यूपी में जंगलराज : पांच दिन तक गायब रहे पुलिस अधीक्षक पर कोई कार्रवाई नहीं

Prabhat Ranjan Deen : उत्तर प्रदेश सरकार के एक महत्वपूर्ण महकमे का पुलिस अधीक्षक अचानक गायब हो गया। चार-पांच दिनों तक गायब रहा। नौकरशाही के शीर्ष गलियारे में पांच दिनों तक सनसनी मची रही। पुलिस अधीक्षक की पत्नी ने भी बवाल मचा दिया। एसपी की तलाशी में लखनऊ पुलिस को लगाया गया। खुफिया यूनिट लगाई गई। फोन सर्विलांस पर डाला गया। लेकिन कुछ पता नहीं चला। मंगलवार को वह अफसर अचानक अवतरित हो गया और बड़े आराम से ड्यूटी सम्भाल ली। पुलिस प्रशासन भी इस मसले को ऐसे ले रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

प्रदेश की नौकरशाही में अराजकता इस कदर है कि घोर अनुशासनहीनता के मामले में कार्रवाई करने के बजाय उस अधिकारी से 'बैक डेट' में छुट्टी का आवेदन ले लिया गया। शीर्ष अधिकारी तक इसे 'पर्सनल मैटर' बताने की धृष्टता कर रहे हैं। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि सरकार का अपने ही अफसरों पर कोई नियंत्रण नहीं है। कोई भी किसी भी संदेहास्पद गतिविधि में बेखौफ लिप्त हो सकता है।

पुलिस के भ्रष्टाचार निवारण संगठन के मुख्यालय में अपर पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात सुशील कुमार शुक्ला बुधवार नौ अप्रैल की शाम को अचानक गायब हो गए। शुक्ला की खोज-खबर ली जाने लगी तो उनका सीयूजी नम्बर और उनका व्यक्तिगत नम्बर दोनों बंद पाया गया। देर शाम तक घर नहीं पहुंचने पर उनकी पत्नी इंदिरा भवन स्थित एंटी करप्शन ऑर्गेनाइजेशन के मुख्यालय पहुंच गईं। एसपी की गुमशुदगी इतनी रहस्यमय थी कि दफ्तर के बाहर उनके इंतजार में खड़े ड्राइवर को भी पता नहीं चला कि साहब लापता हो गए हैं। ड्राइवर ने कहा कि वह साहब का इंतजार कर रहा है।

सुशील कुमार शुक्ला के देर रात तक घर नहीं पहुंचने पर उनकी पत्नी ने रात के करीब डेढ़ बजे दफ्तर पर फिर धावा बोल दिया। खूब हंगामा मचाया। फिर पुलिस महानिदेशक आनंद लाल बनर्जी, एसीओ के एडीजी गिरीश प्रसाद शर्मा, डीआईजी राकेश प्रधान और लखनऊ के एसएसपी प्रवीण कुमार को खबर दी गई। लखनऊ पुलिस का कंट्रोल रूप घनघनाने लगा। सारे थाने अलर्ट किए गए। लेकिन एसपी का कोई पता नहीं चला। तब एसपी की गुमशुदगी की बाकायदा रिपोर्ट दर्ज कराई गई। अगले दिन एलआईयू भी लगा दी गई और एसपी के सारे फोन सर्विलांस पर दे दिए गए। लेकिन शुक्ला का कुछ पता नहीं चला।

काफी जद्दोजहद के बाद सर्विलांस के जरिए जो कहानी सामने आई वह रोचक तो है, पर रहस्यमय ज्यादा है। एसपी साहब नौ अप्रैल की शाम को सबकी निगाह से खुद को बचाते हुए सीधे लखनऊ एयरपोर्ट पहुंचे और हवाई जहाज से दिल्ली चले गए। यहां लखनऊ में उनके परिवार की सांस अंटकी रही और शुक्ला दिल्ली में रहस्यमय मौन साधे पड़े जाने क्या करते रहे। उत्तर प्रदेश पुलिस के भ्रष्टाचार निवारण संगठन के एसपी गैर-जिम्मेवाराना तरीके से गुम होकर दिल्ली में क्या कर रहे थे? उनके वापस लौट आने के बाद भी किसी अधिकारी ने उनसे यह नहीं पूछा। अनुशासन के मसले पर जैसे किसी को कोई चिंता ही नहीं। आला अधिकारियों को सूचना दिए बगैर गायब हो जाने के बारे में शुक्ला से न कोई 'शो-कॉज' मांगा गया और न कोई विभागीय कार्रवाई ही शुरू हुई। ड्यूटी से गायब होकर एक महत्वपूर्ण महकमे का पुलिस अधीक्षक दिल्ली में क्या कर रहा था, इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए थी, लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

पुलिस अधीक्षक शुक्ला अचानक मंगलवार को आए और ड्यूटी सम्भाल ली। जैसे सब सामान्य हो। बैक डेट में उनसे छुट्टी का आवेदन लेकर मामला रफा-दफा कर दिया गया। किसी भी शीर्ष अधिकारी ने मामले की संवेदनशीलता समझने की जहमत नहीं उठाई, उल्टा बातचीत में मजाकिया लहजे में बातें करते रहे। पुलिस अधीक्षक सुशील कुमार शुक्ला ने कहा, 'छुट्टी का एप्लिकेशन देकर गया था। हां मोबाइल स्विच ऑफ था। एप्लिकेशन में यह जिक्र नहीं किया था कि कहां गए थे।' शुक्ला की बोली से यह साफ कर गया कि उन्होंने लौटने के बाद छुट्टी का आवेदन दिया है। शुक्ला ने एक बात और कही, 'कुछ व्यक्तिगत कारण भी तो होता है।' एसीओ के डीआईजी राकेश प्रधान की सुनिए वे क्या कहते हैं।

श्री प्रधान ने कहा, 'इसमें कार्रवाई क्या होनी है! वे आए और छुट्टी की एप्लिकेशन दे दी। अब उनकी पत्नी क्या कहती हैं, यह तो उनका पर्सनल मैटर है।' अब देखिए विभागीय मुखिया का बयान। एंटी करप्शन ऑर्गेनाइजेशन के अपर महानिदेशक (एडीजी) गिरीश प्रसाद शर्मा इस प्रकरण पर कहते हैं, 'इसमें विभागीय कार्रवाई क्या होगी? उनकी छुट्टी की एप्लिकेशन आ गई। उनकी पत्नी की अगर कोई शिकायत है तो उसमें जिला पुलिस कार्रवाई करेगी।' इस पर लखनऊ जिला पुलिस के वरिष्ठ अधीक्षक प्रवीण कुमार ने माकूल जवाब दिया। उन्होंने कहा, 'लखनऊ पुलिस शुक्ला की मिसिंग रिपोर्ट दर्ज कर अपनी छानबीन कर रही थी। अब वो आ गए हैं तो जिला पुलिस का काम खत्म। बिना अधिकारियों को बताए वे दफ्तर से गायब थे तो 'अन-ऑथराइज्ड ऐबसेंस' के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए।'

वायस आफ मूवमेंट के संपादक प्रभात रंजन दीन के फेसबुक वॉल से.

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