यहां कुछ भी करने की आजादी है!

समय बहुत कठिन है। जिनके पास अधिकार है, वे और ज्यादा अधिकार पाने की होड़ में हैं। जिनके पास शक्ति है, वे अपनी मुश्कें और मजबूत कर लेना चाहते हैं। और धन? वह तो केंद्रीय भूमिका में है। धन ही शक्ति और अधिकार दोनों का सृजन करने की सामर्थ्‍य रखता है। अगर किसी केंचुए के पास भी संयोगवश धन-संपदा आ गयी तो उसके लिजलिजे शरीर में हड्डियाँ उग आती हैं, उसमें मिट्टी की जगह पत्थर निगलने की ताकत पैदा हो जाती है। धन से ही आज सामाजिक मर्यादा तय होती है, धन ही नायकत्व का कारक बन गया है।

नयी वैश्विक अर्थव्यवस्था ने जिस तरह कुछ खास देशों या व्यक्तियों के हाथों में पूंजी का नियंत्रण सौंप दिया है, उससे तमाम तरह की सामाजिक विरुपताएं पैदा हुईं हैं। पूंजी की मदद से पहले प्राकृतिक संसाधनों पर और फिर मानव संसाधनों पर भी काबू पाना उनके लिए सहज हो गया है। ये संसाधन पूंजी को लगातार बढ़ाने के उपकरण साबित हुए हैं। पढ़े-लिखे तेज-तर्रार दिमागों को खरीदना और गुलाम बना लेना भी पूंजी के लिए आसान हो गया है। इन मेधावी गुलामों की मदद से धनपशुओं ने जो अश्वमेध शुरू किया है, उसके सुखांत की कल्पना नहीं की जा सकती। इस प्रक्रिया में जो अमीर थे, वे और अमीर होते गये और जो गरीब थे, उनकी गरीबी बढ़ती गयी है। एक ऐसा फासला, जो लगातार बढ़ता जा रहा है, विस्फोटक होता जा रहा है।

पूंजी के खेल का यह खतरनाक विस्तार गरीबों की जिंदगियों में दुश्वारियाँ ही नहीं बढ़ा रहा है बल्कि प्राकृतिक और पर्यावरणीय संकट में भी इजाफा कर रहा है। बड़े-बड़े उद्योगों के विस्तार के लिए जमीनें चाहिए, उनके संयंत्रों को चलाने के लिए पानी चाहिए, उनके उत्पादों के सुरक्षित निर्गमन के लिए सड़कें चाहिए। शहरों में कहाँ जगह है, काम-धंधे की आस में गांवों से भाग कर जिस तरह लोग शहरों में बस रहे हैं, खतरनाक और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में जीवन बसर कर रहे हैं, वह एक अलग समस्या है पर इससे शहरों का नियोजन स्वयं चरमरा रहा है। ऐसे में पूंजी का हथौड़ा नदियों, पहाड़ों और जंगलों पर चल रहा है। वहाँ रहने वाले विस्थापित हो रहे हैं, उनकी आजीविका के साधन छिन रहे हैं, उनका जीवन, उनकी संस्कृति सब कुछ खतरे में पड़ती जा रही है। जिन लोगों पर संसाधनों के बराबर बँटवारे की जिम्मेदारी है, जिन पर सांस्कृतिक विविधता की रक्षा की जिम्मेदारी है, जिन पर वंचित और अधिकारविहीन लोगों के सशक्तीकरण की जिम्मेदारी है, वे अपने वातानुकूलित कमरे में बैठकर वहाँ तक देख ही नहीं पाते या शायद देखना ही नहीं चाहते।

खुदा न खास्ता राजनीतिक कारणों से अगर थोड़ा-बहुत धन उन इलाकों के लिए रवाना भी होता है तो वह कागजों में घूमते हुए ही निपट जाता है। कितनी विचित्र विडंबना है कि एक ओर भारत की उजली तस्वीर दिखायी जाती है, तो दूसरी ओर इतना घना अंधेरा ही कुछ दिखता ही नहीं। जो देश आर्थिक महाशक्ति होने की दिशा में अग्रसर होने का दावा करता दिखता है, उस देश का किसान खुदकुशी करने को मजबूर है। जो देश अंतरिक्ष में उपग्रह स्थापित कर रहा है, अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलें बना रहा है, उनका सटीक परीक्षण कर रहा है, उस देश में बहुसंख्य गरीब दो वक्त के निवाले केलिए तरस रहे हैं।

असल में गरीबों की इस दुर्निवार नियति के लिए पूंजी के साथ ही पूँजी के कारण फैले भ्रष्टाचार ने भी बड़ी भूमिका निभायी है। मामूली गांव और कस्बों की पृष्ठभूमि से शक्ति केंद्रों में दाखिल हुए लोगों की धन लिप्सा ने हालत को और भी भयावह बना दिया है। पिछले कुछ सालों में देश की केंद्रीय सत्ता के भीतर से भ्रष्टाचार की जो दुर्गंध फैली है, वह बेमिसाल है। कुछ लोगों ने बहुत चालाकी से लाखों करोड़ रुपये चट कर लिये। यही हाल राज्यों में भी देखी गयी। कर्नाटक और मध्य प्रदेश में जिस तरह सरकारी धन की लूट खुलकर सामने आयी, वह चौंका देने वाली है। मामूली चपरासी, क्लर्क और इंजीनियर तक के घरों और बैंकों से करोड़ों की संपत्ति का निकलना हैरतअंगेज है। उत्तर प्रदेश में तो लूट का इतिहास ही रच दिया गया। जनता की जेबों से निकाला गया पैसा, जो उन्हीं के लिए कल्याणकारी योजनाओं में लगना था, उन तक नहीं पहुंचा और तमाम ठेकेदार, अफसर, मंत्री मालामाल हो गये। इस बेशर्म बंदरबाँट में लगे चेहरों को देखिये तो पता चलेगा कि उनमें से अधिकांश निम्न मध्यवर्गीय या मध्यवर्गीय परिवारों से आये हुए लोग हैं।

इस पाशविक धनपिपाशा का कोई अंत नहीं है। कानून बहुत धीमा काम करता है। न्याय की गति भी तेज नहीं है। जो लोग कानून, संविधान, न्यायपालिका और संसद के दिन-ब-दिन घटते तेज के खिलाफ संगठित होने की कोशिश करते हैं, जो लोग अपने हक से निरंतर वंचित किये जा रहे लोगों को जगाने और खड़ा करने की कोशिश करते हैं, उन्हें पहचानने और निष्क्रिय करने में सत्ता प्रतिष्ठान तनिक उदासीनता नहीं दिखाते, उनके खिलाफ कानूनों का इस्तेमाल करने में तनिक ढिलाई नहीं बरती जाती। पूंजी और शक्ति केंद्रों की मिली-भगत तोडऩे का काम अगर राजनीतिक तंत्र नहीं करता है तो फिर जनता के लिए उसकी प्रासंगिकता क्या है? राजनीति को लेकर आम तौर पर जिस तरह की प्रतिक्रिया जनता में दिखायी पड़ती है, वह अपने-आप में इस सवाल का जवाब है। कुछ इमानदार प्रयास होते दिखते भी हैं तो वे संगठित नहीं हो पाते।

हमारे परम उदार लोकतंत्र ने लुटेरों और भ्रष्टाचारियों को अभयदान दे रखा है। उन्हें कुछ भी करने की आजादी है। अगर कोई आवाज उठती है तो पहले उसे ही दबाने की कोशिश की जाती है, उसे ही संदिग्ध ठहराने और अलग-थलग करने के प्रयास किये जाते हैं। आदिवासियों, गरीबों के हक के लिए कोई भी मजबूती से खड़ा होने की कोशिश करे, उनके अधिकारों की पैरवी करे तो आतंकवादी, नक्सलवादी ठहरा कर उसे ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। ऐसे वक्त में जब शक्ति के केंद्र भटक गये हों, उन्हें वापस लाने के लिए कई बार शक्ति की जरूरत महसूस होती है। बार-बार ऐसा लगता है कि वह समय आ गया है, जब बदलाव केलिए ताकत का प्रयोग किया जाना चाहिए। जन सरोकार से प्रतिबद्ध सभी लोगों को, संगठनों को एक मंच पर आने की जरूरत है, एक साथ सड़कों पर आने की आवश्यकता है ताकि वे अपनी बात ठीक से कह सकें, अपनी ताकत बढ़ा सकें। 

लेखक डा. सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. अमर उजाला समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ में एक हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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