ये जो नवाजुद्दीन है

मुजफ्फरनगर से 40 किलोमीटर की दूरी पर हिंडन नदी के किनारे पर बसा है ऐतिहासिक कस्बा बुढ़ाना। यह कभी बेगम समरू की रियासत भी रहा है। नदी के तट से थोड़ी ऊंचाई पर बसे बुढ़ाना की ऊंची-नीची गलियां किसी पहाड़ी सरीखे कस्बे का एहसास कराती हैं। इस कस्बे से मशहूर शायर तमन्ना जमाली, अकमल राही, हकीम जलील अहमद, लक्ष्मी चंद त्यागी चैयरमेन, निवर्तमान चैयरमेन मुन्नन। 80-90 के दशक में देश के तमाम समाचार पत्रों में संपादक के नाम पत्र लिखकर बुढ़ाना को पहचान देने वाले शाहिद सिद्दीकी जैसी कई अजीम शख्सियतें वाबस्ता हैं।

यहां की सावरिया की बालूशाही भी दूर-दूर तक मशहूर है। अब यह कस्बा उस शख्सियत के नाम से भी जाना जाने लगा है, जिसका नाम नवाजुद्दीन सिद्दीकी है। नवाज ने बुढ़ाना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने का काम किया है। आजकल नवाज बुढ़ाना आए हुए हैं। उनसे मिलने आने वालों का तांता लगा है। लोग देखना चाहते हैं, उस नवाज को, जो उनके बीच से निकलकर इतनी दूर निकल गया, जिसका लोग सिर्फ तसव्वुर कर सकते हैं। हालांकि जब वह फिल्मों में छोटे-छोटे रोल कर रहे थे, तो लोगों ने उनका खास नोटिस नहीं किया था। लेकिन पिछले साल आई ‘गैंग्स आॅफ वासेपुर’ ने लोगों को उनकी प्रतिभा को मानने के लिए मजबूर कर दिया। ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ ने सब कुछ बदल दिया। आमिर खान के साथ आई ‘तलाश’ ने उन्हें आम दर्शकों में पहचान दिलाई। हालांकि इन फिल्मों से पहले आशिम अहुलवालिया की फिल्म ऐसी थी, जिसमें नवाज लीड रोल में थे, लेकिन वह रिलीज नहीं हो पाई।

कड़े संघर्ष का दौर

ऐसा नहीं है कि उनको कामयाबी आसानी से मिल गई। यहां तक पहुंचने में उन्हें लगभग 20 साल तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा। जब मैं उनके संघर्ष के बारे में पूछता हूं, तो जैसे माजी की किताब के पन्ने पलटने शुरू हो जाते हैं। उनकी आंखें सोच की मुद्रा में सिकुड़ जाती हैं। वह कहना शुरू करते हैं, ‘अगर मैं कहूं कि एक्टिंग करना मेरा बचपन का सपना था, जो पूरा हो गया, तो यह कहना गलत होगा। बुढ़ाना से इंटर करने के बाद बीएससी की। नौकरी की तलाश में लगा तो पता चला कि बिना किसी टेक्निकल जानकारी के नौकरी भी मिलना मुश्किल है। सड़कों पर आवारगी करने के सिवा कोई काम नहीं था। भटकते हुए दिल्ली पहुंचा। वहां एक दोस्त के साथ मंडी हाउस में नाटक देखा। वहीं लगा कि एक्टिंग ही ऐसा काम है, जिसमें कुछ किया जा सकता है। एनएसडी में दाखिला ले लिया। थिएटर करने लगा। रंगकर्मियों के बीच रहकर एक्टिंग की बारीकियां सीखने लगा। पहले छोटे-छोटे रोल मिले। बाद में बड़े और लीड रोल भी किए। उसके बाद लगा कि अब मुंबई ट्राई करनी चाहिए। मैंने मुंबई का रुख कर लिया।’  

ऐसा नहीं है कि मुंबई बांहें फैलाकर नवाज का इंतजार कर रही थी। इम्तहान अभी बाकी थे। नवाज एक बार फिर फ्लैशबैक में चले जाते हैं, ‘मुंबई ने मुझे लगभग पांच साल तक इंतजार कराया। मैं टीवी प्रोडक्शन हाउसों में भटकता। अपना फोटो दिखाता। वह मुझे देखते और कहते, यार तुम हीरो मटीरियल नहीं हो। कोई रोल देने को तैयार ही नहीं था। उन्हें लगता ही नहीं था कि पांच फुट और छह इंच का एक ऐसा आदमी, जिसका रंग भी गोरा न हो, एक्टिंग भी कर सकता है। उन्हें भिखारी के रोल के लिए भी छह फुट के जवान की दरकार रहती थी।’

आखिरकार 1999 में आमिर खान ने ‘सरफरोश’ में उन्हें एक छोटा-सा रोल दिया। इतना छोटा कि नवाज को बताना पड़ा कि मैं कहां हूं। लेकिन यह भी ऐसी शुरुआत थी, जिसने उनके कॅरियर की नींव रखी। संघर्ष जारी था। उनके ही शब्दों में, ‘संघर्ष का अंत नजर नहीं आ रहा था। एक वक्त ऐसा भी आया था, जब एक वक्त खाना खाकर गुजारा करना पड़ता था। कई बार हिम्मत टूटी। सोचा सब छोड़कर बुढ़ाना वापस चला जाऊं, लेकिन फिर यह सोचकर कदम रोक लेता कि वापस जाऊंगा तो सब मजाक उड़ाएंगे कि गया था हीरो बनने, वापस आ गया। वैसे भी कोई और काम मुझे आता नहीं था। फिर इरादा कर लिया कि अब जीना है, तो मुंबई में और मरना है तो मुंबई में।’

‘सरफरोश’ के छोटे रोल का भले ही आम दर्शकों ने नोटिस न लिया हो, लेकिन डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने जरूर लिया। कश्यप ने नवाज को एक नाटक दिल्ली में भी देखा था। अनुराग ने अपनी फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ में थोड़ा बड़ा रोल दिया, लेकिन इतना बड़ा नहीं कि उनकी पहचान बने। हां, इतना जरूर हुआ कि नवाज को अपनी क्षमता दिखाने का मौका मिल गया। उसके बाद ‘फिराक’, ‘न्यूयॉर्क’ और ‘देव डी’ जैसी फिल्मों में काम मिला, लेकिन इन फिल्मों का खास दर्शक वर्ग है, इसलिए नवाज अभी उस लोकप्रियता से दूर थे, जो उन्हें आज मिली है। अब नवाज को काम तो मिलने लगा था, लेकिन वह टाइप्ड होने लगे थे। ‘न्यूयॉर्क’ के बाद उन्हें जितने भी रोल आॅफर हुए, वे सब गुंडे या आतंकवादी के थे। यहां उन्होंने जोखिम लेते हुए ऐसे रोल करने से इंकार कर दिया।

सफलता की शुरुआत

नवाज कहते हैं, ‘पीपली लाइव’ में मुझे थोड़ी अच्छी भूमिका मिली, तो सुजोय घोष की ‘कहानी’ में मेरे काम से लोगों को लगा कि पांव फुट और छह इंच का सांवला-सा यह आदमी वाकई एक्टिंग करता है।’ ‘गैंग्स आॅफ वासेपुर’, ‘आत्मा’ और ‘बांबे टाकीज’ ने नवाज को उन अदाकारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया, जो जब अदाकारी करते हैं, तो उनका खुद का वजूद गायब हो जाता है और उस चरित्र में ढल जाता है, जिसको वह निभा रहा होता है। नवाज कहते हैं, पिछले लगभग दस सालों में फिल्मों का ट्रेंड बदला है। नए निर्देशकों में रियलिस्टिक सिनेमा की ओर रुझान बढ़ा है, इसलिए चेहरे के बजाय एक्टिंग अहम हो गई है। यही वजह है कि मुझ जैसे चेहरे-मोहरे वाले एक्टरों को नए निर्देशक तवज्जो देने लगे हैं।’ शायद यही वजह है कि नवाज नए निर्देशकों के साथ ज्यादा सहज रहते हैं। वह कहते हैं, ‘नए और युवा निर्देशकों के साथ काम करना आसान रहता है, क्योंकि उनके साथ आप रोल के बारे में डिस्कस कर सकते हैं।’    

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी पहचान

‘पतंग’, ‘लायर डाइस’, ‘मानसून शूटआउट’, ‘देख इंडियन सर्कस’ जैसी जैसी फिल्मों में उनके किए काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा चुका है। 2012 में रिलीज हुई निर्देशक प्रशांत भार्गव की ‘पतंग’ को दुनिया के नामचीन फिल्म समीक्षर रोजर एबर्ट ने चार स्टार दिए। इस फिल्म को दुनियाभर में होने वाले फिल्म फेस्टिवलों में दिखाया गया। ‘देख इंडियन सर्कस’ को छह नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिल चुके हैं। उनकी नई फिल्म ‘लंच बॉक्स’ को कान फिल्म महोत्सव में स्पेशल आडियन्स च्वाइस अवॉर्ड मिल चुका है। ‘लंच बॉक्स’ जल्दी ही भारत में रिलीज होने वाली है। फिलहाल नवाज केतन मेहता की ‘माउंटेन मैन’ में व्यस्त हैं। 

रियल एक्टर

दरअसल, नवाज की खासियत ही यह है कि वह आफ स्क्रीन जितने वास्तविक नजर आते हैं, आन स्क्रीन भी उतने ही रियल लगते हैं। नवाजुद्दीन कितनी रियल एक्टिंग करते हैं, इसका अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है। जब इम्तियाज अली की फिल्म ‘देख इंडियन सर्कस’ के एक रोल के लिए नवाज तैयार होकर सैट पर आए, तो वहां मौजूद स्टाफ उन्हें पहचान ही नहीं पाया था। लंच के दौरान स्टाफ सदस्यों ने समझा कि कोई गांव वाला सैट पर आ गया है। स्टॉफ ने उन्हें खाना देने से भी मना कर दिया और सैट से बाहर जाने का हुक्म सुना दिया। हर अदाकार किसी ने किसी अदाकार से प्रभावित होता है, लेकिन नवाज के साथ ऐसा नहीं है। वह कहते हैं कि मेरी प्रेरणा मैं खुद हूं। हां, वह नसीरुद्दीन शाह के कायल हो गए, जब उन्होंने नसीर की ‘स्पर्श’ देखी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि वह उनसे इतने प्रभावित हो गए हों कि उनकी एक्टिंग में नसीर की झलक दिखाई दे। एक अर्से बाद नवाज के रूप में ऐसा एक्टर सामने आया है, जिसके के बारे में यह नहीं कहा जाता कि यह फलां एक्टर की नकल करता है।

बुद्धदेव को मिला उनका ‘अनवर’

बांग्ला फिल्मों के निर्देशक बुद्धदेब दासगुप्ता ‘अनवर का अजब किस्सा’ बना रहे हैं। उनकी समस्या थी कि फिल्म के लीड कैरेक्टर अनवर के लिए कोई एक्टर उन्हें नहीं भा रहा था। जब उन्होंने नवाज की ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ और ‘कहानी’ देखी, तो उनमें उन्हें अपना अनवर नजर आ गया। अनवर के लिए जिस तरह के चेहरे, मैनरिज्म की जरूरत थी, वह उन्हें नवाजुद्दीन में मिला।

गालियां और आइटम सॉन्ग

आजकल की फिल्मों में गालियों के बढ़ते चलन पर नवाज कहते हैं कि गालियां समाज का हिस्सा हैं और कहानी के मुताबिक गालियों की जरूरत है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। गालियों से ज्यादा खतरनाक आइटम सॉन्ग हैं। आइटम गर्ल की भाव-भंगिमाएं। गाने के द्विअर्थी बोल समाज में जहर घोल रहे हैं। जिस फिल्म में गालियां होती हैं, वह टीवी पर नहीं दिखाई जाती, लेकिन भद्दे आइटम सॉन्ग टीवी पर रात दिन दिखाए जाते हैं। इनका हमारी युवा पीढ़ी पर क्या असर होता है, यह किसी से छिपा नहीं है।

युवाओं को सलाह

नवाजुद्दीन सिद्दीकी के पास ऐसे युवा आ रहे हैं, जो चाहते हैं कि वह उन्हें फिल्मों में काम दिलाने में मदद करें। दरअसल, ऐसे युवा नवाज का आज देख रहे हैं, अतीत नहीं। ऐसे युवाओं को नवाज सलाह दे रहे हैं कि अगर एक्टिंग करनी है, तो पहले थियेटर करें। इसके बाद मुंबई का रुख करें। उनका कहना है कि एक्टिंग करना बहुत मुश्किल काम है। यहां शॉर्ट कट नहीं चलता। कड़ा संघर्ष ही मंजिल तक पहुंचाता है।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी हिंदी दैनिक जनवाणी में उपसंपादक के पद पर कार्यरत हैं. संपर्क: 09045582472

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