यादव जी ने यादव जी को ‘यश भारती’ पुरस्कार दिया!

Mukesh Kumar : जाने-माने कथाकार एवं हंस के संपादक राजेंद्र यादव यश भारती पुरस्कार दिए जाने की घोषणा से खुश भी हैं। मगर जिस तरह लोग इसे मुलायम सिंह यादव से जोड़कर देख रहे हैं और इस तरह प्रस्तुत कर रहे हैं मानो उन्हें ये पुरस्कार उनकी योग्यता और योगदान की वजह से नहीं बल्कि उनकी जाति को ध्यान में रखकर दिया जा रहा हो उससे वे दुखी भी हैं। उन्होंने अपने इस दुख का इज़हार इंडियन कॉफी हाऊस, कनाटप्लेस में आयोजित एक गोष्ठी में भी किया। उनकी पीड़ा स्वाभाविक भी है और सही भी है, क्योंकि जब किसी ब्राम्हण, ठाकुर या कथित ऊँची जाति के व्यक्ति को पुरस्कार दिया जाता है तब जातीय समीकरणों की बात नहीं की जाती और मान लिया जाता है कि वह तो इसके योग्य है ही। ये जातिवादी दृष्टिकोण पिछड़ी-दलित जातियों के ही संदर्भ में देखे जाते हैं। कुछ इसी तरह के पूर्वाग्रह हमें स्त्रियों एवं अल्पसंख्यकों को लेकर भी देखने को मिलते हैं।

    Ashok Dusadh जाति में योग्यता है इसमें बुरा माननेवाली क्या बात है ,ब्राह्मण में योग्यता है , द्विज में योग्यता है ,यादव में योग्यता आ गयी है …………वैसे मैं राजेंद्र यादव जी के सम्मान को सम्मान करता हूँ ,फिर भी मुलायम सिंह राजनीतिज्ञ है और उनके लिए जाति महत्वपूर्ण है .उनके उतराधिकारी सरकार के लिए भी .
 
    Ashok Mishra राजेंद्र यादव आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता हैं बेवकूफ है मीडिया और लोग
   
    Mahesh Nautiyal jab desh me jati ke nam per per sab kam ho rahe ho tab ek puraskar dene me kya burai hai mulayam chahe jati ke nam per puraskar de rahe ho lakin yadav ji ka yogdan kam nahi mana jaega
    
    Neelabh Ashk मत भूलें मुकेश कुमार जी कि यही राजेन्द्र यादव हैं जिन्हों ने बथानी टोला नरसंहार के बाद लालू सरकार से इनाम लिया था जबकि बिहार के ढेरों साहित्यकार उनसे न लेने की बिनती करते रहे. लालू भी यादव हैं. राजेन्द्र जी ने तब यह लचर तर्क दिया था कि "हंस" के लिए पैसों की ज़रूरत है. यह प्रेम्चन्द जी का :हंस: है जिसकी ज़मानत ज़ब्त हुई थी. लेकिन प्रेमचन्द ने कोई तर्क नहीं दिया था.
     
    Vinod Anupam यह वही यश भारती पुरस्कार है जिसे अभिषेक बच्चन को प्रदान करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उनकी तुलना विवेकानंद से करते हुए कहा था,जब विवेकानंद कम उम्र में महान हो सकते हैं तो अभिषेक क्यों नहीं…..
     
    Pawan Lalchand sahi kaha
     
    Kuldip Kumar Kamboj तालियाँ ! मित्र मुकेश कुमार जी, आप ठीक कह रहे हैं-सो टका, लेकिन इस का क्या किया जाये कि राजिन्द्र यादव हों और वाद-विवाद न हो?
 
    Satish Kumar Dwivedi such a great social writer realized it so late and is saddened by these comments—goes against his spirit…
 
    Murli Srivastava आपने बिल्कुल सही सवाल उठाया है, मगर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में आज भी इस मानसिकता से लोग कहीं न कहीं ग्रसित है. तुलना करने वाले ये भूल जाते हैं कि विद्वता जाति और धर्म से परे होती है…
   
    Sujeet Kumar very true…

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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