एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है। गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी यही करते हैं। वे अच्छे वक्ता है। वे बखूबी जानते हैं कि इस देश की बदहाली को लेकर आम लोगों के मन में कितना गुबार है। वे इसी गुबार को हवा देते हैं। उनके लिए सपना बुनते हैं, उनके सपनों को हवा देते हैं। देश में 81.5 करोड़ वोटर हैं। इनमें से 47 फीसदी युवा हैं। आबादी का 44 फीसदी हिस्सा शहर में रहता है। मोदी दोनों तबके मोदी की बड़ी ताकत हैं।
मोदी इनके सपनों को कुछ इस तरह पंख लगाते हैं, मानों वे भगवान का अवतार हों। उनके हाथ में जादुई छड़ी हो, जिसे घुमाते ही बदहाली खुशहाली में बदल जाएगी। उनके हर शब्द को कॉर्पोरेट घरानों से संचालित मीडिया हाथों-हाथ लेता है। सोशल मीडिया पर इन शब्दों को अपने हिसाब से परिभाषित किया जाता है। और फिर मोदी खुद अपनी इमेज चमकाने के लिए 2007 से एपीसीओ वर्ल्डवाइड की सेवाएं ले रहें हैं। ध्यान रखें कि यही कंपनी विश्व बैंक को भी अपनी सेवाएं देती है। वही विश्व बैंक, जिसके बार में कहा गया था कि उसने मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने एजेंट के बतौर पीएम की कुर्सी थमाई, ताकि वह अपने एजेंडा को आगे बढ़ा सके। सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया में इस पीआर कंपनी के तेवर बेहद आक्रामक हैं। तकनीकी रूप से सक्षम होने के कारण एपीसीओ शहरी युवाओं के पसंदीदा ट्विटर और व्हाट्स एप जैसे माध्यमों से फर्जी तथ्यों, वीडियो और खोखले संदेशों के जरिए मोदी के पक्ष में जनमानस बनाने का काम करती है। कोई नहीं जानता कि इस पूरे प्रचार कार्य के लिए पैसा कहां से आ रहा है। जब आम आदमी पार्टी अपनी वेबसाइट पर चंदे का हिसाब देती है तो उस पर अमेरिकी फंडिंग का आरोप लगाया जाता है, सीआईए का एजेंट बताया जाता है। किसको पता कि भाजपा को चंदे में अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनियों का कितना योगदान है।
लेकिन ये सवाल कोई नहीं पूछेगा, क्योंकि हमारी कौम के सपनों में कभी देश अहम नहीं रहा। बहुत छोटे-छोटे सपने। सड़क, पानी, बिजली, टैक्स, रोजगार, सुरक्षा, भोजन, आवास। ये आम शहरी वर्ग के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ते हैं। सपने इससे आगे इसलिए नहीं बढ़ पाते, क्योंकि आजादी के 68 साल बीतने के बावजूद ये जरूरतें पूरी नहीं हो पाई हैं। अब तक की सारी सरकारें इन्हें पूरा करने में नाकाम रही हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों इसके लिए जिम्मेदार है। नेहरू के जमाने में देश के विकास को औद्योगिक आत्मनिर्भरता की पटरी पर आगे बढ़ाते हुए कृषि को गुजारे का साधन बनाकर जिस संतुलन की पंचवर्षीय योजना तैयार की गई, वह 1991 के आर्थिक सुधारों के आगे टूटकर बिखर गई। बीते दो दशकों में हम अपने घर के बजाय ‘बाहर’ पर ज्यादा निर्भर हुए हैं। उदारीकरण ने बाजार खोले हैं। नीतियां बदली हैं और इसी का नतीजा है कि पूंजी बड़ी तेजी से कुछ औद्योगिक घरानों तक सिमट रही है। नतीजतन मझोले घरेलू उद्योगों की कमर टूट गई है। वे अब बड़े औद्योगिक घरानों के गुलाम बन चुके हैं।
उदारीकरण के पिछले दो दशकों में भ्रष्टाचार के जितने बड़े मामले सामने आए हैं, उतने आजादी के बाद के साढ़े चार दशकों में भी नहीं दिखे। एक अनुमान के अनुसार, फिलहाल देश के सकल घरेलू उत्पाद का 50 फीसदी कालाधन है। इसका सबसे बड़ा हिस्सा उन्हीं कॉर्पोरेट्स के हिस्से है, जो इस समय देश की नीतियों को संचालित कर रहे हैं, क्योंकि पूंजी उनके ही पास है। सुप्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक (22 अप्रैल, 2013) को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ”इस चुनाव में कॉरपोरेट का उम्मीदवार वह व्यक्ति होगा जिसे इस रूप में देखा जाएगा कि वो ‘कुछ कर सकता है’ (केन डिलिवर) …और इसमें यह भी शामिल होगा कि समय आने पर यदि जरूरत पड़ी तो वह सेना की भी सहायता लेकर झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे स्थानों पर लोगों के विद्रोह का दमन कर सकता है। जहां कॉरपोरेट की नजर में जंगलों और पहाड़ों में तुरंत उपलब्ध समृद्धि (कोल्ड कैश) के अंबार लगे हैं।” कॉरपोरेट की बढ़ती ताकत के बारे में राजनीतिक विज्ञानी क्रिस्टोफ जैफरलॉट का कहना है- अन्य जगहों की तरह ही भारत में निजी क्षेत्र रोल मॉडल बन गया है। मध्यवर्ग के लोग सोचते हैं कि राष्ट्र-राज्य को एक कंपनी की तरह चलाया जाना चाहिए।… मजेदार बात यह है कि यह विमर्श भ्रष्टाचार के मामलों में निजी क्षेत्र की भूमिका को नजरअंदाज कर देता है। (आउटलुक 22 अप्रैल, 2013)
इस भयावह हालात के बावजूद जब भाजपा, मोदी और बाबा रामदेव जैसे नेता स्विस बैंकों में पड़े काले धन को वापस लाने का दावा करते हैं तो असल में वे लोगों को ऐसा सब्जबाग दिखाते हैं, जिसे खड़ा करना उनके बूते से बाहर की बात है। ऐसा करके वे देश में बड़े कॉर्पोरेट घरानों की तिजोरी में ठूंसे पड़े कालेधन को छिपाने की कोशिश करते हैं। देश के नीति-निर्धारक इस बात को बखूबी जानते हैं कि उदारीकरण के रास्ते पर इतना आगे बढ़ने के बाद अब पीछे लौटना नामुमकिन है। लेकिन किसी के पास देश के संतुलित विकास का कोई मॉडल नहीं है। यहां तक कि मोदी के पास भी नहीं। फरवरी के आखिरी हफ्ते में मोदी ने देश में सरकार चलाने का एक अजीबोगरीब फॉर्मूला पेश किया। एक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ऐसी हो कि वह राज्यों के सीएम की टीम के साथ मिलकर काम करे। यानी मोदी अगर पीएम बनते हैं तो उनकी अगुवाई में 28 राज्यों (दिल्ली को मिलाकर 29) की टीम देश के विकास की नीतियां तय करेगी और खुद मोदी एक न्यासी (ट्रस्टी) की तरह काम करेंगे। हमारे संविधान का अनुच्छेद 263 संघ-राज्य परिषद की बात करता है।
मोदी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि उनके फॉर्मूले में योजना आयोग जैसी संस्था का वजूद क्या होगा ? यह भी कि फिर केंद्रीय मंत्रिपरिषद का क्या काम ? असल मामला केंद्र और राज्यों के अधिकारों का है। करों में राज्यों के हिस्से को लेकर राजनीति होती है। अब तो बात राज्यों को विशेष दर्जे पर आ गई है। मोदी यह दावा नहीं करते कि उनके और 29 सीएम की टीम के शासन में इन मुद्दों पर कोई पक्षपात नहीं होगा। मोदी की कार्यशैली को जो जानते हैं, उन्हें पता है कि उन्हें शक्ति का विकेंद्रीकरण पसंद नहीं। वे ताकत अपने हाथ रखना चाहते हैं। यानी सभी सीएम को उनके आगे दबकर रहना होगा। मध्यप्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों के सीएम को भी, जिन्हें कूनो अभयारण्य के लिए शेर देने की बात पर मोदी आज तक ठेंगा दिखाते रहे हैं। एक और बात जवाबदेही की है। मोदी के शासन मॉडल में न्यासी के बतौर पीएम पूरे देश के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन जिम्मेदारी का निर्वहन सीएम की टीम करेगी। यह परस्पर विरोधाभासी है।
सवाल यह है कि इस विरोधाभास के बाद भी देश के तकरीबन सभी बड़े कॉर्पोरेट घराने मोदी को ही पीएम की कुर्सी पर क्यों देखना चाहते हैं। जबकि मौजूदा मनमोहन सरकार ने भी तो कॉर्पोरेट घरानों की खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वजह साफ है। यूपीए सरकार की दोनों पारियों में मिली-जुली सरकार की व्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कॉर्पोरेट घरानों की कोशिशें अपेक्षित रूप से सफल नहीं हो सकीं। एक के बाद एक लगातार घोटालों के सामने आने से सरकार बार-बार झुकती रही। इसे नीतिगत लाचारी कहें या संवैधानिक संस्थाओं का दबाव, केंद्र सरकार खुलकर फैसले नहीं ले सकी।
मनमोहन सरकार इसे मिली-जुली सरकार की मजबूरी बताती रही। लेकिन गुजरात में इसका बिल्कुल उल्टा हुआ। मोदी सरकार ने अडाणी समूह की समुद्र तट से लगी 5 करोड़ वर्गमीटर जमीन 10-32 रुपए के भाव से दी, जबकि बाजार दर 1500 रुपए प्रति वर्गमीटर थी। टाटा मोटर्स को साणंद में नैनो प्लांट के लिए 1100 एकड़ जमीन 400 करोड़ रुपए से ज्यादा की रियायत के साथ तोहफे में पेश की गई। दाहेज (दक्षिण गुजरात), धोलेरा (अहमदाबाद जिला) और मांडल (बेचराजी – उत्तर गुजरात) में विशेष निवेश क्षेत्र के लिए 50 फीसदी जमीन गुजरात टाउन एंड प्लानिंग व अर्बन डेवलपमेंट एक्ट 1976 का उल्लंघन करते हुए बाजार दर से 2 से 3 गुना कम दाम पर दी गई। गुजरात की 20 प्रतिशत जमीन तटीय इलाकों में है। यहां सेज और मुंद्रा बंदरगाह के लिए 10 हजार हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया। नतीजतन मछुआरों के 56 गांव उजड़ गए। गुजरात के वित्तीय लेन-देन पर नजर रखने वाले महालेखाकार नियंत्रक की हालिया रिपोर्ट में जमीन आवंटन और भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों में 16,706.19 करोड़ की हेराफेरी पाई गई है। लेकिन कभी किसी ने इन पर सवाल नहीं उठाए, जबकि यूपीए सरकार की हर नीति को लेकर सवाल उठाए गए और यही बात कॉर्पोरेट घरानों को मोदी के पक्ष में जम रही है।
दरअसल मोदी के पास साबित करने को कुछ नहीं है। 2002 के दंगों का दाग अभी भी उनके दामन से धुला नहीं है। वे विकास की बातें करते हैं, पर खुद उनके प्रदेश में विकास के आंकड़े कुछ और ही सच्चाई बयां करते हैं। गुजरात देश का सबसे ज्यादा औद्योगिक प्रदेश है। गुजरात की 10 फीसदी विकास दर को मोदी समर्थक आदर्श मानते हैं। हालांकि, इस विकास ने गुजरात को प्रदूषित भी बना दिया है। खुद गुजरात सरकार के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 10 लाख शिक्षित युवा बेरोजगार हैं। एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि बीते 12 साल में गुजरात में रोजगार की बढ़ोतरी सिफर रही है। मोदी राज में 30 सितंबर 2012 तक गुजरात का कर्ज 1,38,987 करोड़ रुपए हो चुका है, जो 1995 में महज 10 हजार करोड़ था। सरकार के बजट में इस रकम के 2015-16 तक दोगुना हो जाने का अनुमान लगाया गया है। आइए क्रमवार तरीके से देखते हैं कि मोदी के गुजरात मॉडल का सच क्या है –
स्वास्थ्य –
देश के बाकी राज्यों के मुकाबले गुजरात में डॉक्टरों की 31 फीसदी ज्यादा कमी है। इस मामले में यूपी और एमपी ही गुजरात से ऊपर हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर पर 1272 विशेषज्ञ डॉक्टरों के खाली पड़े पदों के मुकाबले केवल 76 पद ही भरे जा सके हैं। इसका असर शिशु और मातृ मृत्यु दर पर पड़ा है। वलसाड, पंचमहाल, साबरकांठा, दाहोद में हालात बेहद खराब हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़े बताते हैं कि गुजरात में केवल 43 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे सामान्य वजन के हैं। ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार जहां देश में 2004-20012 के दौरान मातृ मृत्यु दर में कमी का आंकड़ा 29 प्रतिशत हुआ, वहीं गुजरात में यह 24 फीसदी ही रहा। पांच साल से कम उम्र के 44.6 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, 70 प्रतिशत में खून की कमी है। 1990-95 में गुजरात स्वास्थ्य पर खर्च 4.25 प्रतिशत हुआ करता था, जो 200-2010 के बीच घटकर 0.77 प्रतिशत रह गया है। कुपोषित बच्चों के मामले में गुजरात देश में 15वें और एनीमिया प्रभावित बच्चों के मामले में 16वें नंबर पर है। खून की कमी की शिकार महिलाओं की बात करें तो गुजरात का स्थान देश के 20 राज्यों में सबसे नीचे है।
स्वच्छता –
2011 की जनगणना से पता चला कि गुजरात के 2.28 करोड़ ग्रामीण खुले में शौच करने पर मजबूर हैं। Key indicators of drinking water, sanitation, hygiene and housing conditions of India (दिसंबर 2013) 42 फीसदी ग्रामीण और 26 फीसदी शहरी लोगों के घरों तक साफ पेयजल नहीं पहुंचता।
खाद्य सुरक्षा –
एनएसएसओ के आंकड़ों को लेकर प्रो. हिमांशु के एक अध्ययन में पाया गया है कि राशन प्रणाली में भ्रष्टाचार 2009-10 से 2011-12 तक 45 प्रतिशत से बढ़कर 69 फीसदी हो गया है। लोग राशन लेने से कतराते हैं। 2012 में राशन लेने वालों का आंकड़ा 2009 में 26 से घटकर 22 प्रतिशत ही रह गया है। राशन के अनाज का प्रति व्यक्ति औसत उपयोग 0.6 किलोग्राम है।
शिक्षा –
मोदी गुजरात को नॉलेज हब बनाने का ख्वाब दिखाते हैं। लेकिन असर (ASER) का सर्वे कहता है कि क्लास 6-8 के केवल 68 प्रतिशत बच्चे क्लास 2 का पाठ ठीक से पढ़ पाते हैं, जबकि क्लास 5-7 के करीब 27 प्रतिशत बच्चे साधारण गणित के सवालों को हल कर पाए। मोदी सरकार का कन्या केलवणी अभियान 11-14 साल की 6.6 फीसदी लड़कियों को स्कूल नहीं भेज पाया है। इससे ज्यादा उम्र यानी 15-16 साल की 30 प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जातीं, जो राष्ट्रीय औसत 17.2 फीसदी से कहीं ज्यादा है। 2001 से 2011 के बीच राष्ट्रीय साक्षरता दर 9.2 प्रतिशत के हिसाब से ब़ढी है, लेकिन गुजरात में दशक के हिसाब से साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से नीचे, मात्र 8.89 प्रतिशत है। यही हाल उच्च शिक्षा का है।
गरीबी-
गुजरात में 2001 तक गरीबी 32 फीसदी थी, जो 2011 में बढ़कर 39.5 प्रतिशत हो गई। यानी राज्य के प्रत्येक 100 लोगों में 40 गरीब हैं। एनएसएसओ के आंकड़े भी कहते हैं कि 2004 से 2010 के बीच देश के बाकी राज्यों के मुकाबले गुजरात में गरीबी में सबसे कम यानी 8.6 प्रतिशत गिरावट आई।
मोदी चाहे ट्रेन में चाय बेचते रहे हों या कैंटीन के ठेकेदार, वे उस मदारी की तरह हैं जो लोगों को लच्छेदार बातों में उलझाकर विस्मृत कर देता है। वे मजमा लगाते हैं, ठिठोली करते हैं, लोगों को झूठे सपने दिखाते हैं। लालू प्रसाद यादव जैसे देश के उन तमाम नेताओं की तरह, जिनके पास अपना कोई विजन नहीं है। वे देश की किस्मत बदलने की बात करते हैं, पर उनमें ठोस तथ्यों के आधार पर तर्क गढ़ने की क्षमता नहीं है। हो भी कैसे। उनका तो पूरा अतीत ही नाकामियों भरा रहा है। सांप्रदायिकता की आड़ में सत्ता की दो पारियों में मैदान जीतना देश की किस्मत बदलने का पर्याय कतई नहीं हो सकता। (संदर्भ : रोजी-रोटी अधिकार अभियान और जनवादी विचार आंदोलन : नई दिल्ली)
सौमित्र रॉय

शोधकर्ता,
सामाजिक कार्यकर्ता
संपर्क : [email protected]
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