ये आरोप तब और गंभीर हो जाते हैं, जब इसकी कमान नामी टीवी पत्रकार के हाथ में हो

भारतीय मीडिया का मौजूदा के जिस दौर से गुजर रहा हैं, उसमें उसे निश्चित तौर पर मंथन करने की आवश्कता है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, दोनों माध्यमों में बदलाव आ रहे हैं और ये बदलाव, समाचार के प्रस्तुतिकरण, समाचार चयन और पत्रकारिता के आधारभूत सिद्धांतों में आसानी से देखे जा सकते हैं। कुछ दिनों पहले ही राष्ट्रीय स्तर रीलांच हुए चैनल पर भी लगातार एकतरफा खबरों के प्रसारण के आरोप लग रहे हैं। और ये आऱोप उस समय ज्यादा गंभीर प्रतीत होते हैं, जब चैनल की कमान देश के ऐसे नामी वरिष्ठ टीवी पत्रकार के हाथ में हो, जिसे पूरा देश जानता हो, सोशल मीडिया में इस वरिष्ठ पत्रकार पर तमाम आरोप लग रहे हैं, चैनल के मालिकों को भी कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।

चैनल के मालिक के परिवार के दूसरे  सदस्यों के अपराध के संदर्भ में टिप्पणियां शुरू हो चुकी हैं, तो सिर्फ ये मान लेना कि जनता के बीच सिर्फ इस एक चैनल के बारे में ऐसा  सोचा जा रहा है, गलत होगा। दरअसल समाचार माध्यमों पर लगने वाले आरोपों का प्रभाव पूरी पत्रकारिता बिरादरी पर होता है। दुर्भाग्य से नीरा राडिया टेप कांड, पेड न्यूज पर प्रेस काउंसिल की रिपोर्ट, जिंदल प्रकरण और अब केजरीवाल प्रकरण से मीडिया की विश्वनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे है, जिनका जवाब खुद मीडिया के प्रतिनिधि वर्ग को ही सोचना होगा, जो पूरी पत्रकारिता बिरादरी का नेतृत्व करते हैं। ये भी सच है कि आज मीडिया का अर्थशास्त्र ही समाचारों पर भारी पड़ता है, पर दूसरा सच ये भी है कि बाजार के दबाव में सिद्धांतों से समझौता करने का सीधा सा अर्थ ये है कि हम आने वाले समय में अपनी रही-सही प्रतिष्ठा भी खो देंगे।

आरोप-प्रत्यारोप के माहौल में, सूचना-तकनीक के भंडार के बीच जनता के सामने मीडिया को अपनी निष्पक्ष छवि के जीर्णोद्धार करने का सबसे सही वक्त शायद आ चुका है। हालांकि ये भी शुभ संकेत है कि टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में मीडिया पर लगने वाले गंभीर आरोपों की चर्चा होने लगी है, पर मूल सवाल ये है कि पाठकों या दर्शकों के सामने तटस्थ समाचारों को प्रस्तुत करने की परंपरा को दायित्व के साथ निभाने का समय अब आ चुका है। इसमें भी कोई शंका नहीं है कि अधिकांश मीडिया समूह पत्रकारिता के क्षेत्र के अलावा खनन, रियल स्टेट और दूसरे तमाम व्यवसायों में शामिल हैं, जिनका प्रभाव मीडिया पर देखा जा सकता है औऱ कहीं न कहीं संपादकों को भी, पत्रकारों को भी बाजार के दबाव में कार्य संपादित करना ही होगा। मीडिया भी एक व्यवसाय है, इसमें कोई संदेह बाकी नहीं है, पर इसे व्यवसाय भी माने तो ये अन्य व्यवसायों की तुलना में मीडिया से लोगों का विश्वास ज्यादा है, अपेक्षाएं ज्यादा हैं, तो मीडिया की जिम्मेदारी दूसरे व्यवसायों से ज्यादा ही बनती है।

सुमीत ठाकुर

sumeetashok@gmail.com

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