेने की वजह से उसका रंग और भी गाढ़ा हो चुका था। उधर मीडिया ने एक दूसरी तरह का अँधेरा पैदा कर दिया है जिसमें असमंजस, संदेह और दिशाभ्रम सब कुछ शामिल है। लेकिन संघर्षशील ताक़तों के परिदृश्य से गायब हो जाने से बदलाव की आस भी जाती रही है। ये लाचारी चुभने वाली है। अच्छी बात ये है कि कुछ लोगों में इससे मुक्ति की छटपटाहट पैदा होने लगी है।
 
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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