मैं भीष्म प्रतिज्ञा करता हूं कि फिर कभी किसी महिला की मदद नहीं करूंगा

कुछ दिनों पहले मैंने सब टीवी पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ देखा। उस समय इसका प्रमुख पात्र जेठालाल एक अजीब उलझन में फंसा हुआ था। घटना के अनुसार, एक बार वह घूमने के लिए किसी पहाड़ी स्थल पर जाता है। वहां एक फिल्म की शूटिंग होती है, जिसमें जेठालाल दूल्हे का रोल कर बैठता है, क्योंकि उसे अभिनय का बेहद शौक है। कई साल बाद फिल्म की वह दुल्हन गुलाबो मुंबई आकर जेठालाल से पत्नी होने का अपना हक मांगने लगती है और फिल्मी शादी को असली शादी बताती है।

शहर का महिला मुक्ति मोर्चा बिना यह जांच किए कि गुलाबो सच बोल रही है या झूठ, तुरंत उसकी मदद करने हाजिर हो जाता है और नारे लगाता है कि जेठालाल और सभी पुरुष घटिया, शोषक, अत्याचारी और बेकार हैं। मोर्चे की वकील ज्वाला देवी के लिए किसी का पुरुष होना ही पर्याप्त है, फिर वह उसे अदालत में ऐसा सबक सिखाती है कि पूरी जिंदगी नहीं भूलता।

खैर.. यह तो सिर्फ एक कहानी थी जिसमें मेहता साहब की कलम के कमाल से जेठालाल बेगुनाह साबित हो जाता है। इस धारावाहिक ने मुझे यह सोचने के लिए विवष कर दिया कि क्या सभी पुरुष वास्तव में ही घटिया, अत्याचारी, बलात्कारी, ढोंगी, निर्दयी होते हैं? क्या सभी महिलाएं हमेशा सही, सत्यवादी, पीड़िता, निर्दोष होती हैं? माफ कीजिए, यह सिर्फ मेरा चिंतन है, कोई प्रामाणिक मत या अंतिम सत्य नहीं। हो सकता है कि आप इन बातों से पूरी तरह असहमत हों और आप चाहें तो मुझे पिछड़ा हुआ, मूर्ख, अज्ञानी, नीच, पागल आदि उपनामों से नवाज सकते हैं।

हाल में दिल्ली में हुए बलात्कार कांड के बाद तो हालात और भी बदल गए हैं। लोग बलात्कारियों के लिए तुरंत मृत्यु दंड की मांग करने लगे हैं। मेरा भी मानना है कि जिसने भी किसी के साथ ऐसा क्रूर कृत्य किया है, उसे तो मृत्यु दंड अवश्य मिलना चाहिए, लेकिन जरूरी है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो। अन्यथा किसी निर्दोष को भी बलि का बकरा बनाया जा सकता है। इसका ताजातरीन उदाहरण चंडीगढ़ की एक घटना है, जिसमें लड़की ने सिर्फ पुरानी दुश्मनी निकालने के लिए बलात्कार का नाटक रचा। मैं यह कतई नहीं कह रहा हूं कि हर मामले में ऐसा ही होता, लेकिन कई मामलों में ऐसा भी हो सकता है। लगभग ऐसी ही एक घटना मेरे जीवन में घटित हो चुकी है।

यह बात मेरे पत्रकारिता में आने से पहले की है। हमारी एक रिश्तेदार महिला शाम को घर आई। उसके पति की कुछ दिनों पहले मृत्यु हो चुकी थी। वह रो रही थी और जिंदगी में मिले दुखों के बारे में मेरी मां को बता रही थी। साथ ही अपने देवर, पड़ोसी और बड़े बेटे की करतूतों का भंडाफोड़ कर रही थी, जो उसे अपने ही घर में रहने नहीं देते थे और आए दिन मार-पीट करते थे। मां ने उस महिला को कुछ दिन हमारे साथ रहने को कहा और खाने-पीने का पूरा इंतजाम किया। उन्हीं दिनों मैंने बिजली विभाग के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में वाद दायर किया था, जिसमें विभाग को माफी मांगनी पड़ी।

मेरी मां ने कहा कि इस दुखिया नारी को भी अपना हक मिल सके, क्या इसके लिए तुम कुछ कर सकते हो? मैंने उसकी पूरी व्यथा सुनी और महिला आयोग तथा मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा। पत्र मैंने लिखा और उस महिला को पढ़ाकर उसके हस्ताक्षर करा लिए। कुछ दिनों बाद वह अपने पीहर चली गई। एक दिन गांव में हड़कंप मच गया। आयोग के कई जांचकर्ता और पुलिसकर्मी उस महिला के घर आए। मामले की तहकीकात की, लेकिन यह सुनकर मेरे पैरों की जमीन खिसक गई कि अब वह महिला मुझ पर ही यह आरोप लगा रही थी कि मैंने अपनी ही मर्जी से यह चिट्ठी लिख दी और उस महिला के घर में सब कुशल-मंगल है तथा उसके घर में किसी से कोई झगड़ा-बखेड़ा नहीं है!

यह मेरे लिए उल्टे नमाज गले पड़ी वाली बात थी। उस समय मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि हे ईश्वर! बस इस बार बचा ले। तेरे पैदल चलकर खाटू श्यामजी आऊंगा। और भीष्म प्रतिज्ञा करता हूं कि फिर कभी किसी महिला की मदद नहीं करूंगा। शायद उस इलाके के पुलिसकर्मी समझदार थे, अन्यथा पूरी रात थाने में बैठाकर मेरी वो दुर्गति करते कि मैं किसी को चिट्ठी लिखने लायक नहीं रहता और पत्रकार बंधु अखबारों में मेरी फोटो छापते तथा मुझे क्रूर, षड्यंत्रकारी, शोषक, बलात्कारी, नारी का अत्याचारी और न जाने क्या-क्या प्रमाणित कर देते।

एक पुलिसकर्मी ने चिट्ठी का बारीकी से निरीक्षण किया और उस महिला से पूछा- क्या तुम पढ़ना जानती हो? उसने हां में जवाब दिया। उसके हस्ताक्षर का मिलान किया गया और पूछताछ की। जल्द ही तस्वीर साफ हो गई कि वह चिट्ठी उसी महिला ने लिखवाई थी। बतौर प्रमाण उसके हस्ताक्षर थे। उसे कड़ी फटकार लगाई गई। मैं बेकसूर साबित हुआ और मैंने राहत की सांस ली तथा भविष्य में कभी किसी महिला की मदद न करने का संकल्प लिया। आज वह महिला उन्हीं लोगों के साथ बड़े मजे से रह रही है, जिनको कभी वह फांसी के फंदे पर देखना चाहती थी।

मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा हूं कि सब महिलाएं ऐसी हैं। नहीं, बिल्कुल नहीं। लेकिन इस घटना ने मेरी आंखें खोल दीं और जो व्यक्ति एक बार ऐसी स्थिति का सामना कर लेता है, वह फिर कभी ऐसे झंझट में फंसना नहीं चाहेगा। मेरा मानना है कि कई पुरुष अत्याचारी, षड्यंत्रकारी, झूठे और धोखेबाज होते हैं, लेकिन मौजूदा दौर में यह बुराई उन तक ही सीमित नहीं है। इसलिए किसी को इसी आधार पर दोषी नहीं मानना चाहिए कि वह व्यक्ति पुरुष है और किसी को इसी आधार पर निर्दोष नहीं मानना चाहिए कि वह महिला है। लेकिन हमारा मीडिया और समाज इसी सोच से ग्रस्त है।

गलतियों का सारा ठीकरा हमेषा पुरुषों के सर ही फोड़ा जाता है, भले ही कोई निर्दोष इसमें फंसे। जबकि यह घटना का मात्र एक पहलू है। कभी अपने कैमरे दूसरी ओर भी घुमाइए। यकीन कीजिए, उतनी ही गड़बड़ियां उधर भी मिलेंगी। अभी इंदौर के एक जाने-माने पत्रकार ने कहा था कि बलात्कार करने वालों में महिलाएं भी होती हैं, तो उस पर विवाद हुआ और लोगों ने सहज ही उस पर विष्वास नहीं किया, परंतु उन्हीं दिनों नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर खबर आई कि दक्षिण भारत में एक महिला एक किशोर के साथ कई महीनों से बलात्कार कर रही थी।

न जाने हमारा मीडिया, हमारा समाज इस बात को कब समझेगा कि अपराधी सिर्फ एक अपराधी है। उसे महिला या पुरुष के लैंस से देखना बंद करें। किसी एक के प्रति नरमी और दूसरे के प्रति अत्यधिक कड़ाई सही नहीं है। किसी को महिला या पुरुष होने के आधार पर ही दोषी-निर्दोष साबित करने की परम्परा बंद कीजिए। क्योंकि मीडिया का यह रवैया किसी बेगुनाह जेठालाल के लिए फांसी का फंदा बना सकता है। जेठालाल की तो किस्मत अच्छी थी जो मेहता साहब ने उसे बचा लिया। वरना हर किसी को तारक मेहता जैसा तारणहार नहीं मिल पाता!!


किन्हीं राजीव ने यह सब लिखकर भेजा है और उन्होंने अपना पूरा नाम और मेल आईडी प्रकाशित न करने का अनुरोध किया है. राजीव ने मेल के साथ यह भी लिखकर भेजा है- ''आदरणीय यशवंत जी, सप्रेम नमस्कार। मेरे एक मित्र ने आपकी वेबसाइट के बारे में बताया। वेबसाइट अच्छी लगी। मीडिया सबकी खबर लेता है लेकिन आप तो खबरियों की भी खबर ले रहे हैं। ईमेल के माध्यम से एक घटना लिखकर भेज रहा हूं। कृपया अवलोकन कीजिए। आशा है वेबसाइट पर प्रकाशित होगी। कृपया मेरा नाम प्रकाशित न करें। धन्यवाद।''

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