यूपी के घोटालेबाज प्रमुख सचिव (नियुक्ति) राजीव कुमार की सजा स्थगन का ‘राज’

लखनऊ।  प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में हाईकोर्ट से सजायाफ्ता हैं। यह दागी अफसर भ्रष्टों को मलाईदार तैनातियां बांटकर सरकार की छवि खराब कर रहा है। आखिर एक घोटालेबाज आईएएस जेल न जाकर पूरी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाकर इतने महत्वपूर्ण पद पर कैसे विराजमान है? दरअसल यह एक बड़ा षड्यंत्र है, जिसमें पूर्व दागी संयुक्त निदेशक सीबीआई जावेद अहमद, सीबीआई के वकील अनुराग खन्ना समेत यूपी सरकार के कई बड़े अफसर शामिल हैं वरना आज राजीव कुमार जेल की सलाखों के पीछे होते। इस षड्यंत्र की उच्चस्तरीय जांच कराने से कई बड़े खुलासे और होंगे।

नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में दागी आईएएस राजीव कुमार को सीबीआई की विशेष अदालत ने तीन वर्ष कैद के साथ जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ यह भ्रष्ट अफसर हाईकोर्ट पहुंचा और न्यायाधीशों ने सजा को न सिर्फ स्थगित किया बल्कि जुर्माने पर भी रोक लगा दी और घोटालेबाज आईएएस राजीव कुमार की ताजपोशी पुनः प्रमुख सचिव नियुक्ति की मलाईदार तैनाती पर हो गयी। अब जरा उस षड्यंत्र से पर्दा उठाया जाए, जिसके जरिए हाईकोर्ट तक को गुमराह करने का प्रयास किया गया है। एनआरएचएम, खाद्यान्न व सूचना विभाग का भर्ती घोटाला समेत तमाम बड़े घोटालों की सीबीआई जांचों से भ्रष्टों को बचाने वाले तत्कालीन दागी संयुक्त निदेशक सीबीआई जावेद अहमद ने राजीव कुमार को बचाने का काम किया था। इसमें पूर्व लोकायुक्त सुधीर वर्मा के दामाद व राजीव कुमार के केस में सीबीआई के वकील अनुराग खन्ना भी शामिल थे।

खन्ना को आईएएस राजीव कुमार ने ही नोएडा का वकील बनवाया था। इसलिए उन्होंने अपना कर्ज उतारते हुए हाईकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला नहीं दिया। जिसमें सुप्रीमकोर्ट ने मुम्बई हाईकोर्ट द्वारा भ्रष्टाचार के दोषी लोकसेवक की सजा को स्थगित करने पर रोक लगायी थी। सुप्रीमकोर्ट में क्रिमिनल अपील नंबर 1648 (2012) के जरिए महाराष्ट्र सरकार थ्रू सीबीआई एंटी करप्शन ब्रांच मुंबई ने बालाकृष्ण दत्तात्रेय कुंभार के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट द्वारा सजा स्थगन के खिलाफ अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश डॉ. बीएस चौहान ने सुनवाई के बाद इस मामले में दिये अपने आदेश में लिखा है कि यह अपील 8.4.2008 के मुंबई हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ की गयी है।  सेंट्रल एक्साइज के सुपरिटेंडेंट रहे बालाकृष्ण दत्तात्रेय कुंभार के खिलाफ प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1998 में अंडर सेक्शन 13 (2) सेक्शन 13 (1 (ई) में स्पेशल जज सीबीआई द्वारा 15.10.2007 को स्पेशल केस नंबर 93 (2000) (आय से अधिक संपत्ति मामला) में सजा सुनाई गयी थी। लेकिन मुंबई हाईकोर्ट ने 8.4.2008 को अपने फैसले में भ्रष्टाचार के दोषी अफसर के खिलाफ सजा को स्थगित कर दिया था। 1 लाख का जुर्माना तक इस अफसर पर हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश ने अपने फैसले के पैरा नंबर नौ में महाराष्ट्र सरकार बनाम गजानन एआईआर 2004 एससी 1188 केस का हवाला देते हुए कहा कि इस फैसले मंे ठीक इसी तर्ज पर केसी सरीन और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अतर सिंह (2003) 12 एससीसी 434 में भी फैसला सुनाया गया था कि सिर्फ यह तर्क देकर कि अगर आरोप सिद्धि व सजा प्राप्ति को न स्थगित किया गया तो सरकारी सेवक की नौकरी चली जाएगी, किसी की भी सजा को स्थगित नहीं किया जा सकता है। यह बेहद अहम फैसला है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण आदेश से भ्रष्ट लोकसेवकों की सजा को हाईकार्ट स्थगित नहीं कर सकता है। लेकिन नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में दोषी आईएएस प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार की अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न सिर्फ 3 वर्ष की सजा स्थगित कर दी बल्कि जुर्माने पर भी रोक लगा दी।

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि अपना कर्ज उतारने के चक्कर में सीबीआई वकील अनुराग खन्ना ने हाईकोर्ट में सीबीआई की तरफ से पैरवी करते हुए न्यायाधीशों को सुप्रीमकोर्ट के इस महत्वपूर्ण आदेश के बारे में बताया ही नहीं। अगर हाईकोर्ट को वास्तव में शीर्ष न्यायपालिका के आदेश  के बारे में बताया जाता, जिसमें भ्रष्टाचार के दोषी सरकारी सेवक की सजा को स्थगित करने के मुंबई हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीमकोर्ट ने रोक लगायी थी तो आज आईएएस राजीव कुमार न सिर्फ जेल की सलाखों के पीछे होते बल्कि प्रमुख सचिव नियुक्ति के मलाईदार पद पर भी न बैठे होते। लेकिन तत्कालीन संयुक्त निदेशक सीबीआई जावीद अहमद व सीबीआई वकील अनुराग खन्ना ने आईएएस राजीव कुमार को नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में जेल जाने से बचाने के लिए हाईकोर्ट से सजा को स्थगित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दरअसल तत्कालीन संयुक्त निदेशक सीबीआई जावीद अहमद ने यूपी के तमाम बड़े घोटालों व मामलों की सीबीआई जांचों को दबाकर भ्रष्टों को बचाने  में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

खासतौर पर हजारों करोड़ का एनआरएचएम घोटाला, खाद्यान्न घोटाला समेत  सूचना विभाग का भर्ती घोटाला, जिसमें प्रमुख रुप से आईएएस संजय अग्रवाल, महेश गुप्ता, बादल चटर्जी, विजय शंकर पाण्डेय, अजय कुमार उपाध्याय, आईएएस विनय कुमार श्रीवास्तव, पूर्व मंत्री अनंत मिश्रा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, देवेंद्र पांडे समेत 11 पीसीएस व कई अफसर-नेता फंसे है। जावीद अहमद ने ही आरूषि हत्याकांड को भी दफन कराने के उच्चस्तरीय प्रयास किए थे। सीबीआई जब तक संयुक्त निदेशक सीबीआई रहे जावीद अहमद के कार्यकाल की व्यापक जांच नहीं करेगी तब तक उत्तरप्रदेश के किसी भी बड़े घोटाले की जांच के अंतिम मुकाम तक पहुंचना मुमकिन नहीं है। वहीं आईएएस राजीव कुमार को बचाने के सीबीआई अफसरों व सीबीआई वकील के षड्यंत्र की गहराई से जांच हाईकोर्ट को इसलिए भी करानी चाहिए क्योंकि यह दो न्यायपालिकाओं के बीच टकराव की स्थिति पैदा करने का बेहद गंभीर प्रकरण भी है।

लखनऊ से पत्रकार मनीष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

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