याद आ रहा है कि क्या करते करते हम पत्रकार बन गए : आलोक जोशी

Alok Joshi : पुराने दिन याद आ रहे हैं। पुराने किस्से याद आ रहे हैं। ये भी याद आ रहा है कि क्या करते करते हम पत्रकार बन गए। तब पत्रकारों की तनख्वाह कुछ खास नहीं होती थी। कैरियर प्रोग्रेशन भी 55 रुपए सालाना इन्क्रीमेंट की रफ्तार से ही था.. मगर आ गए तो आ गए।.. दो बार नौकरी से भी हाथ धोया, बल्कि तीन बार। दो बार तो तमीज़ से चिट्ठी पकड़ाकर मुआवजे समेत निकाले गए और एक बार महीने की तनख्वाह तो छोड़ो, लाला अपना कुछ पैसा भी खा गया।..

फिर भी चलते रहे। कुछ खास बुरा भी नहीं लगता अब वो किस्से याद करके। ऐसा भी नहीं लगता कि उनकी वजह से करियर में कोई कमी रह गई हो। ये ज़रूर लगता है कि उन नौकरियों में, उन अखबारों में जो सीखा, जो रिश्ते कमाए वो आज भी साथ हैं.. काम आ रहे हैं।.. लेकिन कई बार ये भी लगता है कि अच्छा ही हुआ वो नौकरियां चली गईं, वरना आज क्या होता। आज से बेहतर होता या आज से बदतर होता। पता नहीं।

आलोक जोशी के फेसबुक वॉल से.
 

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