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‘युवराज’ के भरोसे जमे रहेंगे बेनी बाबू!

केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और सपा के बीच चल रही जुबानी जंग अब अंदर ही अंदर और गहराने लगी है। यह तकरार काफी दिनों से चली आ रही है। एक बार माफी मांग लेने के बाद भी जिस तरह से केंद्रीय मंत्री वर्मा, बार-बार सपा पर हमले कर रहे हैं, उससे सपा का शीर्ष नेतृत्व भी हलकान होने लगा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि बेनी के बहाने कांग्रेस एक खास रणनीति के तहत सपा को ‘तंग’ करा रही है या कोई और रणनीतिक खेल है? बहरहाल, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने बेनी के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने का फैसला कर लिया है। उन्होंने संकेत दे दिए हैं कि इस मामले में कांग्रेस उनके साथ छल-कपट की राजनीति न करे। वरना, इसका नकारात्मक अंजाम कांग्रेस को ही भुगतना पड़ सकता है।

केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और सपा के बीच चल रही जुबानी जंग अब अंदर ही अंदर और गहराने लगी है। यह तकरार काफी दिनों से चली आ रही है। एक बार माफी मांग लेने के बाद भी जिस तरह से केंद्रीय मंत्री वर्मा, बार-बार सपा पर हमले कर रहे हैं, उससे सपा का शीर्ष नेतृत्व भी हलकान होने लगा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि बेनी के बहाने कांग्रेस एक खास रणनीति के तहत सपा को ‘तंग’ करा रही है या कोई और रणनीतिक खेल है? बहरहाल, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने बेनी के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने का फैसला कर लिया है। उन्होंने संकेत दे दिए हैं कि इस मामले में कांग्रेस उनके साथ छल-कपट की राजनीति न करे। वरना, इसका नकारात्मक अंजाम कांग्रेस को ही भुगतना पड़ सकता है।

बेनी वर्मा लंबे समय तक मुलायम के खास सिपहसालार रह चुके हैं। वे प्रदेश में उनकी सरकार के दौर में खासी महत्वपूर्ण हैसियत में रहते थे। रिश्ते बिगड़े, तो दोनों नेताओं के बीच गजब की कड़वाहट भर गई है। सपा से अलग होने के बाद बेनी ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया था। वे पूर्वांचल के कद्दावार पिछड़े वर्ग के नेता हैं। कई सालों से कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी के खास करीबी ही बन गए हैं। माना जाता है कि राहुल के खास संरक्षण के चलते तमाम विवादों के बावजूद बेनी बाबू की कुर्सी बरकरार बनी हुई है। जबकि, उनके तेवरों के चलते सरकार कई बार बड़े राजनीतिक संकट भी झेल चुकी है।

उल्लेखनीय है कि डीएमके के समर्थन वापसी के बाद यूपीए सरकार के अस्तित्व के लिए सरकार को सपा का समर्थन अपरिहार्य बन गया है। क्योंकि, अल्पमत की सरकार सपा और बसपा के बाहरी समर्थन पर ही टिकी है। लोकसभा में सपा के 22 सांसद हैं। जबकि, बसपा के 21 हैं। कुछ राजनीतिक मतभेदों के बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती, सरकार को मजबूती से समर्थन दे रही हैं। वे सरकार को तंग करने के राजनीतिक दांव भी नहीं चला रहीं। जबकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, डीएमके के समर्थन वापसी के बाद कड़क तेवरों पर चल रहे हैं। वे लगातार मनमोहन सरकार को ‘आंख’ दिखा रहे हैं। होली के मौके पर उन्होंने इटावा के अपने पैतृक गांव में कांग्रेस की जमकर खबर ली थी। यहां तक कह दिया था कि कांग्रेस की राजनीति धोखेबाजी की रहती है। इसकी नीतियों के चलते महंगाई बढ़ी है। मनमोहन सरकार ने घोटालों और घपलों का रिकॉर्ड बना लिया है। इसके चलते अगले चुनाव में कांग्रेस का सफाया तय है। उन्होंने यह भविष्यवाणी भी कर डाली है कि एक बार फिर तीसरे मोर्चे की मिलीजुली सरकार बनने के आसार हो गए हैं। क्योंकि, जनता कांग्रेस के साथ भाजपा को भी सबक सिखा देगी।

अपनी रौ में बोलते हुए मुलायम ने भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की तारीफ भी कर दी थी। जबकि, आम तौर पर सपा सुप्रीमो, भाजपा नेताओं की कभी सराहना नहीं करते। शायद, इसीलिए राजनीतिक हलकों में मुलायम की इस टिप्पणी के अलग-अलग राजनीतिक निहितार्थ ढूंढे जाने लगे थे। सपा के ये तेवर देखकर, कांग्रेस ने भी गिड़गिड़ाने की जगह पलटवार की रणनीति अपना ली है। कांग्रेस प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने यहां तक कह दिया कि यदि मुलायम को कांग्रेस इतनी खराब लग रही है, तो वे अपना समर्थन वापस क्यों नहीं ले लेते? यह फैसला करने से क्यों डरते हैं? दिग्विजय सिंह सहित कई और नेताओं ने सपा को आड़े हाथों लेने की रणनीति अपना ली।

इस बीच बेनी वर्मा ने एक बार फिर अपने कड़क बयानों से विवाद बढ़ा दिया है। उन्होंने शनिवार को खुलकर आरोप लगाए कि मुलायम की राजनीति मुसलमानों को धोखे में रखने की रही है। चूंकि, वे दो दशक तक मुलायम के करीबी रह चुके हैं, ऐसे में उनसे ज्यादा सपा सुप्रीमो की असलियत कोई नहीं जानता है। अक्खड़ नेता बेनी   ने यहां तक कह डाला कि अंदर-अंदर मुलायम और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच सांठ-गांठ रहती है। वे ऐसे तमाम मामलों को जानते हैं, जहां पर भाजपा की ‘कृपा’ पाने के लिए मुलायम ने बहुत कुछ ऐसा किया था, जिसे कोई और नहीं जानता।

इसके पहले भी बजट सत्र के दौरान बेनी ने आरोप लगाया था कि मुलायम के रिश्ते आतंकवादियों से हैं। वे वोट राजनीति के लिए मुल्क को खतरे में डाल सकते हैं। इस दौरान उन्होंने कई और अभद्र किस्म की बातें भी कह डाली थीं। इसको लेकर काफी राजनीतिक बवेला मचा था। इस मुद्दे पर लोकसभा के अंदर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने हाथ जोड़कर मुलायम को शांत कराने की कोशिश की थी। यह भी अपील की थी कि वे बेनी बाबू को मंत्रिमंडल से हटवाने के लिए दबाव न बनाएं। कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने भी केंद्रीय मंत्री की टिप्पणियों पर खेद जताया था। इस साफ-सफाई के बाद मामला कुछ ठंडा पड़ने लगा था। लेकिन, मुलायम ने होली के मौके पर कांग्रेस को धोखेबाज करार किया, तो फिर टंटा बढ़ गया।

सपा नेतृत्व भी समझ नहीं पा रहा कि आखिर खेद जताने के बाद भी बेनी प्रसाद एक बार फिर इतने कड़े तेवर कैसे अपना रहे हैं? पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने डीएलए से अनौपचारिक बातचीत में कहा कि उन लोगों को लगने लगा है कि इसके पीछे कांग्रेस की कोई न कोई सोची समझी रणनीति जरूर है। ताकि, सपा का नेतृत्व बेनी के बयानों में ही उलझा रहे। ऐसा लगता है कि ‘बदजुबान’ नेता बेनी को कांग्रेस से पक्के संरक्षण का आश्वासन है। वरना, वे अपनी कुर्सी बार-बार दांव पर क्यों लगाते? सूत्रों के अनुसार, इस संदर्भ में सपा नेतृत्व ने रविवार को अपनी नाराजगी सोनिया के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से जता दी है। पटेल ने भरोसा दिया है कि वे सपा की नाराजगी का संदेश आलाकमान तक पहुंचा देंगे। यह भी आश्वासन मिला है कि बेनी प्रकरण के पीछे कांग्रेस की कोई बदनीयत नहीं है। सो, वे इस मामले को दिल पर न लें।

बेनी प्रसाद के करीबी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का पूरा विश्वास केंद्रीय मंत्री जीत चुके हैं। दो दिन पहले बेनी ने राहुल से संपर्क किया था। उन्होंने अपनी सफाई में यही कहा है कि वे साफ दिल के नेता हैं, ऐसे में खरी-खरी बातें करने की उनकी आदत है। वे कांग्रेस नेतृत्व को धोखेबाज करार करने वाले नेता की पोल खोलेंगे। वे डर कर राजनीति नहीं कर सकते। बेनी के करीबी दावा कर रहे हैं कि मुलायम चाहे जितना दबाव बना लें, लेकिन बेनी बाबू की कुर्सी हिला नहीं सकते। यदि इतना वाकई में जोखिम होता, तो शायद वे चुप्पी साधना पसंद कर लेते।
मुलायम ने अपने सिपहसालारों से कहा है कि वे बेनी के बयानों की उपेक्षा करना शुरू कर दें। जनता, ऐसे नेता को सबक सिखा दे। इसका राजनीतिक प्रबंधन मजबूत करें। सूत्रों के अनुसार, मुलायम ने विपक्ष के कई सेक्यूलर दलों से संवाद बढ़ाया है। इस काम में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा उनकी खास मदद कर रहे हैं। देवगौड़ा के जरिए ही मुलायम सिंह ने ओडिसा के मुख्यमंत्री एवं बीजद के प्रमुख नवीन पटनायक से संपर्क साधा है। संभावना है कि जल्द ही दोनों नेताओं की मुलाकात होगी। इस सिलसिले में पहले पटनायक से देवगौड़ा मुलाकात के लिए भुवनेश्वर जाएंगे। यह अलग बात है कि मुलायम ने यू-टर्न लेते हुए कह दिया है कि वे सरकार से समर्थन वापस लेने नहीं जा रहे। क्योंकि, इससे सांप्रदायिक ताकतों को लाभ मिल जाएगा। इस आश्वासन के बाद भी कांग्रेस के लोग मुलायम की रणनीति को लेकर आशंकित हैं। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता जुबानी जंग लड़ने वाले अपने ‘योद्धा’ बेनी बाबू को बधाई भी दे रहे हैं। मुलाकातियों से बेनी कहते भी हैं कि कांग्रेस के तमाम बड़े नेता उनकी सराहना कर रहे हैं। क्योंकि, मुलायम को ललकारना हर किसी के बूते की बात नहीं है। वैसे भी, वे कुर्सी से ज्यादा राजनीतिक स्वाभिमान की कद्र करते हैं। यह भी जानते हैं कि वे केंद्रीय मंत्री मुलायम की ‘कृपा’ पर नहीं हैं। ऐसे में, दबने-डरने का सवाल नहीं है। बेनी के करीबी मंत्री जी के हौसले देखकर यही कह रहे हैं कि ‘युवराज’ की जिस पर खास इनायत हो, वह भला डरे भी तो क्यों?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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