यशवंत में परिपक्वता और सूझ-बूझ का स्पष्ट अभाव झलकता है

पिछले दिनों टी.वी. चैनल की दुनिया के एक पूर्व "ताक़तवर" सम्पादक के यहाँ बैठा था. कुछ नामचीन चेहरे भी थे. अपने 16-17 साल की टी.वी. पत्रकारिता को मैं उन लोगों के सामने नतमस्तक पा रहा था. मेरे ब्लॉग (लीक से हटकर) की कठोरता की सराहनीय चर्चा हुई. मगर नामचीन ना होने चलते कोना पकड़ा दिया गया. हालांकि बीच-बीच में मेरे होने का एहसास मुझे कराया जा रहा था. चर्चा, चाय की चुस्कियों के साथ, हो रही थी.  सम्पादक महोदय के साथ नाम वाले कुछ टी.वी. वाले बंधू भी बैठे थे. ये लोग काम की ताक़त की बजाय, नाम की महिमा से अभिभूत थे. चर्चा के दौरान इस बात का ज़िक्र बार-बार आ रहा था कि जब कोई इंसान कुर्सी पर बैठा हो और आप को जॉब दिला सकता हो तो उस कुर्सी वाले की बेहूदगी को भी नफ़ासत मान लेना चाहिए और अपनी हलकी सी प्रतिक्रिया को गुनाह मान लेना चाहिए.

मैं हैरान था. वहाँ मौजूद महानुभावों के मानसिक स्तर का अंदाज़ लगा चुका था और इशारों-ही-इशारों में "खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान" वाली कहावत कहते हुए मैं भी अपनी बात घुसेड़ चुका था. उन्हें समझ में आया या नहीं, पता नहीं. लेकिन मुझे लगा कि वो मुझे ही गधा मान कर खुद के "महान" मंथन पर केन्द्रित थे. मैं भी चुप-चाप उनकी बात सुनने लगा. चर्चा आगे बढ़ी और अब दीपक चौरसिया की वाह-वाही होने लगी. कंटेंट को लेकर नहीं, टी.आर.पी. को लेकर. किस तरह दीपक नाम के "बीमार" पत्रकार ने "बीमार" चैनल को स्वस्थ बना, अंडर 5 लाकर खड़ा कर दिया. मैं समझ गया कि इसीलिए, हिन्दी टी.वी. चैनल्स के "सम्पादक" को इतना पैसा मिलता है और इसीलिए एन.डी.टी.वी इंडिया और इंग्लिश चैनल पीछे रहते हैं. लेकिन तभी ज़ेहन में "विस्फ़ोट" और "भडास फॉर मीडिया" का ध्यान आया. सोचने लगा कि "विस्फ़ोट" जैसी शानदार कंटेंट की साईट उतना भी पैसा नहीं जुटा पाती जितना कि आसाराम की यौन चर्चा के ज़रिये टी.आर.पी. बढाने वाले संपादकों की तनख्वाह. आज पुण्य प्रसून वाजपयी जैसे पत्रकार भी स्टूडियो में सैक्सोलौजिस्ट बुलाकर ही टिके हुए हैं. ये मठाधीशनुमा पत्रकार, "विस्फ़ोट" के संजय तिवारी से ओहदे, ख्याति या पैसा उगाहने (सैलरी के तौर पर) के मामले में भले ही बीस हों मगर कंटेंट परोसने के मामले में नौसिखिये हैं. कुछ अपने आप को मैनेजमेंट के आगे लाचार बता रहे हैं. (इस मामले में छोटे चैनल काफी बेहतर माने जा सकते हैं).

अब यहाँ, "माननीय सम्पादक" नुमा पत्रकार ये तर्क दे सकते हैं कि…बड़े टी.वी. चैनल्स चलाने के लिए पैसों की ज़रूरत पड़ती है और पैसा कंटेंट से नहीं बल्कि सनसनी फैलाने से आता है. तो यहाँ एक बात इन माननीय संपादकों से पूछी जा सकती है कि पत्रकारिता के लिए जो पुरस्कार, आप ग्रहण करते हैं, वो किस मद्देनज़र? मैनेजर बनकर टी.आर.पी. के ज़रिये पैसा उगाहने के लिए या बतौर पत्रकार, बढ़िया कंटेंट के लिए?  पत्रकारिता और बिज़नेस में फ़र्क होता है. बनिया और पत्रकार में फ़र्क होता है. दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, मगर पत्रकारिता को बिज़नेस के नाम पर ज़लील किया जाए, ये बात हज़म नहीं होती. उधर, संजय तिवारी पत्रकारिता को बनियाओं की गुलामी के लिए आज़ाद नहीं कर पा रहे. अपनी साईट "विस्फ़ोट" को चलाने के लिए रो-रो से रहे हैं. पूंजीवाद से कुचलने जाने से, संभवतः, वो भयभीत भी हैं …मगर कई पुण्यप्रसुनों और दीपक चौरासियाओं से ज़्यादा निर्भीक हैं. बनिस्पत कम नाम वाले संजय तिवारी "विस्फ़ोट" के लिए आसाराम की यौन शक्ति पर निर्भर नहीं हैं और ना ही मोदी का कट्टर हिन्दुत्त्व दिखाकर पिछले दरवाज़े से अपनी आर्थिक खेती लहलहाना चाहते हैं. गंभीर लेखनी और समसामयिक विषयों को प्रकाशित कर, संजय तिवारी जैसों ने बता दिया है कि केजरीवाल जैसा शख्स सिर्फ राजनीति में ही नहीं है, कुछ और जगहों पर भी है.

इसी तरह "भड़ास फॉर मीडिया" का नाम भी ले लेना उचित होगा. इस साईट के संचालक यशवंत में परिपक्वता और सूझ-बूझ का स्पष्ट अभाव झलकता है. इनका विवादित और बेख़ौफ़ तरीक़ा, बुद्धिजीवियों को नापसंद है और होना भी चाहिए… क्योंकि अपनी बात रखने का एक तरीका भी होना चाहिए. मतभेदों को सुलझाने के लिए अक्खड़ होना ज़रूरी है, इस बात को यशवंत को नहीं स्वीकार करना चाहिए. जोश किसी सशस्त्र क्रान्ति के लिए ज़रूरी है, मगर वैचारिक क्रान्ति के लिए जोश के साथ होश और संयमित आचरण भी ज़रूरी है. इन तमाम खामियों के बावजूद, गर, यशवंत को जिस लिए शाबासी देना चाहिए तो वो है….मीडिया से सम्बंधित सूचनाओं का लगातार प्रवाह. इसमें कोई दो-राय नहीं कि "भड़ास फॉर मीडिया" सूचनाओं के मद्देनज़र एक शानदार साईट है. बड़े-बड़े मठाधीश भी, चोरी-छिपे इस पर ध्यान देते हैं और इसकी अहमियत समझते हैं. ये "भड़ास फॉर मीडिया" का ही असर है कि नामचीन मीडिया स्वयंभू, इसके ज़रिये मीडिया की ताका-झांकी करने के बावजूद, यशवंत को पसंद नहीं करते …इसके लिए यशवंत थोड़ा ज़्यादा ज़िम्मेदार दिखाई देते हैं.

"मीडिया में फ़ैली तमाम खामियों को दुरुस्त करने के लिए बागी हो जाना ज़रूरी है", यही सोच यशवंत के नकारात्मक पहलुओं में इज़ाफा करती है. अनुशासन को दमन समझने वाले यशवंत को अपनी सोच का विस्तार करना होगा. उन्हें अपनी और अपनी साईट की अहमियत समझनी होगी.  पूरे हिन्दुस्तान में हिन्दी मीडिया से जुड़े ज़्यादातर लोग "भड़ास फॉर मीडिया" पर नज़र डालते हैं. मीडिया में हर रोज़ घटती घटनाओं का लेखा-जोखा इस साईट पर, विश्वसनीय तरीके से उपलब्ध रहता है. कौन जॉब छोड़ा और कौन पकड़ा. कौन किस जगह जाने वाला है. किस जगह (मीडिया हाउस में) क्या हो रहा है… इत्यादि. हाँ, ये सारी बातें इस साईट को ताक़तवर बनाती हैं. पर यशवंत का अपना मिजाज़ इसके रंग में भंग डाल देता है.  किसी के बारे में, व्यक्तिगत तौर पर, कोई कुछ भी भेजो, छप जाएगा…..ये बात इस साईट की विश्वसनीयता को कमज़ोर कर रही हैं. पर B4M की ज़रुरत अब भी बनी हुई है..

खैर! इस देश की राजनीति में अरविन्द केजरीवाल ने जब दस्तक दिया तो राजनीतिक गलियारे के "प्रोफेशनल मठाधीशों" ने केजरीवाल को पिद्दी करा दिया. अरविन्द की "आप" के पास पैसा नहीं था पर ज़मीनी पकड़ और ईमानदारी के साथ पेशेवर आक्रामकता से "पिद्दी" ने "सूरमाओं" को धुल चटा दिया.  कुछ खुद को हाथी मान बैठे थे और अरविन्द को चींटी. आज चींटी नाक में घुस गयी है और हाथी पगला रहा है. आज की तारीख में "विस्फ़ोट" और "भड़ास फॉर मीडिया", मीडिया के अरविन्द केजरीवाल हैं, जिन्हें कमज़ोर समझना पिद्दी और सूरमाओं वाली बात होगी. हो सकता है, कि, आने वाले दिनों में "विस्फ़ोट" या "भड़ास फॉर मीडिया" (किसी वज़ह से) बंद हो जाए या प्रसूनों और चौरसियाओं जैसा कोई बिजनेसमैन नुमा पत्रकार इसे खरीद कर यौन क्षमताओं को विकसित करने वाली साईट में तब्दील कर दे या संघ की बजाय मोदी का प्रचारक बन जाए, पर इतना ज़रूर है कि आज की तारीख में "विस्फ़ोट" या "भड़ास फॉर मीडिया" जैसे केजरीवालों की ज़रूरत है, ना कि किसी नेता का मुक़द्दर चमकाने या किसी बाबा की यौनशक्ति नापने वाले करने वाले "भांड" नुमा सिकंदरों की.

लेखक नीरज 'लीक से हटकर' ब्लाग के माडरेटर हैं. उनसे संपर्क journalistebox@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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