मोदी हैं भाजपा के ओबीसी ट्रंप कार्ड

आखिर नरेंद्र मोदी भाजपा के संकट मोचक क्यों बने हुए है? क्यों मोदी भाजपा की जरूरत बन गए है? क्या भाजपा में नरेंद्र मोदी से बड़ा नेता कोई नहीं? क्या भाजपा के सभी बुजुर्ग धुरंधर नेता मोदी की तुलना में कमजोर है या फिर मोदी की तरह जोशाीला भाषण देने में बेअसर हैं? अगर बेसर है तो उनकी राजनीति में क्या जरूरत है? मोदी के अलावा भाजपा में सारे नेता बेकार और बेअसर है तो मोदी की राजनीति के लिए भीड़ कौन जुटा रहा है? और जो नेता भीड़ नही जुटा रहे है क्या उन्हे भाजपा अगले चुनाव में टिकट नहीं देगी? मोदी के मसले पर दर्जनों ऐसे सवाल है जो भाजपा के भीतर से ही निकल रहे है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह मोदी से बड़े नेता है या छोटे? अगर बड़े नेता है तो पार्टी को चुनाव में जीत दिलाने वाले मुखौटा उन्हीं को होना चाहिए।

अगर पार्टी को जीत दिलाने की हैसियत राजनाथ सिंह नहीं रखते तो फिर पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी उन्हें क्यो दी गई? इसी तरह के सवाल भाजपा के उन तमाम बड़े और छोटे नेताओं से किए जा सकते है जो हर चुनाव में चुनाव जीतते और हारते रहे है। चाहे वे आडवाणी हो या फिर मुरली मनोहर जोशी या फिर सुष्मा स्वराज से लेकर जेटली और जशवंत सिंह से लेकर कोई अन्य क्षत्रप नेता। या फिर यह माना जाए कि देश की जनता भाजपा के सभी नेताओ की कहानी देख चुकी है और किसी के उपर जनता का विश्वास नहीं रह गया है? तो क्या इसी वजह से राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा  इमानदार, जोशीला, हिुदंत्व के नए प्रयोगधर्मी और विकास की नई इबारत लिखने वाले मोदी को आगे कर पार्टी की नैया पार करने के प्रयास में है? इन तमाम सवालों के जवाब हां में ही दिए जा सकते है। आज की तारिख में मोदी भाजपा के लिए कमजोरी बन चुके हैं। अटल,आडवाणी युग के अवसान के बाद भाजपा में फिलहाल अभी कोई ऐसा नेता नहीं है जिसे आगे बढाकर वोट की राजनीति की जाए और  कमजोर हो रही पार्टी को मजबूत किया जाए।

लेकिन बात केवल यहीं तक नहीं हैं । संघ और भाजपा मोदी के नाम पर दूर की राजनीति करने जा रही है। वह राजनीति है अति पिछड़े वर्ग की राजनीति। भाजपा अगर इस राजनीति को करने में सफल हो जाती है तो तय मानिए यह अब तक की सबसे नई राजनीति होगी और जिस प्रधानमंत्री के पद पर अब तक लगभग अगड़ी जाति ही बैठते रहे हैं वह परंपरा भी बदल जाएगी या फिर टूट जाएगी। आजाद भारत के इतिहास में अभी तक सभी 14 प्रधानमंत्री अगड़ी जाति के ही रहे हैं और इनमें 51 साल तक तो सिर्फ ब्राम्हणों ने ही प्रधानमंत्री की कुर्सी की शोभा बढाई है। भाजपा की अंदुरूनी राजनीति इसी मिथक को तोड़ने की है।

मिथक तोड़ने की इस कवायद में देश का अति पिछड़ा वर्ग अगर अति पिछडे समाज से आने वाले मादी के पक्ष में खड़ा हो गया तो भाजपा की जीत से कोई इंकार नहीं किया जा सकता और न ही मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी से कोई अलग ही कर सकता। लेकिन इसमें सवाल आता है कि  इसी पिछड़े वर्ग से तो शिवराज सिंह चैहान भी आते हैं तो फिर भाजपा या संघ ने चैहान जैसे पिछड़े नेताओं पर दाव क्यों नहीं खेला? साफ है कि अभी भाजपा को एक आक्रामक पिछड़े नेता की जरूरत है न कि चैहान जैसे विनम्र और मीठा बोलने वाले चैहान जैसे नेता की। चैहान जिस तरह के नेता है उसका लाभ उन्हे आगे मिलेगा लेकिन अभी तो मोदी की ही जरूरत है। जाहिर है कि भाजपा मोदी जैसे तेवर वाले पिदड़े नेता को आगे करके आगामी राजनीति को साधने में लगी है। भाजपा के लिए इससे बेहतर राजनीति हो भी नहीं सकती है लेकिन इस पूरे मामले में डर है कि अगर मोदी के नाम पर भाजपा अति पिछड़े वर्ग की राजनीति को साध नहीे पाए तो मादी के साथ ही भाजपा की राजनीति और कमजोर हो जाएगी।

इस समय देश में ओबीसी की आवादी 40 फीसदी के आस पास है। इस आवादी को देखकर कहा जा सकता है कि चुनावी गणित को बनाने और बिगाड़ने में यह समाज अहम है। देश में कई ऐसे राज्य है जहां ओबीसी की बहुतायत है। तामिलनाडू में 72 फीसदी ,बिहार में 58 फीसदी, केरल में 58 फीसदी और उत्तरप्रदेश में 50 फसदी आवादी अति पिछड़ों की है और चुनावी राजनीति में यह वर्ग ही निर्णायक भूमिका में है। इस समाज से केवल यादव समाज के लोग ही कुछ प्रदेशों में कुछ राजनीतिक पार्टियों का खुल कर समर्थन कर रहे है या यह कहा जाए कि इन्हीं के दम पर कुछ पार्टियां जीवित है। उदाहरण के तौर में बिहार में लालू प्रसाद की पार्टी राजद और उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह की पार्टी सपा यादव सेंट्कि पार्टी हैं। लेकिन बाकी के ओबीसी वोटर विभिन्न दलों में बंटे हुए है या फिर हमेशा बदलते रहे हैं।

यही वह वर्ग है जो समाज में सबसे ज्यादा आक्रामक है और राजनीति को प्रभावित करने वाला भी। समाज के दो अन्य वोटर वर्ग अनुसूचित जाति और जनजाति का राजनीतिक मिजाज लगभग स्थिर माना जाता है और वे बहुत ही कम बदलाव करते हुए अपना वोट उम्मीदवार या पार्टी के नाम पर देते रहे है। लेकिन ओबीसी की वोट प्रवृति बदलती रही है। पिछले 25 साल में तो उसकी वोट प्रवुति में कुछ ज्यादा ही बदलाव हुए है। 80 के बाद हिंदी पट्टी से जिस तरह कांग्रेस का सफाया हुआ है उसके मूल में ओबीसी वोट बैंक का कांग्रेस से हटना रहा हैं। 1989 में देश की राजनीति में वीपी सिंह का उदय,उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह, मुलायम सिंह, बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, आंध्रा प्रदेश में तेलगुदेशम पार्टी का उदय इसी ओबीसी वोट के ध्रुवीकरण से हुआ है। इन नेताओं ने अपने अपने हिस्से के पिछडे वोट को अपने पाले में करने में सफलता पायी और कांग्रेस को कमजोर किया। आखिर कांग्रेस से  अति पिछड़े क्यों भागे? दरअसल कांग्रेस की राजनीति हर राज्यों में वहां के प्रभावी जाति के हाथ में शासन की बागडोर देने के आधार पर चलती रही है। आंधप्रदेश में रेड्डी, कर्नाटक में वोकालिंगा और लिंगायत को, गुजरात में क्षत्रिय, बिहार उत्तरप्रदेश में ठाकुर और ब्राम्हण और राजस्थान में जाट समाज के नेताओं के हाथ में शासन का बागडोर रहा है। इस सामंती समाज के सामने दलित और आदिवासी वोटर प्राकृतिक रूप से जुड़ी होती थी।  साथ में मुसलमान भी। कांग्रेस ने अति पिछड़े समाज के नेताओं को कभी भी  आगे बढाने में रूचि नहीं ली।

यही वजह है कि मंडल आयोग क बाद अति पिछड़ों ने राजनीतिक विकल्प की तलाश शुरू की । यह 90 का ही दशक है कि जब भाजपा ने इस वोटर वर्ग को साधा और इसका लाभ भी उसे हुआ। लेकिन 2002 में भाजपा से ओबीसी का मोह तब भ्रग हो गया जब कल्याण सिंह भाजपा से अलग हुए। कल्याण सिंह भाजपा से 99 में अलग हुए थे। राजनीति का यह ऐसा मोड़ है जहां से कुछ दलों को झटके लगने शुरू हुए तो कुछ दलों की राजनीति फलने फुलने लगी। उत्तरप्रदेश में ही दलित बसपा के साथ हो गए। यादव और मुसलमान पर सपा का कब्जा हो गया। अगड़ी जाति भाजपा के साथ चली गई और गैर यादव ओबीसी स्थिर हो गई। वह कहां जाए, कौन उसका नेतृत्व करे की राजनीति में वह फंस गई। आज भाजपा की पूरी राजनीति इसी गैर ओबीसी वोटर को अपने बस में करने की है। यही वह वर्ग है जिसमें हिंदुत्व की भावना सबसे ज्यादा है और सबसे आक्रामक भी। फिर टुकड़ों टुकड़ों में बंटी इस वर्ग की जातियों की राजनीति करने वाला भी अभी कोई नहीं हैं। यह एक बड़ा वोट बैंक है और भाजपा इस वोट बैंक को साधने में सफल हो जाती है तो मोदी के नाम पर शुरू की गई अति पिछड़ों की राजनीति भाजपा को अंजाम तक पहुंचा सकती है।

भाजपा इस वर्ग को इसलिए भी साध रही है कि कांग्रेस ने इस वर्ग को मिलने वाले आरक्षण में से साढे चार प्रतिशत गरीब मुसलमानों को देने की बात कह चुकी है। अग इसे 9 फीसदी तक बढाने की बात है। भाजपा, कांग्रेस की इस  मुस्लिम समर्थक राजनीति को चुना लगाकर पिछड़ो की राजनीति करेगी। अति पिछड़ों की राजनीति को केंद्र में रखकर ही भाजपा पिछले कई सालों से कुछ प्रदेशों में पिछड़े नेताओं के हाथ में राज्य का बागडोर देते जा रही है। गुजरात में मोदी,बिहार में सुशील कुमार मोदी, मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चैहान और महाराष्ट् में गोपीनाथ मुंडे इसी के प्रतीक हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों तक एनडीए के अधिकतर समर्थक दल वहीं रहे हैं जो पिछड़ो की राजनीति करते रहे है। यह भी सळी है कि अति पिछड़ों की राजनीति करने में भाजपा कांग्रेस से आगे निकलती दीख रही है लेकिन दिक्कत ये है कि अभी तक भाजपा ने विभिन्न तरह के मोर्चा और प्रकोष्ट तो खेल रखे हैं लेकिन अति पिछड़ा प्रकोष्ट आज तक उसके पास नहीं है। भाजपा क सोंच है कि ओबीसी और गरीब मुसलमानों की राजनीति मंडल कमीशन की देन है और अगर इसे साध लिया जाए तो राजनीति की धारा बदल सकती है। देखना ये है कि मोदी के लोग और भाजपा के रणनीति कार इसे बड़े वोट बैंक को कैसे साधते है।  पिछड़े वर्ग के मोदी का जादू बिहार में नीतीश की राजनीति को कितना झटका देता है और उत्तरप्रदेश में मुलायम और कांग्रेस के वोट बैंक को कितना अपने पाले में लाने सफल होते हैं इस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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