यह काम यशवंत और भड़ास ही जज्बा बनाकर कर पा रहे हैं

प्रिय यशवंत भाई नमस्कार, काफी दिनों बाद भड़ास खोलकर पढ़ा तो पाया कि भड़ास मीडिया सम्मान पुरस्कारों आयोजन की रिपोर्टें-तस्वीरें चल रही हैं। उत्कर्ष सिन्हा की रिपोर्ट भी पढ़ी। अतीत के कई दृश्य चेहरे स्मृतियां वर्तमान में आकर ताजा हो गईं। जिन लोगों को पुरस्कृत या सम्मानित किया गया, वे लोग इस काबिल हैं, थे और हमेशा रहेंगे। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे लोगों को कौन याद कर रहा है और क्यों याद कर रहा है। मुझे तो लगता है कि यह काम फिलहाल तो यशवंत और भड़ास ही जज्बा बनाकर कर पा रहे हैं।

आलोक तोमर जी को ही ले लें, कानपुर, लखनउ से उनके गहरे रिश्ते थे। मुझसे सिर्फ जान पहचान भर थी फिर भी मैं उन्हें अपना प्रेरणा श्रोत मनाता था, मान रहा हूं। लेकिन कभी वह लोग चर्चा करते तक नहीं दिखे जिनसे आलोक जी के गहरे रिश्ते हुआ करते थे। खैर, विस्मरण भी मानव मस्तिष्क की एक ऐसी क्रिया है जिसे मानव जानबूझकर इस्तेमाल करता है। जबकि एक उदाहरण दूं अभी एक दिन डिस्कवरी चैनल पर एक कार्यक्रम आ रहा था। जिसमें एक व्यक्ति ने एक हाथी को पीटा था। एक साल बाद उसी हाथी को वही व्यक्ति दिख गया। हाथी उस व्यक्ति को तुरंत पहचान गया। सवाल यह है कि हाथी है तो जानवर ही किसी व्यक्ति को पहचान कर एक साल बाद प्रतिक्रिया कर सकता है और हम मानव नहीं कर सकते।

मेरे सवाल का जवाब आप दे सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मानव स्मरण विस्मरण क्रिया प्रतिक्रिया और बहुत कुछ जानबूझकर करता है। आपने जिन जांबाजों को सम्मानित किया है। उन्हें मेरा हार्दिक सलाम और चाहता हूं कि आप ऐसा अवश्य करते रहें। इसकी बेहद जरूरत है। आपाधापी मैं, मेरा, मैं ही सबकुछ। मैं ही सबकुछ पा जाउं, ले जाउं, छीन लूं, लूट लूं, उठा लूं के बीच आप लोगों द्वारा इस तरह के आयोजन किसी न किसी को तो राह दिखाएंगे जरूर, क्योंकि कोई भी चीज एकदम निरर्थक नहीं होती। रिजल्ट मिला अवश्य है। कार्य होता है तो उसके पीछे कारण और बाद में परिणाम निश्चित हैं। इसलिए आपको आपकी टीम को बधाई। बधाई भी इसलिए कि बहुत कार्य करना शेष है। हो सकता है मेरी बधाई आपको आंशिक हौसला दे सके।

पीयूष त्रिपाठी

पत्रकार

साप्ताहिक इतवार

लखनऊ

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