मोहन बाबू ने कहा- नौकरी चलती रहेगी, लेकिन होगी ठेके पर

: पत्रकारिता के संस्मरण – (दो) : पत्रकारिता में कुछ भी दाएं-बाएं नहीं होता। यहां पर तो जो कुछ है वह सपाट है, स्ट्रेट है और यथास्थितिवादी है। बस उसके अर्थ अलग-अलग निकाले जाते हैं। राइट अपने हिसाब से मायने निकालता है और लेफ्ट अपने लिहाज से। इसीलिए देखिए कि चाहे वे वामचिंतक हों या दाम चिंतक सहारा एक ही रिपोर्ट का लेते हैं और परस्पर उसी के भरोसे युद्ध चलाते हैं। जब दिनमान सूर्य की भांति अपनी चमक बिखेर रहा था तभी धूमकेतु की भांति उदय हुआ रविवार।

धर्मयुग के दो पुराने सहयोगी सुरेंद्र प्रताप सिंह और उदयन शर्मा की जोड़ी ने इस साप्ताहिक पत्र को कलकत्ता से निकाला। बंगला के मशहूर अखबार आनंदबाजार पत्रिका समूह की तरफ से निकाले गए इस साप्ताहिक ने बाजार में आते ही पत्रकारिता के सारे रंग-ढंग बदल डाले। यह दिनमान की भांति धीर-गंभीर नहीं बल्कि चंद्रमा की तरह चंचल और सुर्ख था। जनता पार्टी के शासन काल में यह व्यवस्था विरोध के नाम पर निकाला गया और पहली बार लगा कि पत्रकारिता से सरकारें डरने लगी हैं, राजनेता भय खाने लगे हैं। और पत्रकार की हैसियत उनके बीच एक मध्यस्थ की बन गई है।

पहली बार रविवार ने उन क्षेत्रों और उन प्रतीकों पर लेख लिखवाए जो तब तक की शालीन और मर्यादित पत्रकारिता के लिए वर्जित था।

अप्रैल १९७८ में रविवार में मेरी एक स्टोरी छपी 'अर्जक संघ उत्तर प्रदेश का डीएमके'। इसके बाद सुरेंद्र प्रताप सिंह से चिट्ठियों के जरिए संवाद का सिलसिला शुरू हुआ। तभी वहां कुछ नई भरतियां शुरू हुईं मैने भी आवेदन किया और कानपुर से तीन लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। एक मैं, दूसरे संतोष तिवारी और तीसरे बलराम। साथ ही यह भी बताया गया कि आने-जाने का किराया दिया जाएगा। यह दूसरी बात ज्यादा उत्साहित कर रही थी। इंटरव्यू में पास हो या फेल किराया मिलेगा। हम तीनों तूफान मेल पकड़ कर अगले रोज शाम को पहुंच गए हावड़ा। वहीं हावड़ा होटल में सामान रखकर चल दिए कलकत्ता। अति उत्साह में इंटरव्यू के एक दिन पहले ही आनंदबाजार पत्रिका के दफ्तर में पहुंच गए। रिशेप्सन में एक आदमी जोर-जोर से अंग्रेजी में हल्ला कर रहा था। और रिशेप्शन पर बैठा आदमी सहमा हुआ सा उसे बांग्ला में समझा रहा था।

पता चला कि हल्ला करने वाला शख्स रघु राय हैं। मशहूर फोटोग्राफर। हमने नमस्ते किया तो उन्होंने कोई जवाब तक नहीं दिया। अंदर जिस केबिन में रविवार का दफ्तर था वह मुश्किल से आठ बाई दस का एक कमरा था जिसके एक कोने में सुरेंद्र प्रताप सिंह बैठे थे। उनकी टेबल के सामने का हिस्सा कुछ उठा हुआ था शायद स्पांडलाइटिस से बचने के वास्ते यह व्यवस्था हुई होगी। उनके सामने साइड में अनिल ठाकुर और कुछ ही दिनों पहले 'भगवान' के घर चार दिन बिताकर लौटे राजकिशोर बैठे थे।

सुरेंद्र प्रताप सिंह से मिलकर अच्छा लगा और महसूस हुआ कि यह आदमी तो हम लोगों जैसा ही है। अगले रोज इंटरव्यू में सारे सवाल तो ठीक पाए गए लेकिन जब स्नातक की डिग्री दिखाने को कहा गया तो सिवाय बलराम के हम और संतोष तिवारी सिफर निकले। संतोष की पढ़ाई जारी थी और मैने बी एससी पार्ट वन करके पढ़ाई छोड़ दी थी और घर से भागकर पहले कलकत्ता फिर पटना और अंत में वाराणसी सारनाथ आ गया था जहां से पिताजी मुझे पकड़ कर लाए थे। लेकिन इन तीन सालों की भागादौड़ी में मैने सारनाथ रहकर पाली सीख ली थी। बाद में इमरजेंसी के कुछ पहले एक साप्ताहिक अखबार निकाला और इमरजेंसी में छापा पड़ा तो गांव चला गया जहां बाबा ने शादी करवा दी। बाद में फिर पढ़ाई अवरुद्ध होती ही चली गई। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि आनंद बाजार पत्रिका समूह के नियमों के मुताबिक ग्रेजुएट होना जरूरी है। पर हमें कोई मलाल नहीं था। कलकत्ता घूमना हो ही गया।

संतोष तिवारी तो वापस चले गए लेकिन मैं और बलराम वहीं कुछ और दिनों तक के लिए रुक गए। पर तभी १९७८ की भयानक बारिश के चलते ट्रेनें ठप हो गईं और बड़ा बाजार में नावें चलने लगीं। पैसा जो लाए थे वह भी खत्म होने लगा इसलिए हमने बड़ा बाजार गुरुद्वारे में जाकर शरण ली। सुबह शाम लंगर छकते और बाकी समय वहीं कोठरियों में रात काटते। एक दिन ऊबकर हम फिर सुरेंद्र प्रताप सिंह के पास गए और उनसे अपना दुखड़ा रोया कि हमारे पास पैसे खत्म हो गए हैं। जो आपके यहां से किराये के पैसे मिले थे वे भी और ट्रेनें बंद पड़ी हैं हम जाएं तो कैसे जाएं। सुरेंद्र जी में गजब की आत्मीयता थी। उन्होंने तत्काल आनंद बाजार प्रबंधन से कह कर हमारे जाने के लिए लखनऊ तक का हवाई टिकट मंगवा दिया और सौ-सौ रुपये भी दिए यह कहकर कि भविष्य में जरा जल्दी ही लेख भेज देना उसी में काट लिया जाएगा। हमारी खुशी का पार नहीं था। तब हवाई यात्रा के तो हम हवाई किले ही बनाया करते थे और ऊपर से सौ-सौ रुपये। खैर हम वाया लखनऊ वापस आ गए। बिना उन सौ रुपयों में से एक पैसा खरचे। अमौसी हवाई अड्डे पर उतरते ही हमने पहला काम तो यह किया कि अमौसी रेलवे स्टेशन तक पैदल गए और वहां से भारतीय रेल सेवा की फ्री सेवा ली। जब हम कानपुर सेंट्रल से पैदल चलकर घर पहुंचे तो सौ रुपये यथावत थे।

अब यह अलग बात है कि हम तीनों में से किसी का भी रविवार में चयन नहीं हुआ। हमने कहा कि हो जाता तो भी हम नहीं जाते। एक तो रविवार के कमरे में बैठने की जगह तक नहीं है दूसरे कलकत्ता की बारिश और बाढ़ का क्या ठिकाना!

रविवार ही नहीं बगैर ग्रेजुएशन कंपलीट किए सांस्थानिक मीडिया हाउसों में नौकरी मिलने से रही और कालेज जाकर पढ़ाई करने का मन नहीं करता था। वहां जो प्रोफेसर थे वे कभी मेरे साथ पढ़ चुके थे। उम्र करीब २५ साल हो आई थी और पुत्री का पिता भी बन चुका था। फ्रीलांसिंग में पैसा तो था पर स्थायित्व नहीं। इसलिए नौकरी कर लेने की ठानी। मैने एक कहानी लिखी वंश हत्या, जो दैनिक जागरण के साप्ताहिक परिशिष्ट में छपी। यथार्थवादी समानांतर कहानी का युग था। उसके छपते ही हंगामा मच गया और दैनिक जागरण के समाचार संपादक हरिनारायण निगम ने मुझसे पूछा कि नौकरी करोगे? मैंने कहा- 'जी', तो बोले कि ठीक कल आ जाना।

अगले दिन उन्होंने मुझे दैनिक जागरण के मालिक संपादक नरेंद्र मोहन जी से मिलवाया। जिन्हें वहां सब मोहन बाबू कहते थे। वहां एक और सज्जन, जो भी शायद कोई शुक्ला ही थे वे टोपी तो नहीं लगाए थे लेकिन अपने कुरते की आधी बाजू समेटे हुए थे, को भी इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। वे श्रीमान शुक्ल जी हाई स्कूल से लेकर एमए हिंदी तक प्रथम श्रेणी में थे तथा पी एचडी कर रहे थे। मोहन बाबू ने मेरे सामने ही उनसे पूछा कि एक निजी कार और टैक्सी में क्या फर्क है? वे बोले- टैक्सी काली-पीली होती है। मोहन बाबू उनके जवाब से खुश नहीं हुए और यही सवाल मुझसे दोहरा दिया। जाहिर है एक जवाब मुझे मिल ही चुका था। और अब उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं था इसलिए मैने कहा कि टैक्सी की नंबर प्लेट सफेद पर उसकी लिखावट काली होती है और प्राइवेट कार की नंबर प्लेट काली पर नंबर सफेद से लिखे जाते हैं। मालूम हो तब तक ऐसा ही होता था।

अब तो निजी कार की नंबर प्लेट सफेद और नंबर काले होते हैं। मोहन बाबू खुश और चयन तय। न उन्होंने पूछा कि ग्रेजुएट हो या नहीं न मैने बताया। और यह बात मैने हरिनारायण निगम साहेब को भी नहीं बताई थी। मेरा चयन हो गया पर कार्मिक विभाग ने जब मेरी पढ़ाई लिखाई का ब्यौरा मांगा तो मैने अपने को स्नातक बता दिया। लेकिन डिग्री या माक्र्सशीट कहां से लाऊँ? अंत में मैने वहां पर तब मैगजीन एडिटर विजय किशोर मानव से सलाह ली और न्यूज एडिटर हरिनारायण निगम को सारा किस्सा बता दिया।

मोहन बाबू ने कहा कि ठीक है नौकरी चलती रहेगी लेकिन होगी ठेके पर। जब तक स्नातक नहीं कर लेते ग्रेड नहीं मिलेगा। साढ़े चार सौ रुपये महीने की पगार तय हुई। लेकिन यह ठेके की नौकरी मेरे लिए मुफीद हो गई। इसमें न तो कोई हाजिरी का झंझट था न समय का और खूब लिखने-पढऩे तथा फ्रीलांसिंग की पूरी आजादी। यहां तक कि जो कुछ मेरा दैनिक जागरण में भी छपता उसका भी पैसा मिलता। तब मोहन बाबू हर सोमवार को संपादकीय विभाग की एक बैठक करते और कुछ सवाल पूछते जो उसे बता देता उसकी जय-जय। कुछ ऐसा हुआ कि पहली ही बैठक में मोहन बाबू ने पूछा कि बताओ फाकलैंड कहां है? उन दिनों फाकलैंड पर कब्जे को लेकर अर्जेंटीना और ग्रेट ब्रिटेन में युद्ध चल रहा था। मैं चूंकि फ्री लांसिंग के चक्कर में इंडियन एक्सप्रेस घर पर मंगाया करता था इसलिए इस सवाल का जवाब दे दिया। बाकी के सब मुँह ताकते रहे।

मोहन बाबू बड़े खुश हुए और मेरा उसी रोज से पचास रुपये महीने मेहनताना बढ़ गया। जब मैं जागरण में भरती हुआ तब दिसंबर १९७९ चल रहा था। अपने राजनीतिक गुरु डॉक्टर जेबी सिंह के आग्रह पर मैने कालेज में एडमिशन ले लिया और १९८१ की जुलाई में मेरा ग्रेजुएशन कंपलीट। लेकिन तब कानपुर विश्वविद्यालय का सत्र इतना लेट चल रहा था कि रिजल्ट आते-आते १९८२ आ गया और तब मुझे मिल पाया दैनिक जागरण में सब एडिटर का ग्रेड। लेकिन इस बीच भले मैं ठेके पर काम करता रहा पर मोहन बाबू और निगम साहेब ने मुझसे हर तरह की रिपोर्टिंग कराई। खूब बाहर भेजा और गांव-गांव जाकर मैने मध्य उत्तर प्रदेश की दस्यु समस्या और गांवों में उभरते नए जातीय समीकरण तथा नए प्रतीकों पर शोध ही कर डाला।

इसी दौरान में मैं मैनपुरी एटा के दस्यु छविराम यादव उर्फ नेताजी से मिला। इटावा के मलखान सिंह से मिला, बाबा मुस्तकीम से मिला। तब तक शायद डकैतों से मिलना आसान नहीं हुआ करता था और डाकुओं के बारे में वैसी ही अफवाहें हुआ करती थीं जैसी कि सुनील दत्त की फिल्में देखकर लोग बनाया करते थे। लेकिन हर डकैत से मैं गांवों के बीचोबीच उनके ठिकानों पर ही मिला और पूरा गांव जानता था कि ये पत्रकार किसके घर जा रहा है। इसके बाद मैने बुंदेलखंड पर ध्यान फोकस किया और वहां की सामाजिक समस्याओं पर लिखा।

एक दिन मैं जागरण के सर्वोदय नगर स्थित दफ्तर से रात करीब नौ बजे निकलकर घर जा रहा था। पैदल ही था और सोचा कि कुछ दूर आई हास्पिटल से टैंपू पकड़ लूंगा। लेकिन दफ्तर से और आई हास्पिटल तक का करीब आधे किमी का रास्ता एकदम सूना और बीच में खूंखार कुत्तों का इलाका था। मैं गेट से निकलकर कुछ ही कदम बढ़ा था कि एक लंबी सी कार मेरी बगल से गुजरी। कार मोहन बाबू की थी। मेरे मन में एक ख्याल कौंधा कि काश मुझे भी इस कार में बैठने का मौका मिले।
आश्चर्य कि वह कार अचानक बैक होने लगी और मेरे बगल में आकर रुकी। अंदर मोहन बाबू बैठे थे। उन्होंने खिड़की का सीसा खोला और बोले- अंदर आ जाओ शंभूनाथ। मैं उनकी सौजन्यता से अभिभूत था। मैने कहा नहीं भाई साहब मैं चला जाऊँगा। पर मेरी नकार के बावजूद उन्होंने मुझे कार में बिठा लिया। मैने उनसे कहा कि भाई साहब मेरा गांव यहां से कुल तीस किमी है पर अपना अखबार वहां तीन दिन बाद पहुंचता है। ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए कि अखबार वहां भी रोज का रोज पहुंचे। लोग अखबार पढऩा चाहते हैं। इस एक बात ने पता नहीं क्या असर डाला मोहन बाबू पर कि अगले ही रोज उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि शंभूनाथ कल से तुम कानपुर से लेकर एटा तक और दूसरी तरफ सुल्तानपुर तक और बुंदेलखंड में महोबा तक खूब दौरा करो और स्टोरी निकाल कर लाओ अखबार मैं गांव-गांव पहुंचा दूंगा। और इसके बाद मैं हो गया दैनिक जागरण का रोविंग करस्पांडेंट।

लेखक शंभूनाथ शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता, अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. पत्रकारीय जीवन का अपना संस्मरण वह अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित कर रहे हैं.


इसके पहले का पार्ट पढ़ें:

जब मैं सिर्फ बनवारी जी से मिलने साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर दिल्ली आ गया

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