मोदी बिल्ली हैं, सपा उस कबूतर की तरह गलती ना करे

तमाम अन्य नेताओं की तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी बार-बार, सयम बेसमय दोहराते रहते हैं कि यूपी में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी कोई फैक्टर नहीं हैं। टेलीविजन पर जो पेश किया जा रहा है, यथार्थ उससे अलग हैं। एक जिम्मेदार नेता होने के कारण अखिलेश की बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अच्छा होता सीएम साहब अपने दावे के समर्थन में इस बात का भी खुलासा कर देते कि उनके पास ऐसी कौन सी रिपोर्ट आई है जिसके आधार पर वह राज्य में मोदी फैक्टर को नकार रहे हैं। 
 
अगर समाजवादी पार्टी की ‘देश बचाओं, देश बनाओं’ जनसभाओं में जुटी भीड़ को उसका नेतृत्व अखिलेश सरकार और पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव की लोकप्रियता का पैमाना करार देता है तो भारतीय जनता पार्टी की राज्य में होने वाली शंखनाद रैलियों में जुटने वाला अपार जनसमूह नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का पैमाना कैसे नहीं हुआ? खासकर तब जबकि प्रदेश में समाजवादी सरकार हो और पार्टी की जनसभाओं को सफल बनाने, भीड़ जुटाने के लिये सरकारी मशीनरी का खुल कर प्रयोग किया जा रहा हो, जबकि मोदी की रैलियों की इजाजत देने में ही उनकी सरकार द्वारा तमाम तरह के रोड़े अटकाये जाते हैं। मोदी की रैलियों पर आतंकी खतरा मंडराता रहता है, फिर भी मोदी की रैली सफल होती है। यह छोटी बात नहीं है। ऐसा लगता है कि कांग्रेसी नेताओं की तरह समाजवादी भी मोदी की हकीकत को समझने के बजाये उनकी तरफ से मुंह मोड़ लेना चाहते हैं। इस तरह से चुनाव जीते जा सकते होते तो पांच राज्यों में हुए चुनावों में कांग्रेस की हालत इतनी पतली न होती। अखिलेश एंड पार्टी जितनी जल्दी समझ लेंगे कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर बनने जा रहे हैं उतना ही उनके लिये अच्छा होगा।
 
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिये भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं तो सपा ने मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर रखा है। क्या,यह कल्पना की जा सकती है कि मोदी की तरह मुलायम और अखिलेश यादव भी गुजरात में जाकर  इतनी बड़ी जनसभा कर सकते हैं। इसका जवाब शायद कोई समाजवादी देना पसंद नहीं करेगा, परंतु हकीकत यही है कि सपा नेतृत्व के पास इसका जवाब ना में ही होगा। बेहतर होता कि मोदी को नकारने की बजाय सपा नेता मोदी के उन सवालों का जवाब देते जिसमें वह(मोदी) चुनौती पूर्ण लहजे में कहते हैं कि केन्द्र मुलायम और माया को डरा सकती है, मुझे नहीं। अखिलेश यह स्पष्ट करते कि नरेन्द्र मोदी का सपा-बसपा और कांग्रेस को तिकड़ी बताना किस तरह से गलत है। मुजफ्फरनगर दंगें किस तरह से गुजरात दंगों से अलग थे, जबकि दोनों ही मामलों में एक जैसे आरोप लगते हैं। गुजरात में मोदी सरकार ने और यूपी में अखिलेश सरकार ने समान रूप से दंगा नियंत्रित करने में देरी से कदम उठाये। गुजरात दंगों के समय मोदी के मंत्रियों की तरह यूपी में मुजफ्फरनगर दंगों के समय अखिलेश सरकार के कुछ मंत्रियों पर भी आरोप लगा था कि उन्होंने दंगा प्रभावित जिलों में पुलिस और जिला प्रशासन पर बेजा दबाव डाला था।
 
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके दाएं-बाएं के लोग अक्सर आरोप लगाते मिल जाते हैं कि राज्य में कुछ ताकतें लोकसभा चुनावों से पहले साम्प्रदायिक तनाव फैला रही हैं, लेकिन यहां भी वह चूक जाते हैं। उनके पास इस संबंध में भी कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं हैं जिसके आधार पर कहा जा सके कि प्रदेश में बाहरी ताकतें सक्रिय हैं। एक भी ऐसी ताकतों की कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। अगर यह मान भी लिया जाये कि कुछ ताकतें राज्य में अमन-चैन खत्म करना चाहती हैं तो सपा सरकार क्या कर रही है। दंगे होना एक बात है और उससे निपटना दूसरी। कुछ ताकतों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दंगा कर दिया तो राज्य सरकार ने क्या किया। एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिये किस तरह से सामाजिक जिम्मदारियों को अखिलेश सरकार भूल गई इस बात का अहसास कोर्ट के रूख से लगाया जा सकता है। दंगों के बाद राहत के नाम पर सरकार ने जिस तरह से अनाप-शनाप फैसले लिये उसने दंगा शांत करने की बजाय आग में घी डालने का काम किया। इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट को दंगों के बाद के हालात की निगरानी करनी पड़ गई। अखिलेश सरकार के कई फैसलों को अदालत ने पलट दिया। चाहें दंगा पीड़ितों की जगह सिर्फ मुसलमान दंगा पीड़ितों को पांच लाख का मुआवजा देने की बात रही हो या फिर एक वर्ग विशेष के शस्त्र लाइसेंस निलंबित करने का मामला, कई मौकों पर अखिलेश सरकार को मुंह की खानी पड़ी।
 
तारीफ करनी होगी सपा सरकार की जिसने अनेकों बार दंगा प्रभावित इलाकों में भेदभाव के कारण कटघरे में होने के बाद भी अपनी गलती नहीं मानी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यही दोहराए जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार सभी समुदायों के फायदे के लिये काम कर रही है। इतना ही नहीं, वह इस बात को गलत सूचना करार दे रहे हैं कि सपा मुस्लिमों के प्रति पक्षपात करती है। अगर कोई मुख्यमंत्री प्रदेश की 21 करोड़ की आबादी को टुकड़ों में बांट कर राज करना चाहता है तो इससे भले ही उसके मंसूबे पूरे हो जायें लेकिन देश का भला नहीं होने वाला है। समाज को साथ लेकर ही चलना पड़ेगा। खैर, बात मोदी फैक्टर से ही खत्म की जाये तो सपा को कुछ राजनैतिक पंडित नसीहत देते हैं कि वह उस कबूतर की तरह गलती न करें जो बिल्ली को देख कर आंख बंद कर लेता है और समझता है कि बिल्ली चली गई। बिल्ली आसानी से उसे अपना निवाला बना लेती है। 
 
संजय सक्सेना
 
लखनऊ

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