मेरे पसंदीदा अभिनेता रहे हैं दिनेश ठाकुर जी

: कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है : रजनीगंधा में उन पर फ़िल्माया गया वह गीत भी मेरा पसंदीदा गीत है। कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है अनजानी प्यास के पीछे, अनजानी आस के पीछे.., मन दौड़ने लगता है…. इस गीत में बेपरवाही से उन का सिगरेट पीना, और विद्या सिनहा का हाथ छूने की बेपरवाह कोशिश… पर वह उन का हाथ तो क्या टैक्सी की सीट पर पसरा पल्लू भी नहीं छू पाते, मन भागता रहता है।

जब-जब लगता है कि वह अब हाथ छूने में सफल हो रहे हैं तभी-तभी विद्या सिनहा अचानक हाथ उठा लेती हैं, अनायास ही। कई-कई बार ऐसा होता है। चलती टैक्सी में एक हाथ से सिगरेट पीते और दूसरे हाथ से हवा से रह-रह लहराते विद्या सिनहा के आंचल और हाथ को बार-बार छूने की उन की कोशिश का वह अछूता और अनूठा अभिनय अभी भी संकोच की उस इबारत को मन से उतरने नहीं देता। पहले प्यार की आकुलता आदमी को कैसे तो भला जीवन भर आग के हवाले किए रहती है। कि आदमी एक स्पर्श भर की प्यास लिए आजीवन उस की आग में तिल-तिल कर जलता रहता है। मुकेश के गाए इस गाने में दिनेश ठाकुर ने इसी आग को जिया था। पूरे संकोच और पूरी शिद्दत के साथ। जो भुलाए नहीं भूलती।

मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर बनी बासु चटर्जी निर्देशित इस फ़िल्म के नायक भले अमोल पालेकर थे पर याद तो दिनेश ठाकुर, विद्या सिनहा और यह गाना ही रहा। उन के सिगरेट पीने का वह अंदाज़ जैसे मन में कई-कई तनाव के तार बो देता था। यह सत्तर का दशक था। सत्तर के दशक का आखिर ! सिगरेट, मुकेश का गाया वह गाना और दिनेश ठाकुर का वह बेतकल्लुफ़ अंदाज़ ! उन की वह मासूम अदा हमें भी तब भिगो देती और सिगरेट के धुएं में हम भी अपनी जानी-अनजानी आग और अपनी जानी-अनजानी प्यास के पीछे भागने से लगते। मन की सीमा टूटने सी लगती। बार-बार टूटती।

रजनीगंधा के बाद वह फिर दिखे घर में रेखा और विनोद मेहरा के साथ। सामूहिक बलात्कार की शिकार रेखा के इलाज के लिए एक संवेदनशील डाक्टर के रुप में। फिर रेखा, ओम पुरी और नवीन निश्चल के साथ आस्था में। जितनी कम फ़िल्में उन के पास हैं, उतने ही कम दृष्य भी उन के पास फ़िल्म में होते थे। पर सीमित और संक्षिप्त भूमिका में भी वह प्राण फूंक देते थे। थिएटर उन का फ़र्स्ट लव था। इसी लिए वह फ़िल्में कम करते थे।' थिएटर में ‘जिन लाहौर नही वेख्या’ से वह चर्चा के शिखर पर आ गए थे। हो सकता है कि उन को बहुत कम लोग जानते हों पर हमारे जैसे थोड़े से जो लोग उन्हें जानते है, दिल से जानते हैं। अभी जब उन के निधन की खबर मिली तो दिल धक से रह गया।

कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है का तनाव जीते हुए ही हम जवान हुए थे। आज अधेड़ होने पर भी यह गाना जब कभी सुनने को मिल जाता है तब भी सचमुच मन फिर से अनजानी प्यास और अनजानी आस के पीछे दौड़ने लगता है और एक तनाव-तंबू मन में पसर जाता है। उन को हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि !

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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