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ये अन्ना हजारे को क्या हो गया है? कुछ करते क्यों नहीं, उन्हें समझाओ भाई

Nadim S. Akhter : जरा पता लगाइए कि अन्ना हजारे कब अनशन तोड़ रहे हैं. उनके आसपास की मंडली उन्हें क्या सलाह दे रही है. अन्ना भी बुरी तरह एक्सपोज हुए हैं. आम आदमी पार्टी की जीत के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कह रहे थे कि यहां लोकतंत्र कहां है??
Nadim S. Akhter : जरा पता लगाइए कि अन्ना हजारे कब अनशन तोड़ रहे हैं. उनके आसपास की मंडली उन्हें क्या सलाह दे रही है. अन्ना भी बुरी तरह एक्सपोज हुए हैं. आम आदमी पार्टी की जीत के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कह रहे थे कि यहां लोकतंत्र कहां है??
 
अरे भाई, लोकतंत्र नहीं है तो क्या मदारी का ठीया है??? अजब-गजब बात करने लगे हैं अन्ना. कह रहे थे कि मैं किसी पक्ष या पार्टी के साथ नहीं जाऊंगा. अच्छी बात है. ये आपकी लाइन रही है, आप इस पर कायम रहिए.
 
लेकिन ये तो अन्ना को सोचना ही होगा कि यदा-कदा-सर्वदा टाइप के अनशन से क्या जनलोकपाल बिल वो पास करवा लेंगे?? तब तो हुआ नहीं, जब सड़क पर जनता उतर गई थी और अन्ना अंतरराष्ट्रीय फलक पर छा गए थे. अब जब रालेगण की जनता भी उनके अनशन से नदारद है, तब सरकार उनकी बात पर क्यों झुकने लगी भला?? अन्ना की जो थोड़ी बहुत खबर मीडिया में दिख रही है, वह इसलिए कि उनके चेले अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव में धमाका कर डाला है. तभी महाराष्ट्र में बुरे नतीजों से डरे सीएम ने अपने एक मंत्री को अन्ना के गांव भेजकर उन्हें अनशन तोड़ने के लिए कहा, खानापूर्ति के लिए. यह दिखाने के लिए कि हम अन्ना का ख्याल करते हैं और कहीं गुस्साई जनता लोकसभा चुनाव में वहां भी कांग्रेस-एनसीपी का बैंड ना बजा दे.
अन्ना की दिक्कत ये है कि अब वे अव्याहारिक बात करने लगे हैं. लोगों और सरकार को झकझोरने के लिए एक समय अनशन ठीक था. वह हो भी गया सफलतापूर्वक. लेकिन आगे अब और क्या?? उसी ढपली को लेकर कितना पीटा जाए, वह फट गया है अब. सो नई रणनीति बनानी होगी. और जब आप लोकतंत्र में जीते हैं, इस पर विश्वास करते हैं तो लोकतंत्र को गंदा क्यों कहते हैं?
 
लोकतंत्र गंदा नहीं है, राजनीति गंदी है. और इसे मैला हम-सब ने मिलकर किया है. तो आइए ना अन्ना, आप लोकतंत्र को सुधारने के लिए राजनीति की दशा-दिशा बदलने का साहस क्यों नहीं दिखाते?? और जब अरविंद केजरीवाल ने यह साहस दिखाया तो आप ने उसे सपोर्ट करने की बजाय पाजामे का नाड़ा ढीला करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. आखिर क्यों??? कौन हैं वे लोग, जो आपके आसपास अचानक से मंडराने लगे हैं, आंदोलन के बाद. मधुमक्खी बनकर चिपक गए हैं, पहले कहां थे ये लोग??
 
सो अन्ना, दूसरों की सलाह पर मत जाइए, अपनी अक्ल लगाइए. अभी आमरण अनशन एक बार फिर शुरु किया है, कुछ दिन बाद तोड़ भी देंगे. उनकी सलाह जब मिलेगी तो?? आपका अनशन का ये बंदूक अब मिसफायर हो रहा है. कोई संज्ञान नहीं ले रहा. क्यों अपनी भद्द पिटवा रहे हैं अन्ना जी???!! मैं आज भी मानता हूं कि देश की जनता आपसे प्यार करती है और आपमें अपना नैतिक बल देखती है. वो इसलिए कि आपने अपने विचार को आचार व व्यवहार में भी ढाला.
 
सो अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल कीजिए. आप ये कह रहे हैं कि अनशन करेंगे, लोगों को जगाएंगे…किसे जगाएंगे आप. उन लोगों को जो एक बार जगे थे, फिर सो गए. दिल्ली के बाद मुंबई में आए ही नहीं, जुटे ही नहीं. अपनी रणनीति बदलिए अन्ना. आजादी मिलने से पहले भी भारतीयों ने चुनाव लड़ा था और सरकार बनाई थी. गांधी जी ने ये नहीं कहा था कि हम तो सत्य और अहिंसा पर चलने वाले लोग, आजादी मिलने के बाद ही चुनाव लड़ेंगे और सरकार बनाएंगे. जितना स्कोप मिला था गांधीजी को, उन्होंने उसका भरपूर इस्तेमाल किया और करवाया. प्रत्यक्ष और अपरोक्ष रूप से. अपने गुरु महात्मा गांधी से ही कुछ सीख लीजिए अन्ना. वरना दुनिया तो बड़े-बड़ों को बिसरा चुकी है. गांधी यानी बापू को भी. जय हो.
 
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वाल से
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