यशवंत-अनिल के उत्पीड़न व गिरफ्तारी की भोपाल उद्घोषणा में भर्त्सना की गई

बड़े-बड़े दानवाकार मशीनों के दौर से निकल आपके नोटबुक तक में सिमट कर रह जाने वाले सम्प्रेषण के इस दौर ने, कबूतर के ज़माने से लेकर अब कंप्यूटर तक पहुच जाने वाले संदेशों के आदान-प्रदान के इस उपकरण ने ढेर सारे संभावनाओं को जन्म तो दिया ही है लेकिन आशंकाएं भी सौतेली बहनों की तरह इस नए ज़माने के साथ चल रहा है. एक ऐसा दौर, सूचना तकनीक की ऐसी क्रान्ति, समाचारों का ऐसा विस्फोट जब सामने हो तो ज़रूरी यह भी है कि कर्णधारगण मिलकर अपने रास्ते का निर्धारण करें. इस तरह का एक नया प्रयास पिछले दिनों मध्य प्रदेश शासन के सहयोग से भोपाल अवस्थित संस्था स्पंदन ने किया था.

‘विकास की बात नए मीडिया के साथ’ इस विषय पर भोपाल में आयोजित यह चौपाल अपने स्वरुप और नए मीडिया के दिग्गजों की उपस्थिति में संपन्न हुआ. यह आयोजन आने वाले समय के वेब मीडिया के इतिहास में निश्चय ही मील का पहला पत्थर साबित हो सकता है. कोर्पोरेट मीडिया और सांप- सांपिन- सावंत- सनी को ही ‘खबर’ बना कर बेचने के इस कठिन समय में निश्चय ही वेब मीडिया ने वैकल्पिक मीडिया के रूप में कम समय में ही स्थापित हो गया है.

मीडिया का लोकतांत्रीकरण : इस आयोजन के द्वारा यह पहली बार संभव हो पाया कि कथित मुख्यधारा ने इस मीडिया की ताकत को पहचाना. कार्यक्रम में उपस्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव जी का ने यह कहा कि वास्तव में नये मीडिया ने समाचार माध्यमों का लोकतांत्रिकरण किया है. वास्तव में यह मीडिया ऐसा है जिसे न तो किसे सेंसर से गुजरना है, न यहां कोई मालिक है और न ही कोई संपादक. सामान्यतः व्यक्तिगत प्रयासों से न्यूनतम खर्च में चलने और अपनी त्वरित पहुच के कारण यह माध्यम ज्यादा प्रभावी रूप में सामने आया है. वास्तव में इस माध्यम ने संविधान में वर्णित अभुव्यक्ति की आज़ादी को सही अर्थों में लोगों तक पहुचाने का काम किया है.

अब सवाल यह है कि जब आभासीय रूप से सारे नए मीडियाकर्मी एक दुसरे से सम्पर्कित हो ही जाते हैं तो क्या ऐसे आयोजनों की ज़रूरत है? शायद ऐसे में ऐसे आयोजनों की और ज़रूरत है. एक तो हम कितने भी मशीनी भी हो जाय फिर भी व्यक्तिगत मेल मिलाप का कोई विकल्प नहीं होता.

अवसर और चुनौतियां : इस आयोजन में जो मुख्य बातें उभर कर सामने आया वो यह कि आज एक बड़ी ताकत हो जाने के बाद भी इस मीडिया में काम करने वाले स्वयंसेवकों के लिए कई तरह के दवाबों का सामना करना पड़ता है. खास कर इस बात पर चिंता जताना उचित ही था कि सरकारें इस माध्यम को काबू में रखने की जुगत भिडा रही है. सर्वानुमति इस बात पर थी कि वर्तमान में किसी भी तरह के सरकारी अंकुश की ज़रूरत इस माध्यम को फिलहाल नहीं है और ऐसे किसी भी कदम का ज़ोरदार विरोध किया जाएगा.

पहुंच और प्रभाव : कार्यक्रम में उपस्थित दलित इसाई चिन्तक आर एल फ्रांसिस का कहना था कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भले ही 70 प्रतिशत वेब मीडिया ‘चर्चों’ के कब्ज़े में चली गयी हो लेकिन भारत में आज अस्सी प्रतिशत से अधिक भारतीय साइटें मोटे तौर पर राष्ट्रवादियों द्वारा चलाई जा रही है. श्री फ्रांसिस का आशय चाहे जो रहा हो लेकिन भारतीय दृष्टि से इसे एक शुभ संकेत तो माना ही जा सकता है कि बाज़ार और राष्ट्रद्रोही ताकतों के दबाव में कथित मुख्यधारा की मीडिया में जो ज़रूरी विचार या खबरें हाशिए पर थी उसे इन दबावों से मुक्त करके लोगों तक सरोकारी खबरें पहुचना संभव हो पाया है.

वित्तीय मॉडल : भले ही आज नए मीडिया के महारथीगण कोर्पोरेट मीडिया के बाजार में केवल लुकाठी हाथ में लेकर खड़े हों लेकिन अब यह आवश्यक है कि वेब मीडिया के लिए एक वित्तीय मॉडल पर बात हो. उचित तो यह होगा कि इस माध्यम को विज्ञापन आदि देकर अन्य माध्यमों की तरह इसे भी सशक्त बनाया जाय. इसके लिए सरकारों द्वारा एक नीति निर्धारित की जाने की ज़रूरत महसूस की गयी.

संसद बनाम चौपाल : कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद श्री प्रभात झा ने वास्तव में इस आयोजन में अपने ही ज़मात को आइना दिखाया. उनका कहना था कि आज संसद वास्तव में अपने सरोकार से कोसों दूर हो गया है. संसद के केंद्रीय कक्ष में आपको ऐसी ही चर्चा सुनने को मिलेगी जिससे गांव-गरीब-किसान आदि का कोई सरोकार नहीं है होता. ऐसे में उन्होंने यह भरोसा जताया कि ऐसे वेब चौपाल ही वास्तव में देश में लोकतांत्र को मज़बूत करने का काम करके अपने प्रतिनिधियों को भी सही अर्थों में आइना दिखायेगा.

भोपाल उद्घोषणा : इस आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा दिन भर के उपयोगी विमर्श के बाद बहुमत से विन्दुबार एक प्रस्ताव पारित करना. मुख्यतौर पर निम्नलिखित छः डिक्लेरेशन ने इस कार्यक्रम को वास्तव में सार्थकता प्रदान की.

– वेब को ही मुख्यधारा माना जाना : प्रतिभागण इस निष्कर्ष पर पहुचे के प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक माध्यमों की प्रासंगिकता भले खत्म नहीं हुई हो लेकिन वर्तमान पारिस्थिति में अब यह ज़रूरी है कि वेब माध्यम को ही मुख्यधारा के समाचार माध्यम के रूप में मान्यता दिया जाना चाहिए.

– वेब पत्रकारों को अधिमान्यता : इस मीडिया के पत्रकार ज्यादे बड़ी चुनौतियों के साथ काम करते हैं, अतः यह आवश्यक माना गया कि सरकारों के द्वारा सबसे पहले इन्हें अन्य माध्यमों की तरह ही अधिमान्यता दी जाय.

भाषा विमर्श : चौपाल में सभी वेब पत्रकारों ने एकमत से यह संकल्प लिया कि वे अपनी बात सभ्य,शालीन लेकिन दमदार तरीके से रखेंगे. किसी भी तरह की अश्लीलता को प्रोत्साहन नहीं देंगे.
वित्तीय मॉडल : सरकारों द्वारा वेब के लिए उसके हिट्स के आधार पर विज्ञापन की नीति तय करने की ज़रूरत महसूस की गयी. इस सम्बन्ध में चौपाल ने अलेक्सा रेंकिंग को फिलहाल मानक बनाने की सलाह दी. नया मीडिया : चौपाल ने इस तथ्य को स्पष्ट किया कि ‘नया मीडिया’ से उनका आशय केवल व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा चलाये जा रहे वेब माध्यमों से ही है. कोर्पोरेट अखबारों के वेब एडिशन को इस दायरे में नहीं रखा जा सकता.

वेब पत्रकारों के दमन के खिलाफ प्रस्ताव : आयोजन में इस बात पर आक्रोश व्यक्त किया गया कि सरकारों एवं प्रचलित मीडिया के द्वारा यदा-कदा पत्रकारों का दमन किया जा रहा है. इस सम्बन्ध में भड़ास4मीडिया.कॉम के संपादक यशवंत सिंह एवं उनके सहयोगी अनिल सिंह की यूपी पुलिस द्वारा की गयी दमनात्मक गिरफ्तारी की भर्त्सना करते हुए दोनों वेब पत्रकारों की बिना शर्त जल्द रिहाई की मांग की गयी.

निष्कर्षतः जीवन की तरह ही किसी आयोजन का भी आशय मोटे तौर पर सार्थकता और सुख की तलाश होनी चाहिए. इस आयोजन ने सबसे पहले देश-दुनिया के विभिन्न हिस्सों से एक प्रोफाइल के रूप में दिखने वाले मित्रों को साक्षात मिलने का अवसर देकर वास्तव में सभी प्रतिभागियों को आनंदित किया. साथ ही उपरोक्त चर्चा के आलोक में इस आयोजन को सार्थक भी कहा जा ही सकता है. ज़रूरत इस बात का है कि भोपाल में नए मीडिया एक्टिविस्ट अनिल सौमित्र द्वारा शुरू किये गए इस प्रयास को निरंतरता मिले. चौपाल का यह कारवाँ अलग-अलग शहरों राज्यों तक भी पहुचे. सभी वेब पत्रकारों को आपस में मिलने जुलने का हौसला और अवसर देना इस आयोजन को वास्तव में सार्थक कर गया.

पत्रकार पंकज झा की रिपोर्ट.


Yashwant Singh Jail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *