मोदी के विकास एजेंडे की ‘पोल’ खोलेगी राहुल की टीम

भाजपा के नए ‘योद्धा’ नरेंद्र मोदी, अब सियासी जंग में तरह-तरह के दांव अजमाने पर उतारू हो गए हैं। उन्होंने हिंदुत्व के साथ विकास के एजेंडे के ‘सियासी रीमेक्स’ से खास तौर पर युवाओं को आकर्षित करने की मुहिम छेड़ दी है। शहरी आवाम और युवाओं को लुभाने के लिए वे विकास के बड़े-बड़े सपने दिखाने लगे हैं। यहां तक कह रहे हैं कि चीन के विकास के आगे बड़ी लकीर खींचना बहुत मुश्किल काम नहीं है। यदि देश को कांग्रेस के नेतृत्व वाले शासन से मुक्ति मिल जाए, तो थोड़े वक्त में ही विकास की नई गंगा बह सकती है।

मोदी, युवाओं के बीच बड़ी तरन्नुम से इस तरह के मुद्दे उछाल रहे हैं। वे घूम-घूमकर अपने गुजरात के विकास मॉडल की दुहाई देते रहते हैं। दावे करते हैं कि उनके शासनकाल में एक दशक के अंदर गुजरात ने विकास के नए मापदंड बना दिए हैं। इस फॉर्मूले का विस्तार पूरे देश की किस्मत बदल सकता है। पिछले महीनों में मोदी अपने विकास एजेंडे के तहत जगह-जगह इस आशय की जुमलेबाजी करते रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने ‘मोदी गुब्बारे’ की हवा निकालने के लिए रणनीति बना ली है। तय किया गया है कि टीम राहुल के कुछ नेता तथ्यों के आधार पर मोदी के गुजरात मॉडल की वास्तविकता पूरे देश के सामने लाएंगे। ताकि, यह पता चल सके कि मोदी के विकास मॉडल की जमीनी सच्चाई क्या है?

दरअसल, मोदी ने कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ अब आक्रामक शैली अपना ली है। वे सीधे तौर पर पार्टी आलाकमान और राहुल गांधी पर निशाना साध रहे हैं। खास तौर पर राहुल को लेकर वे तीखे कटाक्ष करने से भी नहीं चूक रहे हैं। मोदी को भाजपा की गोवा कार्यकारिणी में लोकसभा चुनाव के लिए चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया गया है। पार्टी में यह नया रुतबा मिला, तो मोदी ने अपने तेवर और पैने कर लिए हैं। पहले वे गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर बात-बात में छह करोड़ गुजरातियों का हवाला देते रहते थे। लेकिन, अब वे सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते नजर आते हैं। यूं तो उन्हें अभी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपना ‘पीएम इन वेटिंग’ नहीं बनाया। औपचारिक ऐलान होना बाकी है। लेकिन, चुनाव अभियान की कमान मिलने के बाद मोदी पूरे देश में दौरा करके जगह-जगह मनमोहन सरकार और कांग्रेस नेतृत्व को ललकारते नजर आ रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि 2002 में गुजरात में भयानक सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इस दौर में वहां मोदी की सरकार थी। इन सांप्रदायिक फसादों में मोदी सरकार पर तमाम गंभीर आरोप लगे थे। इन दंगों से ही मोदी की छवि एक कट्टर हिंदूवादी नेता की बनी थी। मोदी ने इस छवि को राजनीतिक तौर पर जमकर भुनाया भी। इसी छवि के चलते वे गुजरात मेें लगातार जीत के सिकंदर बनते चले आए हैं। कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी कमजोर नहीं पड़े। अपनी खास राजनीतिक शैली के चलते मोदी पूरे संघ परिवार में चेहते नेता बन बैठे हैं। गुजरात विधानसभा का चुनाव लगातार तीसरी बार जीतने के बाद संघ नेतृत्व उन्हें लोकसभा चुनाव के लिए ‘पीएम इन वेटिंग’ का सबसे उपयुक्त चेहरा मानता है। ऐसे में, मोदी को आगे लाने के लिए भाजपा के अंदर पिछले कई महीनों से गहमा-गहमी रही है। इस मुहिम को लेकर लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता तुनक भी गए थे। लेकिन, संघ नेतृत्व ने इस नाराजगी की परवाह नहीं की। संघ नेतृत्व का इशारा समझकर आडवाणी के करीबियों ने भी उनसे किनारा करना शुरू किया था। इसके बाद भाजपा के ‘पितामह’ के कहे जाने वाले आडवाणी भी मोदी के मुद्दे पर लगभग समर्पण की मुद्रा में आ गए हैं।

भाजपा के अंदर अब   मोदी के रास्ते में कोई बड़ा कंटक नहीं बचा है। माना जा रहा है कि संघ की रणनीति के चलते ही मोदी का रास्ता सुगम बन पाया है। कोशिश की जा रही है कि मोदी को जल्दी से जल्दी प्रधानमंत्री पद का चेहरा भी घोषित कर दिया जाए। लेकिन, कुछ सियासी मजबूरियों के चलते यह ऐलान नहीं हो रहा। लेकिन, मोदी की सियासी रफ्तार को देखते हुए यही माना जा रहा है कि मोदी को पार्टी का चेहरा बनाया जाना पूरी तौर पर तय है।

टीम मोदी ने संगठन से लेकर प्रचार अभियान के मोर्चों पर अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश का संगठन प्रभारी, मोदी ने अपने खास सिपहसालार अमित शाह को बनवा दिया है। शाह, मोदी सरकार में गृह राज्यमंत्री थे। दंगों के दौरान उनकी भी छवि ‘हिंदुत्ववीर’ की बनी थी। गुजरात के दंगों के मामलों में उन पर कानूनी शिकंजा भी कसा था। कुछ गंभीर मामले उनके खिलाफ अदालतों में लंबित चल रहे हैं। इसी तरह से कई प्रदेशों में पार्टी के अंदर अपनी पकड़ बनाने के लिए टीम मोदी ने कई खेल शुरू किए हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में हिंदुत्व की बघार से पार्टी की सियासी थाली में नया स्वाद आ सकता है। उल्लेखनीय है कि अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे के आंदोलन के चलते भाजपा ने केंद्र में पहली बार सत्ता का द्वार देखा था। उस दौर में उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा का बोलबाला बन गया था। लेकिन, 80 लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में भाजपा की हालत काफी खराब है। लोकसभा के पिछले दो चुनावों से यहां पर पार्टी का ग्राफ महज 10 सीटों पर टिका है।

टीम मोदी के रणनीतिकारों का आकलन है कि यदि उत्तर प्रदेश से भाजपा को कम से कम 40 सीटें मिलें, तभी मोदी के सत्ता सिंहासन की उम्मीद बांधी जा सकती है। जाहिर है ऐसे में, रणनीतिकारों को मंदिर मुद्दा ही सफलता का मंत्र दिखाई पड़ रहा है। लोकसभा चुनाव की राजनीतिक मुहिम बढ़ने के साथ ही संघ परिवारी घटकों ने एक बार फिर मंदिर मुद्दे की हुंकार लगानी शुरू कर दी है। मोदी भी इस मुहिम को हवा देते दिखाई पड़ रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक चर्चित मीडिया इंटरव्यू में यहां तक कह दिया कि हर सच्चे हिंदू की तरह वे भी अयोध्या में भव्य राम मंदिर देखना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कह डाला कि वे जन्म से हिंदू हैं। ऐसे में, उन्हें यह कहने में संकोच नहीं है कि वे हिंदू राष्ट्रवादी हैं। यह अलग बात है कि मोदी की इस टिप्पणी को लेकर सियासी हल्कों में भारी हंगामा रहा है।

पिछले दिनों मोदी ने एक कार्यक्रम में कांग्रेस की धर्म निरपेक्षता की भी जमकर मजाक उड़ाई। वे बोले कि हर अहम मौके पर कांग्रेस के लोग बुर्के की ओट में छिपने की कोशिश करते हैं। उन्हें देश के हितों की पहवाह नहीं होती। ये लोग धर्म निरपेक्षता के नाम पर सिर्फ वोट बैंक की खेती करने में माहिर हैं। भले, इसके लिए देश का बड़े से बड़ा नुकसान हो जाए। ऐसे में, जरूरी हो गया है कि जल्द से जल्द देश को कांग्रेस के शासन से मुक्ति दिलाई जाए। पिछले दिनों वे अपनी आक्रामक सियासी मुहिम में काफी कुछ विवादित जुमले बोल गए हैं। गुजरात के दंगों को लेकर वे माफी मांगने को तैयार नहीं हैं। यही कह रहे हैं कि जब उन्होंने कोई गलती नहीं की, तो माफी क्यों मांगे? इसी संदर्भ में उन्होंने यहां तक कह डाला कि कुत्ते का बच्चा भी अगर कार के नीचे आ जाता है, तो उसके मरने का दुख होता है। मोदी के इस जुमले को मुस्लिम समाज से जोड़ कर देखा गया। इस टिप्पणी को लेकर सियासी हल्कों में कई दिनों तक बवाल चलता रहा है। कांग्रेस के अलावा और कई अन्य दलों ने भी इस टिप्पणी पर मोदी की तीखी आलोचना की है।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, टीम राहुल गांधी के अजय माकन, संदीप दीक्षित, शशी थरूर व दीपेंद्र हुड्डा को खास जिम्मेदारी दी गई है कि वे तथ्यों की पड़ताल करके गुजरात के विकास के दावों की सही तस्वीर देश के सामने रखें। इसकी शुरुआत भी अजय माकन ने कर दी है। उन्होंने मीडिया को जानकारी दी है कि किस तरह से गुजरात शिक्षा, स्वास्थ व परिवार कल्याण योजनाओं के मापदंडों में फिसड्डी साबित हुआ है। इस संदर्भ में योजना आयोग के हवाले से कुछ आंकड़ें भी जारी किए गए हैं। अब कोशिश हो रही है कि टीम राहुल, आंकड़ों के विश्लेषण के जरिए मोदी के विकास मॉडल की पोल खोल दे। यह रणनीति मोदी मुहिम की पलटवार के  रूप में देखी जा रही है।

5 अगस्त से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। इस सत्र में खास तौर पर बहुचर्चित खाद्यान्न गारंटी कानून की चर्चा होनी है। सरकार ने पिछले दिनों अध्यादेश से इसे लागू किया था। मानसून सत्र में इस पर संसद की मुहर लगनी है। सपा जैसे समर्थक दल भी इस मुद्दे पर बगावती तेवर अपनाए हुए हैं। ऐसे में, कांग्रेस के रणनीतिक प्रबंधकों ने संसद में अपने पक्ष में संख्या बल जुटाने की कवायद तेज कर दी है। भाजपा और जदयू का गठबंधन मोदी के मुद्दे पर टूट गया है। ऐसे में, जदयू के नेता मोदी के खिलाफ ज्यादा आक्रामक हैं। मोदी की चर्चित टिप्पणियों पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि मोदी को अपनी भाषा संभालनी चाहिए। वे पिल्ला और बुर्का जैसी टिप्पणियों से सांप्रदायिक तनाव का ताना-बाना बुन रहे हैं यह खतरनाक है। कांग्रेस के नेताओं ने नीतीश कुमार के इन ‘सेक्यूलर’ तेवरों को सराहा है। जदयू ने संकेत दिए हैं कि संसद में उनकी पार्टी खाद्यन्न   सुरक्षा गारंटी के मुद्दे पर सरकार का साथ देगी। इस तरह से कांग्रेस को मोदी के खिलाफ जदयू का साथ मिल गया है। नीतीश के साथ मुलायम सिंह यादव जैसे नेता भी कह रहे हैं कि गुजरात के विकास मॉडल में ज्यादा सच्चाई नहीं है। ऐसे में, लोग मोदी और भाजपा के झांसों से दूर रहें। टीम मोदी की मुश्किल यह है कि इन क्षणों में वे लोग कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक गोलबंदी नहीं कर पा रहे हैं।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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