पहाड़ यात्रा-1 : भाग निकला बेसुरी दिल्ली से… गर्मियों भर पहाड़ों पर ठीहा… आध्यात्मिक अनुभूति के वास्ते… आत्मिक शांति के लिए… आज दोपहर पहुंच गया… इधर अदभुत शांति है, असीम सुंदरता है… मौन में ढेर सारे स्वर और रंग हैं… हर कुछ में एक सात्विक एहसास, ध्यान धारण सा आनंद… लोग गिने चुने, बस इतने कि शोर शब्द अप्रासंगिक है…
मन तुलना करने लगा है….
शहरों में उफनाए-अफनाए पड़े रहने वाले हम… ब्रह्मांड से एकाकार हो जाने की राह दिखाने वाली आंखें अब तक मुंदी रहने के कारण अपने खोल खांचे हाय हाय भागमभाग में रिपीट होकर नष्ट हो जाने की होड़ लगाए हैं हम… मनुष्यता की तरक्की के इतिहास का असली अध्याय लिखा जाना बाकी है… शायद वो लिखा भी न जाए क्योंकि हमने अभी तक लोभ, लालसाओं, शासन, शासकों, संसाधनों, स्वार्थों, परिवारों, देशों, समाजों, आक्रमणों, युद्धों, सत्ताओं, सिस्टमों और इनके जरिए जिन अच्छे बुरे के पर्सपेक्टिव का निर्माण हुआ, उसको ही इतिहास मानते बताते पढ़ते कहते सुनते आए हैं…
बेकार हैं सारी किताबें, सारे ज्ञान, सारे मानदंड जो ब्रह्मांड, प्रकृति और चरम उदात्तता को अनुभूत कर सकने और इससे एकाकार हो जाने की पहली, आखिरी व बुनियादी समझ न दे सकें… मुझे लगने लगा है अब तक जो जिया, बस यूं ही जीता चला आया… जैसे किसी ने झोंक दिया हो और तमाम भयों-आकांक्षाओं-दबावों को लिए यूं ही जोर जोर से जबरन अनजाने जीता चला आया… अब कुछ कुछ समझ में आ-सा रहा है…
बहुत कुछ कहना चाह रहा लेकिन यह भी लग रहा कि जो कहने लगा वह महूसस करने की यात्रा में रुकने लगा…. जो कहा नहीं जा सके, महसूस कर आनंदित हुआ जा सके, उसे कैसे कहा जा सकता है… यह भी सोच रहा… जिन जिन ने कहने की कोशिश की और जो जो कहा उसे हमने आपने नोट किया, किताब में डाला फिर कोर्स में बदला फिर रट्टा लगवा कर मुर्दा बना डाला… ना.. कुछ नहीं कहा जा सकता… कुछ नहीं बताया जा सकता… जिसमें भाव होगा, चाह होगी, सवाल होगा, तड़प होगी, बेचैनी होगी, साहस होगा, भागने का मन करेगा, तलाशने को तड़पेगा वो जानने लगेगा, वो पढ़ लेगा बिना पढ़े… तो दोस्तों, बतियाएंगे कहेंगे लिखेंगे लेकिन तब जब मन करेगा… अभी तो बस इतना कि नई यात्रा पर आया हूं.. पुराना छोड़ आया हूं.. दरअसल मैं भाग आया हूं…






पहाड़ यात्रा-2 : पहाड़ पर कल दो अजीब घटनाएं हुईं मेरे साथ. बस पर बैठकर जब दूरस्थ एक पहाड़ी गांव जा रहा था तो बस के विंडो सीट और घाटी साइड की ओर बैठा मैं नीचे खाई की गहराई देख सिहर सिहर जा रहा था. बस ड्राइवर था कि लगातार चालीस-पैंतालीस की स्पीड पर बस चला रहा था और मोड़ दर मोड़ को इस तेजी से पार कर रहा था कि बेहद पतली सड़क से बस के फिसलकर नीचे गिर जाने का डर, भय मेरे मन-मस्तिष्क पर छाता जा रहा था. पैरों में सिहरन सी हो रही थी.
मैं खुद को कमजोर पाने लगा. सोचने लगा, क्यों कहता हूं कि मैं अब भावनाओं से उपर उठने लगा हूं, दुखों-सुखों सम भाव की सी स्थिति पाने लगा हूं. सही बात तो ये है कि मैं अब भी भावनाओं द्वारा संचालित हो रहा और दुख-सुख बहुत तगड़े से अपने गिरफ्त में लिए हुए हैं. मैं बस में बैठे ही बैठे यह सोचता रहा कि अगर बस लुढ़क गई तो मैं कैसे खुद को बचाउंगा. मैंने सिर पर लगी टोपी को कसकर दबाकर सिर पर गहरे तक टाइट कर बिठा लिया ताकि एक्सीडेंट की स्थिति में सिर को बचाया जा सके… पर बस में बैठे बाकी लोग मस्त. गाते बतियाते… वे सभी लोकल लोग थे. बस नवाखाल से तूनाखाल जा रही थी. दूरी करीब पंद्रह से बीस किलोमीटर के बीच. जिला पौढ़ी में. हिमालय बचाओ आंदोलन के लिए चल रही पदयात्रा को देर से ज्वाइन करने आए हम लोग समीर रतूड़ी और दीप पाठक के मार्गदर्शन के हिसाब से चल रहे थे.
आखिरकार जब बस तूनाखाल रुकी तो सांस में सांस आई. मैं गहरे चिंता, सोच में डूब गया. लगा, मुझे कोई परीक्षा देनी है. भयों से मुक्ति की परीक्षा. इसीलिए मुझसे एक तगड़ा टेस्ट लिया गया. मैं पहले भी कई बार पहाड़ों पर गया हूं. खुद ड्राइव करके कार से भी गया हूं. पर इतनी उंची पहाड़ी और इतनी पतली सड़क पर बस में यात्रा इतनी स्पीड के साथ कभी नहीं की थी. मुझे बार-बार बस के ड्राइवर पर गुस्सा आए. लग रहा था कि जैसे वो पिये हुए हो. हालांकि ये नतीजा मेरा भयभीत मन निकाल रहा था. बाद में उससे बातचीत की तो समझ आया कि वो बिलकुल पिये नहीं है और वह ऐसा ही बस जमाने से चलाता आया है. जब मेरा भय चरम पर था तो बस में बगल में बैठी बुजुर्ग स्थानीय महिला से पूछा- आपको डर नहीं लग रहा नीचे देख कर? वो मुस्करायीं. थोड़ी देर बाद स्थानीय बोली से मिक्स हिंदी में बोल पड़ीं- कैसा डर, बचपन से यही देखते आए हैं, हम सब यहीं के हैं. पर मैंने उन्हें साफ-साफ बता दिया कि मुझे बहुत डर लग रहा देख कर. वो मुस्कराहट से आगे बढ़कर हंसने तक लगीं. मैं भी उनकी भोली सी हंसी मुस्कराहट और आंखों में मेरे प्रति खूब उत्सुकता देख हंस पड़ा. वो मेरे बारे में देर तक पूछती बतियाती रहीं.
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तूनाखाल पर बस तीन दुकानें. चाय वाला खिलाने के नाम पर मैगी पकाना खिलाना जानता. यही खाए, चाय पिए. फिर तीन किसी आगे बसे इसोटी गांव की ओर चल पड़े, जहां हिमालय बचाओ आंदोलन की टीम के साथी समीर रतूड़ी, दीप जोशी व अन्य गांव वालों के साथ मीटिंग कर रहे थे. पैदल चलते हुए हम लोगों को दो तीन स्थानीय किशोर बच्चों ने बड़े अदब से नमस्ते किया. बहुत अच्छा लगा. पहाड़, हरियाली, एकांत, शांति देख मन गदगद था और अभी चढ़े भय के बुखार से निजात पा चुका था. बाद में जब गांव की मीटिंग में पहुंचे तो नेतृत्वकारी साथियों ने स्वागत परिचय चाय पानी कराकर बैठक में बिठा लिया. समीर रतूड़ी ने महिलाओं, पुरुषों, युवकों को एकत्र करने के बाद खड़े होकर संबोधित करने लगे. गढ़वाल रेंज से पलायन, विस्थापन, सरकारी लूट, गांवों की उपेक्षा, खत्म होती खेती, स्थानीय संसाधनों के उपयोग उपभोग से स्थानीय लोगों को दूर रखने की सरकारी नीतियों, ग्रामीणों की निराशकारी व निष्क्रिय मानसिकता आदि पर लंबी बात रखी. एक जुट होने को कहा. आने वाले जन प्रतिनिधियों और सरकारी अफसरों से चार सवाल पूछने को कहा ताकि उन्हें गांवों के बारे में सोचने को मजबूर होना पड़े. वे लोग चार पन्ने का एक परचा भी बांट रहे थे.
मैं समीर के संबोधन का वीडियो बना रहा था कि आठ नौ मिनट बाद एक फोन आया और वीडियो रिकार्डिंग का काम बीच में रुक गया. और जब तक दुबारा आन करता, मोबाइल डिस्चार्ज हो चुका था. समीर करीब आधे घंटे तक बोले. वे लोग मलेथा गांव (पौढ़ी जिला) से 23 मार्च को पदयात्रा पर निकले. कच्चे-गंवई रास्तों से पैदल चलते हुए बारह-तेरह बड़ी पहाड़ियों को पार कर चुके हैं. 18 अप्रैल को यात्रा गैरसैंण पहुंचकर एक बड़े आयोजन के साथ खत्म होगी. (समापन के दिन वाले आयोजन में शिरकत करने के लिए आप भी आमंत्रित हैं, इसके लिए समीर रतूड़ी से संपर्क 09536010510 पर कर सकते हैं).
गढ़वाल इलाके में किसी ने इतनी बड़ी पहली बार पदयात्रा की है. गांव में मीटिंग खत्म करने के बाद जब हम सब पद यात्रा करते हुए अगले गांव की तरफ बढ़े तो रास्ते में पिछले रास्तों के अनुभवों पर समीर रतूड़ी और दीप पाठक अपने अपने अनुभव, दुख-सुख बताने लगे. कब खाने मिलने में दिक्कत हुई, कब रास्ता भूल गया, कब बाघ का खतरा सामने मंडराता दिखा, कब लगा कि अब नहीं चल पाएंगे, कब-कब निराश हुए, कहां कहां अपनी इस यात्रा पर गर्व महसूस हुआ…. ढेर सारी बातें. दीप पाठक रास्ते में पड़ रहे घासों, पेड़ों, फलों आदि के बारे में बताते जाते, पहचान कराते जाते, खिलाते जाते. बिच्छू घांस से लेकर माल्टा, आड़ू, बुरांश तक का वर्णन. दूसरी आफत, भय से सामना उस समय हुआ जब एक खड़ी पहाड़ी पार करने के लिए सामने थी. नब्बे डिग्री चढ़ाई वाले उबड़ खाबड़ मोड़दार रास्ते पर चढ़ने के पांच मिनट बाद ही सांस धौंकनी की तरह चलने लगी. मैं बैठ गया. ऐसा तीन चार दफे हुआ. बैठा, फिर चल पड़े. समीर और दीप इस सबसे आदी थे, पक चुके थे. हम लोग नए थे.
इतना तेज हांफना और दिल का धड़कना हो रहा था कि जैसे अब हार्ट अटैक यहीं पड़ने वाला है. हाथ से सीने के बाएं तरफ जोर से दबाए मैं तब चौंका जब दीप पाठक ने अपना टेक मेरे हवाले कर दिया. बोले- आराम से इससे टेक लेते हुए चढ़ें. थोड़ी मदद मिलेगी. और सच में उस टेक ने काम किया. पर धौंकनी चलना, हांफना, पसीने से भीगना, तेज-तेज सांसें आना बंद न हुआ. मन में कुछ देर के लिए पश्चाताप होने लगा- कहां आकर फंस गया. लेकिन तभी लगा. यही तो परीक्षा है. अपने पुराने रुटीन और पुरानी स्टाइल से मुक्ति पाए बगैर नए को कैसे जान समझ सकते हैं. शायद ये परीक्षा है. इस तरह दूसरे भय से मुक्ति पाने की लड़ाई लड़ते, हांफते बिलकुल उपर उस जगह पहुंच ही गए जहां रात गुजारनी थी. अब जब इस वक्त यह सब लिख रहा हूं, सामने उपर धार विशाल… दूर तक पहाड़-हरियाली… नीचे घाटी… व्यापक… बहुत नीचे.. सामने वाले पहाड़ पर धूप पहले आया. इधर वाले पर बाद में आया. कुछ देर पहले. रात में खाना किसी के घर खाया और सोने किसी दूसरे के घर पहुंचा. रहना खाना सब फ्री. पूरे चलते रहना है, जो गांव पड़े, वहां मीटिंग कर सबको समझाते बताते रहना है.
आज के दिन जब हम लोग 9 बजे यहां से निकलेंगे तो पूरे दिन करीब 11 किमी चलना है पैदल. इसमें चढ़ाई उतराई दोनों शामिल है. मैं मानसिक रूप से खुद को तैयार कर रहा हूं. कल छोटी सी चढ़ाई पर जो हाल हुआ, उसकी कल्पना कर थोड़ा नर्वस भी हूं कि 11 किमी भला मैं कैसे चल सकूंगा…. लेकिन वो कहते हैं न, सबसे पावरफुल चीज है आपका विल पॉवर, सबसे पॉवर फिल होता है कनविक्शन… सबसे पॉवरफुल होता है जूनून… देह तो माटी है. मन से इसे जिंदा, मुर्दा, मजबूत, कमजोर बनाता मानता है. वो है न, मन के हारे हार है, मन के जीते जीत. कल यात्रा के दौरान ही समीर ने राजीव नयन बहुगुणा से फोन पर बात कराया. मैं हांफते हुए बस कुछ ही लाइनें बोल पाया. चढ़ाई में एक बात और मुझे बताई गई. कम से कम मुंह खोलिए ताकि ताकत बनी रहे, सांस कम फूले, नाक से सांस लें. मतलब, चढ़ाई के दौरान मौन रहना है. मौन बहुत ताकत देता है.
इस घाटी में कुछ है, कोई ताकत है, जो अदृश्य है, जिसे मैं महसूस कर रहा हूं, जो मुझे यहां बुलाए है, घुमाए है. यहां जमीन लोग बेचने को तैयार हैं, खरीदार नहीं. पचास हजार रुपये में एक बीघा जमीन दे रहे हैं. लेने वाला कोई नहीं. उत्तराखंड का सबसे गरीब और सबसे दुर्भाग्यशाली इलाका है ये, समीर बताते हैं. यहां के लोगों को कोई फायदा नहीं मिला उत्तराखंड बनने का. कई कई घरों पर ताले हैं, घर टूट रहे हैं क्योंकि पूरा परिवार दिल्ली या मुंबई या चंडीगढ़ या मेरठ या देहरादून शिफ्ट हो चुका है, यहां नहीं रहते और न रहेंगे. वो भी बेचने को तैयार हैं अपना घर, औने पौने दामों पर. मुझे कुछ साथी कह रहे हैं, ले लो, बस जाओ. मैं भी सोच में पड़ गया हूं. यहां 2जी नेट कनेक्शन मजे में चल रहा है. क्या दिक्कत है, बस जाते हैं यहीं. सोच रहा हूं. पर अभी जल्दी क्या है, हर तरफ घूम लेता हूं, बाद में लास्ट में फाइनल किया जाएगा कि कहां बसना है. सोच रहा हूं. और, क्या बसना, क्या उजड़ना… फकीर बनो, आज यहां कल वहां. कुछ न रखो. कुछ न बसाओ. कुछ न उजाड़ो. चलते रहो. सोच रहा हूं.

जिनके घर रात रुके, उन्होंने सुबह नाश्ता करा कर बड़े प्यार से विदा किया, यह कहते हुए कि- फिर आना तुम लोग…

चलते चलते जब पैर थक जाएं तो कहीं पर भी हम लुढ़क जाएं…

एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ जाने की खुशी…
पहाड़ यात्रा-3 : उंचाई पर बस से चलने के दौरान गहरी खाई देखकर मौत का भय और पहाड़ पर पैदल चढ़ाई के दौरान हांफते हुए हार्ट फेल होने का भय .. इन दो भयों का जिक्र किया था पिछली पोस्ट में.. अब इन दो भयों के भागने की जानकारी दे रहा हूं. ऐसा संभव हो पाया लगातार पहाड़ के पास रहने, पहाड़ को जानने-समझने और उसके रंग में रंग जाने के कारण. हिमालय बचाओ आंदोलन की पदयात्रा में कई दिन साथ रहने और बीहड़ रास्तों पर लगातार पैदल चढ़ाई उतराई के कारण पहाड़ की उंचाई व खाई से भय भागता रहा. जब पहाड़ से दिल्ली लौट रहा था तो पहाड़ काटने, डराने को नहीं बल्कि अपना बिछड़ा भाई लगने को बेताब दिख रहा था… मन ही मन वादा करके लौटा कि अगली बार हिमालय के और करीब जाउंगा.. उन कंदराओं, गुफाओं, योगियों के पास जिनका जीवन दर्शन अलग, अलहदा है… इस बार की यात्रा ने पहाड़ से अजनबीपन को खत्म किया. पहाड़ के गांव, लोग, गलियां, चढ़ाई, उतराई, बोली, संस्कृति, स्नेह, संस्कृति सबसे रुबरु हुआ… भीषण एक्सरसाइज के कारण फिजिकली पहले से काफी फिट पा रहा हूं. हृदय के जो कुछ ब्लाकेज, रोड़े रहे होंगे, सब तीव्र गति ब्लड पंपिंग के कारण खत्म हो चुके होंगे. नशा पत्ती से रिलेशन रखने के जो साइड इफेक्ट दिख रहे थे, वो सब साइडलाइन हो चुके हैं. बोले तो, रुटीन और उबाऊ जीवन से अलग हटकर कुछ दिन बेहद नया और अदभुत जीवन जीकर जीने के प्रति लालसा, ललक को बढ़ा पाया. यात्रा के दौरान कई मजेदार तो कई सांस थामने वाले प्रसंग हुए.. इनमें से कुछ की वीडियोग्राफी भी की है… देखेंगे तो लगेगा कि आप भी संग-संग यात्रा कर रहे हैं… मजा न आए तो पैसे वापस… लिंक ये हैं…
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Pahaad waale Baba (1) : बोल बकरा बोल…
https://www.youtube.com/watch?v=LRYV0fYXwFs
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Pahaad waale Baba (2) : मुंड दर मुंड, हैं इरादे प्रचंड
https://www.youtube.com/watch?v=3xZvTZc4O-s
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Pauri Journey (1) : घने जंगल में उंचाई से उतरना
https://www.youtube.com/watch?v=1aKLaI-vAP4
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Pauri Journey (2) : पहाड़ की गोद में आराम
https://www.youtube.com/watch?v=js814WdDCis
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Pauri Journey (3) : हंसी-मजाक के बाद लंबी चढ़ाई
https://www.youtube.com/watch?v=j-uihThWoFA
नाश्ते में पहाड़ी व्यंजन… चाय के साथ मड़ुवे की रोटी और हरी चटनी…

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संपादक हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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मसूरी में भीख मांगते देखे गए यशवंत






