यशवंत की गिरफ्तारी से हैरानी नहीं हुई, केवल डर लगा

यशवंत की गिरफ्तारी की खबर भड़ास से मिली लेकिन अरसे बाद ऐसा हुआ कि रोज के बजाए तीसरे दिन भड़ास खोला। ऐसे पौड़ी जिले के सीमांत क्षेत्रों की यात्रा के कारण हुआ जहां मेरे पास इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। लेकिन जानकारी होने के बाद प्रतिक्रिया के लिए हमेशा की तरह ही मेरे पास इस बार भी शब्द नहीं थे। लेकिन दो चीजें जरूर हुई। एक तो यह कि मुझे यशवंत की गिरफ्तारी पर आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन अजीब किस्म की बैचेनी और भय लगा।

यह कल रात यानी कि 1 जुलाई की रात 11 बजे की बात है। तुरंत किसी से शेयर भी नहीं किया। वैसे देहरादून शहर के तमाम पत्रकारों को मुझसे पहले ही यह बात पता चल चुकी थी।  कल और आज के हिन्दुस्तान में इस मामले की खबरें प्रकाशित हुई हैं। पहले में उन दो कारणों पर आता हूं कि क्यों मुझे यशवंत की गिरफ्तारी पर आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन भय लगा और बैचेनी हुई। आश्चर्य इस कारण नहीं हुआ कि मैं यशवंत को हमेशा से ही संपादक, पत्रकार, फक्कड़ से ज्यादा बागी मानता रहा हूं। यशवंत की बगावत भले ही मीडिया पर ही केन्द्रित रही हो लेकिन यह समझना बेहद जरूरी है कि भारत में मीडिया अब कोई छोटा मोटा कारोबार नहीं रह गया है। हजारों करोड़ के इन मीडिया मालिकों की सच्चाई सामने लाने वाले यशवंत से लगभग हर मीडिया घराना और ऊंचे पदों पर बैठे मीडिया मैनेजर चिढ़े हुए हैं। इसी टकराव के चलते यह बागी गिरफ्तार हुआ है।

कापड़ी ने जो भी किया यह तो यशवंत के खिलाफ पनप रही मनोदशा का एक हिस्सा है। एक सवाल यह भी मेरे मन में है कि इस तरह का प्रकरण होने पर अगर यशवंत की जगह कोई और होता तो क्या कापड़ी रिपोर्ट दर्ज कराने की इतनी ही जल्दी दिखाते या इस गलतफहमी को बातचीत के जरिए हल करने की गुजांइश बनती। दूसरी बात थी कि मुझे आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन डर लगा। यह डर इस कारण था कि यशवंत बच गया और उसकी गिरफ्तारी सार्वजनिक हो गई नहीं तो शायद कुछ भी हो सकता था।

एक और बात मुझे कहनी है कि अगर यशवंत ज्यादा ही मनमौजी है तो भी यह घटना शायद उसके जीवन को नियोजित करेगी। लेकिन अगर मामले को ज्यादा तूल देकर इस मोड़ तक पहुंचाया गया है तो इसका अंजाम भी सबके सामने होगा। बहस इस बात पर कतई नहीं है कि यशवंत पर जो आरोप हैं वह सही हैं या गलत लेकिन यह बात जरूर है कि यशवंत की गिरफ्तारी ने साफ कर दिया है कि न्यू मीडिया भी मीडिया के ठेकेदारों के निशाने पर आ गया है। वे नहीं चाहते कि उनकी बुराई कहीं छपे-दिखे, क्योंकि उन्हें लगता है दिखाने-छापने का ठेका तो सिर्फ उनके पास है, तो भला उनके उपर कौन उंगली उठा सकता है। मीडिया ठेकेदारों की गल्तियों पर सार्वजनिक तौर पर उंगली उठाने का दुस्साहस किया है यशवंत ने।

यहां देहरादून में पत्रकार, यशवंत की गिरफ्तारी से न सिर्फ हैरान हैं बल्कि इस मामले में सारी सच्चाई को सामने देखना चाहते हैं। वैसे गिरफ्तार होना और जेल जाना किसी भी प्रतिरोध की बढ़ती ताकत का ही तो संकेत है। एक और बात जो इस मौके पर कचोट रही है वह यह कि जिन तमाम पत्रकारों का हौसला अनेक रूपों में यशवंत समय समय पर बढ़ाते रहे हैं, वह इस समय कहां हैं? जरूरी नहीं कि सब साथ हो जाएं लेकिन यह चुप्पी भी हैरान कर देने वाली है।

प्रवीन कुमार भट्ट

पत्रकार

देहरादून

praveen.bhatt@rediffmail.com


(प्रवीन कुमार भट्ट ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास दो जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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