यह पटकथा तो पहले ही तैयार कर चुके थे अरुण कुमार

अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था अरुण कुमार ने सरकार को अचानक ही मुसीबत में नहीं डाला। उन्होंने इसकी पटकथा पहले ही तैयार कर ली थी। बस मौके और समय का इंतजार था। वह शहीदाना अंदाज में दिल्ली जाना चाहते थे। मगर उनके इस अंदाज ने सरकार की बैंड बजा दी। वीकएंड टाइम्स ने कुछ दिन पहले ही छाप दिया था कि उनकी छुट्टी तय है। अब जब अरुण कुमार को भी इस बात का अंदाजा हो गया कि उनकी विदाई किसी भी समय हो सकती है तब उन्होंने इस पटकथा का आखिरी अध्याय लिख दिया।

अरुण कुमार का मीडिया मैनेजमेंट गजब का है। पत्रकारों से उनकी बढिया दोस्ती है। वह टीवी चौनलों पर छाये रहते हैं और अखबारों में उनके बयान भी सुर्खियों में रहते हैं। माना जाता है अरुण कुमार मुख्यमंत्री की सबसे ताकतवर सचिव अनीता सिंह कैंप के अधिकारी हैं लिहाजा यूं भी उनका जलजला बना रहता है। दरअसल अरुण कुमार की ताजपोशी भी नाटकीय अंदाज में हुई थी। जिस समय उनकी ताजपोशी हुई उस समय अखिलेश सरकार कानून व्यवस्था के मुद्दे पर घिरती जा रही थी। उस दौर में फैजाबाद में दंगा हो गया। मुख्यमंत्री इस घटना से बेहद नाराज थे इस दंगे की गाज अपर पुलिस महानिदेशक जगमोहन यादव पर गिरी। उनके हटने के आदेश ने पुलिस महकमें में खलबली मचा दी क्योंकि वह सत्ता शीर्ष के बेहद खास लोगों में शुमार किये जाते हैं। तब माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री हर हालत में कानून व्यवस्था सुधारने का अब मन बना रहे हैं।

तब अरुण कुमार के अलावा जावेद अख्तर और ओपी सिंह के नाम पर विचार हुआ मगर बाजी अरुण कुमार के हाथ लगी। अरुण कुमार को इस उम्मीद के साथ कमान सौंपी गई कि वह प्रदेश में कुछ करिश्मा दिखायेंगे। सरकार की तरफ से कहा गया कि वह बेहद तेज तर्रार छवि के अधिकारी हैं। अरुण कुमार ने भी अपनी पहली वीडियो कांफ्रेंसिंग में जिस तरह का भाषण दिया उससे लोगों को यह लगने भी लगा। मीडिया ने भी अरुण कुमार की हर गतिविधि को प्रमुखता से दिखाना शुरू किया। मगर इसी बीच तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अम्बरीश चंद्र शर्मा से अरुण कुमार का विवाद गहराता चला गया। अम्बरीश चन्द्र भी सत्ता के बेहद करीब माने जाते थे। इन दोनों के विवाद के बाद प्रदेश के पुलिस अफसर भी दो खेमों में बंट गये थे। अंततरू अरुण कुमार डीजीपी अम्बरीश चन्द्र शर्मा को हटवाने में कामयाब हो गये और देवराज नागर प्रदेश के नये पुलिस महानिदेशक बन गये।

मगर प्रदेश में अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ता चला गया। मौजूदा डीजीपी देवराज नागर से भी अरुण कुमार की नहीं पटी। जिलों में तैनाती को लेकर भी डीजीपी और एडीजी के बीच शीतयुद्ध की खबरें महकमें में चर्चा का विषय बनती रही। इस बीच 1987 और 1988 बैच के आईपीएस अफसरों ने प्रमोशन के लिए दबाव बनाना शूरू किया। अरुण कुमार बखूबी जानते थे कि अगर यह दो बैच के अफसर प्रमोट हो गये तो उनकी कुर्सी खतरे में पड़ जायेगी। इस बैच के कुछ अफसर मौजूदा सत्ता केंद्रों के बेहद करीबी माने जाते हैं। सूत्रों का कहना है कि अरुण कुमार ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके लंबे समय से डीपीसी नहीं होने दी। मगर जब डीपीसी हो गयी तब तय हो गया कि अब अरुण कुमार और देवराज नागर दोनों की विदाई कर दी जायेगी।

सूत्रों का कहना है कि जब लगभग तय हो गया कि मुकुल गोयल या आर के विश्वकर्मा में से एक अधिकारी को अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था बना दिया जायेगा तब अरुण कुमार ने अपनी पटकथा तैयार करना शुरू की। उन्होंने केन्द्र में डेप्यूटेशन पर जाने के लिए आवेदन कर दिया। इस बीच मुजफ्फरनगर में दंगा हो गया। शुरूआती दौर में तो अरुण कुमार वहां नहीं गये। मगर जब दंगा बढ़ा और मुख्यमंत्री के तेवर कड़े हो गये तो अरुण कुमार को वहीं कैंप करना पड़ गया।

इस बीच वहां एक चौनल ने स्टिंग आपरेशन कर दिया। जिसमें पुलिस कर्मियों द्वारा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते दिखे। जब यह टीवी पर चला तब हड़कंप मचा। इस बीच अरुण कुमार विरोधी लोगों ने मुख्यमंत्री को तथ्यों समेत बता दिया कि जिस टीम ने यह स्टिंग आपरेशन किया उसके मुखिया अरुण कुमार के सबसे करीबी दोस्त हैं। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ने अपने स्तर से भी इसकी पुष्टि करवाई और जब यह तथ्य सही पाया गया तो अरुण कुमार की छुट्टी करने का मन बना लिया गया।

इसकी भनक मिलते ही बुधवार को अचानक टीवी चौनलों पर चलने लगा कि अरुण कुमार यहां की परिस्थितियों से खुश नहीं हैं इसलिए वह केन्द्र में जाना चाहते हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय भी यह देखकर भौचक्का था कि जिस दिन भाजपा नेता हुकुम सिंह ने अरुण कुमार का नाम सदन में लेकर उनके ऊपर आरोप लगाये और जिस दिन स्टिंग आपरेशन शुरू हुआ आखिर उसी समय अरुण कुमार की यह खबरें क्यों चलाई गयी। दरअसल अरुण कुमार की रणनीति थी कि वह जब केन्द्र में जायें तो इस संदेश के साथ जायें कि वह सरकार द्वारा शहीद किये गये हैं। मौजूदा केन्द्र सरकार और संभावित सरकार में भी इस संदेश के साथ जाने पर बढिया ताजपोशी हो सकती है।

मगर अब अरुण कुमार का दांव उल्टा पड़ गया है। विवाद बढ़ जाने के बाद वह अचानक छुट्टी पर चले गये हैं और उनका मोबाइल भी नहीं मिल रहा है। इधर एक खेमा मुख्यमंत्री से कह रहा है कि जिस अफसर ने सरकार के खिलाफ ऐसी साजिश रची उसे यूं ही नहीं जाने देना चाहिए। इन लोगों का कहना है कि अरुण कुमार को एनओसी नहीं देना चाहिए और उन्हें अब सबसे महत्वहीन पद पर तैनात करके सबक देना चाहिए कि सरकार के खिलाफ साजिश रचने के गंभीर परिणाम होते हैं जाहिर है आने वाले दिन अरुण कुमार पर भारी पडने वाले हैं।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के संपादक हैं.

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