: अवैध खनन का विजुअल बनाते समय हुई थी घटना : 22 अक्टूबर 2007 का दिन मेरी 10 साल की पत्रकारिता का सबसे अहम दिन, जिस दिन मेरी गर्दन पर बंदूक की नाल रखकर मुझे मार देने की धमकी दी गयी। एक पल में तो मानो उस धमकी से मेरी जान ही निकल गयी। लेकिन खून में उबाल कहो, या फ़िर अच्छी खबर करने की चाहत, या यूं भी हो सकता है जो मां कहती है, जिंदगी देना या उसे वापस लेना पहले से तय है। ना उससे पहले कोई तुम्हें इस दुनिया से रुसवा करेगा, और ना ही कोई मौत के मुंह से तुम्हे बाहर लेकर आ पाएगा। शायद इसलिये मेरी सांसे आज भी बरकार हैं।
यह बात उन दिनों की है जब एएसआई के आधिकारी केके मोहम्मद ने राष्ट्रीय स्वंय सेवक के सरसंघ
संचालक केसी सुदर्शन को एक चिट्टी लिखकर कहा था कि मुरैना जिले मे स्थित बटेश्वर के शिव मंदिरों की रक्षा आप खुद करो, हमने इन्हें बचाने के लिये राज्य सरकार से काफ़ी गुहार कर ली। लेकिन उनके कानों मे जूं तक नही रेंग रही है। यहां 6वीं व 7वीं शताब्दी के 100 से आधिक शिव मंदिर हैं। लेकिन यह मंदिर अवैध उत्खनन करने वालों की ब्लास्टिंग से धराशायी हो रहे हैं। बस केके मोहम्मद की यह चिट्टी मेरे खबर के सोर्स से मेरे पास आ गयी। जब मैं आईबीएन-7 के लिये काम किया करता था।
खबर जैसे ही अपने मप्र के ब्यूरो हेड श्री मनोज शर्मा सर को बताई तो उन्होंने प्लान करके तुरन्त खबर बनाने को कह दिया। लेकिन इस बात का कतई अंदाज नहीं था। कोई मुझे इस खबर पर मौत देने की भी बात कर सकता है। अगले दिन यानी 22 अक्टूबर को ही उस स्टोरी पर काम शुरू कर दिया। सारे विजुअल हो चुके थे बस अवैध खदानों के विजुअल लेने शेष थे। लगभग 200 मीटर की दूरी पर ही अवैध पत्थर की खदानें संचालित हो रही थी। जैसे ही खदान पर पहुंचे, मेरे कैमरामेन ने विजुअल लेना शुरू ही किया था कि बंदूक लहराते हुए एक आदमी दूर से गाली देता हुआ आया और कैमरा छीनने की कोशिश में लग गया।
वो मेरी गर्दन पर बंदूक की नाल रखकर बोलता है, “मैं तुझे मार डालूंगा”। इस शब्द ने कुछ पल के लिये मेरी सांसें ही रोक दी। लेकिन वह यह भूल गया, उसकी सब बातें कैमरे मे कैद हो रही हैं। जैसे-तैसे मैं उस खदान से वापस आ गया और उस खबर को मेरे चैनल ने प्रमुखता से बेहद अच्छी तरह से पेश किया। जिसके बाद मुरैना के तत्कालीन कलेक्टर आकाश त्रिपाठी और एसपी हरि सिंह यादव को 23 अक्टूबर को वहां जाना
पड़ा। खदान मफ़ियों के इतने हौसले बुलंद थे कि उन्होंने कलेक्टर और एसपी के ऊपर भी गोलियां बरसानी शुरू कर दी। जैसे-तैसे यह लोग बचकर निकले और उन्होंने आस-पास के गांवों के बदूंक के लाइसेंस निरस्त कर दिये। खबरों का सिलसिला लगभग एक हफ़्ते तक जारी रहा और फ़िर सरकार को भी थक हार के उस एरिये में एसएएफ़ की एक टुकडी तैनात करनी पड़ी।
लेकिन कुछ समय तक अवैध उत्खनन पर अकुंश रहा। जैसे ही एएसएफ़ टुकडी वहां से हटी और फ़िर से खदान माफ़िया सक्रिय हो गये। और यह सिलसिला इस कदर बढ़ा कि 8 मार्च 2012 को इस अवैध उत्खनन ने एक जाबांज आईपीएस अफ़सर नरेन्द्र कुमार की जान ही ले ली। अब इस घटना को सत्ता में बैठे लोग एक्सिडेंट का नाम दे रहे हैं, तो विपक्ष इस घटना को कैश करने में जुटी है। अवैध उत्खन्न के खिलाफ़ पिछ्ले पांच साल से अभियान में जुटा मैं एक बार फ़िर अवैध उत्खन्न से ज़ुड़ी इस घटना की पडताल करने बामौर गया। इस बार मैं खबर भारती के लिये उस स्थान पर गया और आरोपी टैक्टर चालक मनोज से भी मिला, ना तो उसके चेहरे पर कोई शिकन के निशां हैं, और ना ही उसे उस घटना का कोई रंज… बस यूं कहो
जैसे उसने किसी अपने प्रतिद्वंद्वी को मार दिया। बरहाल अगर चम्बल अंचल में हो रहे अवैध उत्खन्न की जांच सर्वोच्च्य न्यायालय के न्यायाधीश करें तो शायद कई सफेदपोश नेता अवैध उत्खन्न से जुडे़ नजर आयेंगे।
लेखक नासिर गौरी ग्वालियर में टीवी पत्रकार हैं.






