यार डॉक्टर साहब, तुमने तो आज शराब नहीं बल्कि अमृत पिला दिया

शराब और वह भी बढिया शराब की बोतल अगर मुफ्त में मिले तो फिर कायदे कानून की परवाह नहीं की जाती। इसके लिए पत्रकार सम्मेलन में एक के स्थान पर चार रिपोर्टर भी भेजे जा सकते हैं। ऐसा ही उस दिन हुआ। चीफ रिपोर्टर ने एक शराब निर्माता कंपनी की पांच सितारा होटल में होने वाली प्रेस कांफ्रेंस का निमंत्रण मुझे दिया तो मैंने कहा- इसमें किसी शराब पीने वाले को भेजें तो उचित रहेगा। चीफ ने जोर दे कर कहा- नहीं, आप ही को जाना है।

मैं नियत समय होटल पहुंच गया तो देखा मुझ से पहले ही नभाटा के एक और संवाददाता जमे थे। पूछने पर बताया कि उन्हें भी चीफ रिपोर्टर ने भेजा है। थेाड़ी देर बाद चीफ साहब स्वयं भी एक स्टिंगर के साथ वहां आ गए। मुझे बड़ी शर्म लग रही थी। पास बैठा एक अन्य अखबार का रिपोर्टर मुझसे शराब को लेकर मजाक कर रहा था। कह रहा था- गुरु तुम्हारी बोतल तो गई। मैं कुछ समझ नही पाया। प्रेस कांफ्रेंस के बाद भेाजन का प्रबंध भी था। चलते समय कंपनी की ओर से एक-एक गिफ्ट पैक सबको दिया गया जिसमें अन्य सामान के साथ शराब की एक बोतल भी थी।

आफिस में चीफ साहब अपने अमले के साथ मुझसे पहले ही आ गए थे। मैं आकर सीट पर बैठा ही था कि चीफ साहब ने आदेश दिया कि बाकी सामान आप रख लें और बोतल मुझे दे दें। अब मुझे उस पत्रकार की बात का मतलब समझ आया। मैंने बोतल देने से मना कर दिया तो चीफ साहब ने धमकी सी देते हुए कहा कि बोतल तो देनी पड़ेगी और इतना कह कर वह खड़े हो गए। मैं भी तन कर बोला- देखें कौन लेता है भला। मेरे तेवर देख कर चीफ साहब बैठ कर मुझे घूरने लगे। बाकी लोग इसके मजे ले रहे थे। एक साथी ने फबती कसी। सर जी इन तिलों से आप तेल नही निकाल सकते। अब मेरी समझ में आया कि चार रिपोर्टर चार बोतलों के लिए गए थे। एकाध साथी ने कहा भी कि यार बोतल दे दो, तुम्हारे किस काम की है, चीफ रिपार्टर से पंगा लेना ठीक नहीं। मुझे भी जिद हो गई थी। मैं बोतल घर ले आया और टांड पर रख दी और भूल गया।

इस घटना को लगभग पांचेक साल गुजर गए। बरेली में एक अखबार के कार्यालय पर एक नेता के समर्थकों ने हमला कर दिया था। इसकी जांच के लिए डी. यू. जे. का एक जांच दल बरेली जा रहा था। मैं भी उसमें शामिल था। तय कार्यक्रम के अनुसार डी. यू. जे. अध्यक्ष एस. के. पांडे और उनके साथ दो और पत्रकार मेरे घर बढपुरा आ गए। घर में भैंस थी। उन्हें अंगीठी पर औटा हुआ बादामी रंग का दूध मलाई के साथ पिलाया तो सब बहुत प्रसन्न हुए। उस दिन कोई त्यौहार होने के कारण ठेके बंद थे। एक पत्रकार ने फरमाइश की कि यार कहीं से एक बोतल का प्रबंध कर दो, लंबा सफर है, बोर हो जाएंगे।

मुझे याद आया कि एक बोतल कभी टांड पर डाल दी थी। मैंने एक बच्चे को टांड पर चढाया और बोतल तलाश करने को कहा। थोडे प्रयास के बाद बोतल मिल गई। बोतल मिलने पर सब बहुत प्रसन्न हुए। मैंने बोतल की कहानी बताई तो सब हंसने लगे। उसके बाद बोतल के स्थान पर चीफ रिपोर्टर की बातें होती रहीं। बरेली के रास्ते में मुरादाबाद के बाहर एक ढाबे पर बैठ गए और बोतल खोल ली। पहले पैग का एक सिप लेते ही एक बोला- यार डॉक्टर साहब तुम ने तो आज अमृत पिला दिया। सो कैसे। मेरे पूछने पर बताया कि यह थी तो शराब ही मगर पांच साल तक टांड पर पड़े पड़े यह अमृत बन गई है, लो तुम भी एक पैग ले कर देखो। सारे लोग जिद करते रहे और मैं मना करता रहा। भई यह आपका अमृत आप ही को मुबारक हो। मगर वे नहीं माने तो मैंने एक चम्मच में लेकर सिप किया तो वह गले को चीरती चली गई। मैंने हाथ जोड़ दिए। वह मजे ले ले कर पीते रहे और शराब की प्रशंसा करते रहे कि शराब तो काफी तरह की पी है मगर इतनी उम्दा शराब जीवन में पहली बार पी रहे हैं। साथ ही दिवंगत चीफ रिपोर्टर की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना भी करते रहे कि आखिर उन्ही की कृपा का ही तो यह प्रसाद था। बाद में मुझे बताया गया कि शराब जितनी पुरानी होती है उतनी ही मजेदार हो जाती है।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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