मेरे मालिक कोयला समेत अन्य व्यवसायों में हैं तो इसमें अनुचित क्या है : हिमांशु द्विवेदी

दो दिन पूर्व मेरे द्वारा लिखे गए ‘आईपीएस की लाश पर हवन’ आलेख के संबंध में उठाई जा रहीं आपत्तियों में तथ्य कम और भावनात्मक उद्वेग का आधिक्य है। कोयला दलाली से लेकर सरकार की चाटुकारिता समेत तमाम व्यक्तिगत आक्षेप की बहुतायत है। दिवंगत शख्स को लेकर लिखे जाने की भर्त्सना है और सबसे अधिक नाराजगी पुलिस महानिरीक्षक जीपी सिंह से मित्रता के चलते उनकी तरफदारी को लेकर है। अधिकांश प्रतिक्रियाएं पत्रकारिता जगत से ही हैं, और मैं उन सभी प्रतिक्रियाओं का तहेदिल से स्वागत करता हूं।

मेरे हमपेशा साथियों की अभिव्यक्ति इस रूप में भी व्यक्त हुई है कि उन्हें मेरे होने पर भी शर्म आती है। उनकी अपेक्षा यह भी है कि मुझे खुद भी अपने लिखे और होने पर शर्म आनी चाहिए। लेकिन मुझे खेद है कि मैं न तो अपने लिखे पर शर्मिंदा हूं और न मुझे अपने होने पर कोई ग्लानि है जो आपत्तियां व्यक्त की गई हैं, उन पर अपना नजरिया पुन: अभिव्यक्त करना चाहूंगा।

यह बात अक्षरश: सत्य है कि जीपी सिंह मेरे मित्र हैं और भविष्य में भी रहेंगे, लेकिन क्या करूं, संबंध तो मेरे राहुल शर्मा जी से भी थे। मेरे तमाम साथी जीपी सिंह को जिम्मेदार ठहराने के लिए तलवार निकाले हुए हैं लेकिन ‘सुसाइड नोट’ में एक हाईकोर्ट जज का भी उल्लेख है। उस संदर्भ में टिप्पणी करने की साथियों की कलम की स्याही किस भय से सूख गई। राहुल जी का आत्महत्या संबधी कदम हर परिस्थिति में अनुचित इसलिए ठहरा रहा हूं कि क्योंकि उन जैसे शानदार शख्स का जिंदा रहना समाज के लिए जरूरी था। उन जैसा जिंदादिल और जांबाज इंसान अपने एक अधिकारी के व्यवहार से प्रताड़ित होकर, किसी खनन माफिया के दबाव में आतंकित होकर या किसी न्यायिक अधिकारी की फटकार मात्र से दुखी होकर ‘आत्महत्या’ जैसा भीषण कदम उठाएगा, मानने के लिए मेरा अंतर्मन हरगिज तैयार नहीं है।

लिहाजा सीबीआई जांच इस प्रकरण में होने का निर्णय एकदम सटीक है और हमें इस आत्महत्या के ‘उचित कारण’ के लिए सीबीआई जांच के निष्कर्ष की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि यही मेरे आलेख की मूल भावना है तो इससें अनुचित क्या है? मेरे साथी यह भी कृपया स्पष्ट करें कि बिलासपुर शहर में अपना घर-परिवार होते हुए भी राहुल जी रात में सोने के लिए ‘आफिसर्स मेस’ पहुंचते हैं और इसमें उन्हें कुछ भी ‘अस्वाभाविक’ महसूस नहीं हुआ। क्या इसकी वजह खंगाला जाना उचित नहीं है? क्या हमें इस प्रकरण की असलियत तक पहुंचने के लिए सभी पहलुओं पर गौर नहीं करना चाहिए।

इस प्रकरण के संबंध में मेरे नजरिए के तीन बिंदु स्पष्ट हैं:-

1. कोई भी कारण कितना ही जायज क्यों न रहा हो लेकिन, राहुल जी को ‘आत्महत्या’ जैसा कदम हरगिज नहीं उठाना चाहिए था। उन्होंने यह कदम उठाकर न केवल खुद अपने साथ बल्कि अपने पूरे परिवार, मित्रों और समाज के साथ नाइंसाफी की है। आत्महत्या जैसे कदम को ‘बहादुरी’ की शक्ल देना सामाजिक अपराध है।

2. परिजनों की मंशा के अनुरूप शासन का सीबीआई जांच का फैसला एक सही कदम है और जांच एक निश्चित समय सीमा के अंदर तथा निष्पक्ष तरीके से कराया जाना भी सुनिश्चित हो। अनिश्चित काल तक जांच का चलना भी मामले की गंभीरता को खत्म करेगा।

3. प्रकरण के संबंध में जीपी सिंह ही नहीं किसी भी शख्स या किसी खनन माफिया के खिलाफ कदम जांच निष्कर्ष के आधार पर उठाएं जाएं। जीपी सिंह या कोई खनन माफिया अगर उत्तरदायी होंगे तो मेरी मित्रता उनके खिलाफ लिखने में आड़े नहीं आएगी।

जहां तक रहा सवाल मेरे संस्थान, इसके मालिकान, उनके काम और स्वयं मेरे कार्य के संबंध में टिप्पणियों का तो आजाद देश में सबको अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करने का हक है। नौकरी मेरा महज शौक नहीं जीवन की आवश्यकता है और मेरे समाचार पत्र के मालिकान कोयला समेत अन्य व्यवसायों में भी संलग्न हैं तो उसमें अनुचित क्या है? मेरा पद प्रबंध संपादक का है और इसके तहत संस्थान के प्रबंधन और संपादकीय दायित्व को निर्वहन करने का दायित्व प्रिंट लाइन के तहत मुझे प्राप्त है। अब इससे किसी को आपत्ति है तो मैं क्या कर सकता हूं। हां, मुझे अपने संस्थान, इसके मालिकान और अपने सहयोगियों पर फख्र है।

लेखक डॉ. हिमांशु द्विवेदी हिंदी दैनिक हरिभूमि के प्रबंध संपादक हैं.

इस मामले को पूरी तरह से जानने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक कीजिए :

आईपीएस की लाश पर हवन

आईपीएस राहुल की मौत पर हरिभूमि के संपादक की त्वरित टिप्पणी के खिलाफ फेसबुक पर मुहिम

…शर्म कीजिए डॉक्‍टर हिमांशु!

 

 
 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *