मोदी की मायावी दुनिया

नरेंद्र मोदी ने तीन सौ करोड़ी त्रि आयामी चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। यह हॉलोग्राफिक तकनीक है। हिंदी में अनुवाद कर कहें तो इसे खोखला रेखांकन तकनीक जैसा कुछ कह सकते हैं। यह तकनीक थ्री डी पिक्चर का आभास कराती है पर दरअसल यह थ्री डी होती नहीं है। यानी यह एक छल तस्वीर है जो लोगों में आदमी के तीन डाइमेंशन होने का भ्रम पैदा करती है लेकिन असल में यह दो ही डाइमेंशन की तस्वीर ही होती है।

मंच पर डार्क बैकग्राउंड में जो मोदी चलते-फिरते और बोलते दिखाई देते हैं वह दरअसल असली नहीं है बल्कि तकनीक से एक ऐसी सजीव दृश्य का निर्माण कर रहे हैं जो वास्तविक नहीं है बल्कि आभासी है। यानी लोगों को सजीव मोदी का आभास तो होता है पर वह दरअसल सजीव होते नहीं हैं।

तकनीकें भी गजब होती हैं वे कई कुरुप सच्चाईयों को उजागर कर देती हैं। असली मोदी जहां पर आकर विफल होते हैं वहां से आभासी मोदी प्रकट होते हैं और लोगों को हतप्रभ और चकित कर देते हैं। यानी नेता अपनी कार्यों और उपलबिधयों के बूते लोगों को आकर्षित करने की क्षमता खो रहे हैं ओर अब वे अभिताभ बच्चन के फिल्मों के कल्पनाशील निर्देशकों की तरह एक मायावी और आभासी संसार रच रहे हैं जिसमें नायक महाबली है,लार्जर दैन लाइफ वाली छवि के साथ मंच पर आ रहा है। आप सबने वे तस्वीरें देखी होंगी जिनमे नरेंद्र मोदी मंच पर नमूदार हो रहे हैं। एक मायावी और मोहक अंधेरे के बीच एक उजली छाया मंच पर आती है और किसी नायक की तरह लोगों को चमत्कृत कर देती है। यह करिश्मा नेता का नहीं उस तकनीक का है जो खालिस खोखलेपन को थ्री डी में बदल देती है। अपने ही रचे अंधेरे में अपनी ही उजली छवि की रचना यदि करिश्मा है तो नरेंद्र मोदी सचमुच हमारे समय के सबसे बड़े करिश्माई नेता हैं।

यह तकनीक पहले एक खालीपन तैयार करती है और फिर उस खालीपन से दो डाइमेंशन वाली तस्वीर में थ्री डाइमेंशन का आभास कराती है। यह तकनीक जाने-अनजाने में नरेंद्र मोदी की राजनीति की परतें भी खोलती है। खालीपन के भीतर एक आभासी नायक की छवि का निर्माण करने के कौशल से ही नरेंद्र मोदी की उस दवि का निर्माण हुआ है जो कट्टर हिंदूवादी जमातों और मध्यवर्ग के एक हिस्से को उसी तरह लुभाती है जिस तरह से बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हिटलर की छवि मध्यवर्गीयऔर पूंजीपति जर्मनों को लुभाया करती थी। हिटलर ने जो आभासी छवि निर्मित की थी उसका असली रुप जैसे ही 1935 के आसपास जर्मन लोगों को होने लगा तो वह छवि टूटने लगी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थीं जर्मनी का इतिहास लौट नहीं सकता था। हिटलर को अपनी नायक की उस आभासी छवि बनाए रखने के लिए आखिरकार 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध छेड़ना पड़ा। लेकिन अपनी आभासी छवि को बनाए रखने की हिटलर की यह जिद जर्मन राष्ट्र को बेहद महंगी पड़ी। जर्मनी तबाह हो गया।राजनीति और युद्ध में छलबल को आजमाने और मायावी तकनीकों का इस्तेमाल का हिटलर से लेकर मोदी तक ही नहीं करते रहे हैं। बल्कि मायावी युद्धकला के सबसे पुराना पुरखा रावण को कहा जा सकता है। रावण इस धरती का पहला छलबली था। उसके छलबल से भगवान राम भी असहाय हो गए थे। शुक्र है कि उनके पास विभीषण था वरना रावण तो युद्ध जीत ही चुका था।

चुनावी खर्च में हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव सबसे महंगे चुनाव रहे पर अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अपने प्रचार में इस हालोग्राफिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया। दोनो उम्मीदवारों का जोर लोगों से सीधा संपर्क कर उन्हे अपनी नीतियों पर सहमत कराने पर रहा। ओबामा या रिपब्लिकन उम्मीदवार चाहते तो इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकते थे। खासतौर पर तब जब समुद्री तूफान के कारण ओबामा को राहत कार्यों में लगना पड़ा था। ओबामा अपनी आभासी तस्वीरों के जरिये से लोगों को संबोधित कर सकते थे लेकिन उन्होने ऐसा नहीं किया बल्कि बिल क्लिंटन को चुनाव प्रचार का जिम्मा सौंपा। अमेरिकी लोकतंत्र भले ही आदर्श न हो और कारपोरेट लोकतंत्र के रुप में उसकी आलोचना की जाती रही है पर उसमें भी इतनी तमीज है कि वह चुनाव प्रचार के लिए आभासी तस्वीरों की मायावी दुनिया नहीं रचता। चुनाव एक ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें जनता अपने नेताओं से सीधे रूबरू ही नहीं हो सकती बल्कि सवालात के जरिये उनका जवाब तलब भी कर सकती है। यदि नेता इस मौके पर भी टेक्नोलाजी के जरिये जनता से सजीव संपर्क खत्म कर एक मायावी रुप रचेंगे तो फिर जनता सवाल किससे पूछेगी? थ्री डी तस्वीर से? लोग पहले ही चुनाव के बाद जनप्रतिनिधियों के लापता हो जाने से हैरान और परेशान हैं अब यह तकनीक तो उन्हे चुनाव के दौरान भी लापता होने में मदद देगी।

नरेंद्र मोदी जो तकनीक लेकर आये हैं जो चुनावी लोकतंत्र को धनबल और छल बल पर आधारित प्रचार रणनीति में बदल देगी। नरेंद्र मोदी ने इस तकनीक पर 300 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। आखिर ये किसका पैसा है? जो लोग मोदी को इतना पैसा दे रहे हैं वे उसकी वसूली भी करेंगे। जाहिर है कि यह वसूली भ्रष्टाचार के जरिये होगी। इसलिए मोदी अपनी जिस थ्री डी लार्जर दैन लाइफ वाली छवि बना रहे हैं उसका निर्माता-निर्देशक भ्रष्टाचार है।

लेखक एस. राजेन टोडरिया दैनिक भास्कर के पूर्व स्थानीय संपादक और संप्रति जनपक्ष टुडे के मुख्य संपादक हैं।


एस. राजेन टोडरिया का एक अन्य विश्लेषण- अरविंद केजरीवाल, जिसने जेम्स बांड की तरह अकेले ही भ्रष्टाचार का अंडरवर्ल्ड तबाह कर दिया था!

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