यूपी के एडीजी और डीजीपी की छुट्टी होगी!

लाख टके का सवाल यह है कि आखिर कौन लोग है जो सरकार को बदनाम करना चाहते हैं। बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पूरे भविष्य पर सवाल खड़े कर रही है और पूरी सरकार मिलकर भी पुलिस महकमे को सुधार नहीं ला पा रही। अब एक बार फिर एडीजी और डीजीपी की विदाई की चर्चाएं जोरों पर हैं। लोकसभा चुनाव से पहले यह परिवर्तन भी क्या बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था को सुधार पायेगा। इसकी उम्मीद कम ही है। पिछले दिनों में आईपीएस अफसरों के तबादलों में जिस तरह सरकार की फजीहत हुई उसने दर्शा दिया कि पूरी सरकार के बड़े अफसरों में भारी तालमेल की कमी है।

बीते दिनों जब अट्ठारह आईपीएस अफसरों की सूची जारी हुई तो सभी भौचक्के रह गये। इस सूची में बाकी अफसरों के साथ-साथ दो पुलिस अफसर चर्चा का विषय बन गये। वसीम अहमद और अब्दुल हमीद ही वो मुस्लिम आईपीएस थे जो जिलों में तैनात थे। इस सूची में दोनों को पीएसी में तैनात कर दिया गया था। लोग हैरान थे कि लोकसभा चुनावों में मुस्लिम वोटों पर उम्मीदें लगाए बैठी समाजवादी पार्टी इतनी बड़ी गलती कैसे कर सकती है। इसकी भारी प्रतिक्रिया होनी ही थी।

दरअसल मुस्लिम अफसरों की तैनाती को लेकर सरकार हमेशा निशाने पर रहीं हैं। मायावती सरकार में यह बात चर्चा में आयी और कुछ मुस्लिम संगठनों ने ज्ञापन भी दिया कि बीते बीस सालों में लखनऊ में कोई भी डीएम, एसएसपी, डीआईजी, आईजी, कमिश्नर मुसलमान नहीं रहा। भारी नाराजगी के बाद सरकार को भी यह बात समझ आयी और तुरंत जावेद अख्तर को लखनऊ का आईजी बना दिया गया।

मगर सरकार बनते ही सबने मान लिया कि मुख्यमंत्री की सबसे ताकतवर सचिव अनीता सिंह के पति सुभाष ही इस पद पर तैनात होंगे और हुआ भी यही। जावेद अख्तर को आगरा का आईजी बनाकर सुभाष को लखनऊ का आईजी बना दिया गया।

बीते दिनों मुस्लिमों को लुभाने के लिए समाजवादी पार्टी ने दिन रात एक कर दिए। सपा नेताओं ने कहा कि हर थानों में दो मुस्लिम कांटेबलों की तैनाती की जायेगी। तब साफ संदेश था कि मुस्लिमों को लुभाने की कवायद चल रही है। मुस्लिमों में इस बात को लेकर भी नाराजगी थी कि इस सरकार में भी पुलिस के बड़े मुस्लिम अफसरों को अच्छी पोस्टिंग नहीं दी जा रही। रिजवान अहमद को लंबे समय बाद रेलवे में भेजा गया। एडीजी के पदों में एडीजी कानून व्यवस्था के अलावा एडीजी कार्मिक सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। मगर एक मात्र मुस्लिम एडीजी जावेद अख्तर को पॉवर कॉरपोरेशन में भेज दिया गया। आईजी जकी अहमद को गोरखपुर का आईजी बनाया गया जो सबसे कम महत्व का जोन माना जाता है।

इसके अलावा वसीम अहमद को बाराबंकी तथा अब्दुल हमीद को शामली जैसे छोटे जिले दिये गये। मुस्लिमों में इस बात को लेकर भी भारी नाराजगी थी कि आखिर यह पोस्टिंग इतनी महत्वहीन जगहों पर क्यों की जा रही है। यह तय माना जा रहा था कि इन दोनों लोगों को किसी बड़े शहर में तैनात किया जायेगा। मगर इन दोनों की पीएसी में तैनाती किसी के गले नहीं उतरी। अब्दुल हमीद का दोष इतना था कि उन्होंने उत्पात पर उतरे कुछ भाजपा नेताओं को सबक सिखा दिया था मगर वसीम अहमद के विषय में किसी को कुछ समझ नहीं आया। अफसरों में भी इस बात की चर्चा होती रही कि आजमगढ़ में विधायक की हत्या और भारी बवाल के बावजूद पुलिस अधीक्षक को नहीं हटाया गया क्योंकि वह यादव थे। यही नहीं गाजियाबाद जैसी जगह पर 2006 बैच के धर्मेन्द्र यादव जैसे जूनियर अफसरों को तैनात किया गया तो आगरा, इलाहाबाद और गोरखपुर की तैनाती भी इसी बात को लेकर चर्चा में बनी रही।

इस लिस्ट के बाद हुए बवाल के बाद सभी अफसरों की नयी जगह तैनाती के लिए रोक लगा दी गयी। पांच दिन तक सरकार की भारी फजीहत हुई और उसके बाद नयी सूची में  अखिर वसीम अहमद और अब्दुल हमीद जिले में तो रह गये मगर कोई बड़ा जिला नहीं मिला।

यही नहीं पांच दिन के बाद जारी हुई इस सूची के एक घंटे बाद फिर तीन अफसरों के तबादलों में संशोधन किया गया और यह फाइनल हो पाते उसके आधे घंटे के अंदर फिर एक आईपीएस अफसर को बदल दिया गया। जाहिर है इतनी बार संशोधन और इतनी बार चर्चा के बाद सभी की जबान पर यह था कि सरकार और अफसरों के बीच में तालमेल की भारी कमी है। उधर सपा मुखिया भी प्रदेश की लगातार बिगड़ती कानून व्यवस्था से बेहद नाराज और दुखी थे। उन्हें पता था कि उनकी सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर ही सबसे ज्यादा सवाल खड़े होते हैं।

साथ ही उन्हें यह भी पता था कि अगर कानून व्यवस्था नहीं संभाल पाये तो लोकसभा में अखिलेश यादव को भारी नाकामी का सामना करना पड़ेगा। उधर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी कानून व्यस्था के मामले पर बेहद दुखी थे क्योंकि  लाख चाहने पर भी प्रदेश की कानून व्यवस्था संभलने का नाम ही नहीं ले रही थी। इधर आजमगढ़ में विधायक सर्वेश सिंह की हत्या और उसके बाद हुई आगजनी ने माहौल और खराब कर दिया था। मगर इसी दौर में एडीजी कानून व्यवस्था का एक बयान खासा विवाद में आ गया। उन्होंने इस हत्याकांड के लिए जेल में बंद अपराधियों को न सिर्फ दोषी ठहराया बल्कि यह भी कह दिया कि अगर उनके हाथ में जेल की कमान होती तो वह चौबीस घंटे में जेल के भीतर हो रहे अपराधों पर काबू पा लेते। बताया जाता है कि एडीजी अरूण कुमार के इस बयान पर सपा प्रवक्ता और कारागार मंत्री राजेन्द्र चौधरी ने भारी आपत्ति जताई और सपा मुखिया को सारी बात बताई। एडीजी कारागार भी इस मामले में भारी नाराज दिखाई दिये और उन्होंने कहा कि एडीजी कानून व्यवस्था का अपना निजी बयान हो सकता है।

मुख्यमंत्री अफसरों की इस खींचतान से भारी नाराज थे और प्रदेश में किसी भी कीमत पर कानून व्यवस्था ठीक करना चाहते थे। मिली जानकारी के मुताबिक माहौल ठीक करने के लिए एडीजी और डीजीपी दोनों की छुट्ड्ढटी किए जाने की बात चर्चा में आ रही है। मुकुल गोयल या आरके विश्वकर्मा को एडीजी कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी दी जा सकती है। डीजीपी के लिए एके गुप्ता के अलावा दो अन्य नामों पर भी विचार चल रहा है मगर अभी तय नहीं हो पाया। देखना यह है कि अखिलेश यादव का यह नया प्रयोग भी प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति सुधार पायेगा या फिर लोकसभा चुनावों में उन्हें इस मसले पर भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली न्यूजपेपर के संपादक हैं.

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