यूपी का आबकारी घोटाला- एक : निगल लिए गए दो लाख बत्तीस हजार करोड़

: पोंटी के खातिर सुप्रीम कोर्ट में गलत बयानी : आबकारी मंत्री के खिलाफ लोकायुक्त से शिकायत : इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले पांच वर्षों के दौरान पूरे प्रदेश का आबकारी कारोबार शराब माफिया पोंटी चड्ढा को सौंप रखा है। शराब के खेल में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए के घोटालों को अंजाम दिया जा रहा है। यहां तक कि प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट तक में इस मामले में गलतबयानी की है।

बसपा सरकार बनते ही पहले उत्तर प्रदेश चीनी निगम के माध्यम से पोंटी चड्ढा की अपनी ब्लू वाटर लिमिटेड को शराब कारोबार का लाइसेंस दिया गया। सुप्रीमकोर्ट में इसे चुनौती देने पर सरकार ने जवाब दिया कि आबकारी विभाग ने अपनी नीति बदल दी है और चीनी मिल संघ एवं ब्लू वाटर को इससे हटा दिया गया है जब सुप्रीमकोर्ट ने याचिका का मकसद पूरा होने के आधार पर याचिका निस्तारित कर दी तो फिर सरकार ने मेरठ जोन के मलाईदार 23 जिलों में फिर से शराब के कारोबार का लाइसेंस उप्र सहकारी चीनी मिल संघ को दे दिया जिसने पोंटी चड्ढा की ही दूसरी कंपनी फ्लोर एंड फेना लिमिटेड को यह कारोबार सौंप दिया।

पत्रकार विनय मिश्र द्वारा प्रदेश के लोकायुक्त के यहां दर्ज की गई शिकायत में कहा गया है कि मई 2007 में उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार बनने के बाद प्रदेश सरकार के मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी व एक शराब व्यवसाई पोंटी चड्ढा द्वारा लगभग दो लाख बत्तीस हजार करोड़ रुपए का घोटाला किया गया। 13 मई 2007 को बसपा सरकार बनने के बाद 30 जून 2007 को आबकारी विभाग ने एक नई आबकारी नीति अपनाई। इसके तहत उत्तर प्रदेश

पोंटी चड्ढा
पोंटी चड्ढा
के शीर्ष सहकारी संस्थान, उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी मिल संघ को लाइसेंस जारी किया गया। इसके बाद प्रदेश के दुकानदारों के पास, आबकारी राजस्व की वसूली का बिल ब्लू वाटर इण्डस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा भेजा जाने लगा।

शिकायत में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश चीनी मिल संघ को लाइसेंस मिला और पिछले दरवाजे से जब ब्लू वाटर कम्पनी द्वारा भेजे जाने वाले बिलों का छोटे दुकानदारों ने भुगतान करने से मना कर दिया, इसके एक सप्ताह बाद अपर आबकारी आयुक्त ने एक दूसरा लाइसेंस जारी किया। इस लाइसेंस में अनुज्ञापनधारी के नाम में उ.प्र. सहकारी चीनी मिल संघ के साथ ही दूसरा नाम मेसर्स ब्लूवाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड का जोड़ा गया। इस तरह से पूरे प्रदेश में बगैर किसी टेंडर के हजारों करोड़ रुपये का आबकारी कारोबार ब्लू वाटर कम्पनी को दे दिया गया। जबकि प्रदेश सरकार ने जो आबकारी नीति घोषित की थी उसमें किसी प्राइवेट कम्पनी को इस कारोबार में शामिल करने का कोई उल्लेख नहीं था।

इस संबंध में उच्चतम न्यायालय में दाखिल विशेष अनुमति याचिका पर जब कोर्ट ने जवाब-तलब किया तो प्रदेश के मुख्य सचिव तथा आबकारी आयुक्त ने संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय में जवाब दाखिल किया। जवाब में कहा गया कि विभाग ने अपनी नीति बदल दी है और ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज को इस कारोबार से हटा दिया गया है। शेष दो पक्षों उ.प्र. सहकारी चीनी मिल संघ व ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया। आबकारी विभाग द्वारा ब्लू वाटर कम्पनी के कारोबार पर रोक लगाने सम्बन्धी जवाब से संतुष्ट होकर सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्प्णी किया कि प्राइवेट कंपनी अब कारोबार नहीं कर रही है। याचिका का मकसद पूरा हो गया है और याचिका डिस्पोज ऑफ कर दी गयी। लेकिन जल्दी ही बसपा सरकार ने उसके विपरीत आचरण करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आयी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जोन के 23 जिलों में फिर से उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी मिल संघ का कारोबार का लाइसेंस दे दिया गया। इसके बाद ब्लू वाटर प्रा.लि. के स्थान पर फ्लोरा एंड फेना प्रा.लि. कम्पनी काम करने लगी। इस तरह से जो कार्य पहले ब्लू वाटर प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी कर रही थी उसी तर्ज पर दूसरी कम्पनी को बगैर किसी टेण्डर के काम दे दिया गया। गैर कानूनी ढंग से की जा रही वसूली पर रोक लगाने संबंधी विशेष अनुमति याचिका (सिविल नं. (एस.) 2244/2008) पर मा. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री केजी बालाचन्द्रन व न्यायमूर्ति श्री आर रविन्द्रन की खंडपीठ में 3 मार्च 2008 को सुनवाई हुई।

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जेपी सिंह द्वारा लिखी गई यह खबर लखनऊ-इलाहाबाद से प्रकाशित अखबार डेली न्यूज एक्टिविस्ट उर्फ डीएनए में छप चुकी है, वहीं से साभार लिया गया है.

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