ये टीआरपी भी बहुत कमीनी चीज है… सोना मिले ना मिले, ये चैनलवाले तो चांदी काट रहे हैं…

Nadim S. Akhter :  ये टीआरपी भी बहुत कमीनी चीज है. दिल है कि मानता नहीं. अब देखिए ना, महाखजाने की महा-महाखोज अब भी जारी है. हिन्दी टीवी चैनलों पर. सारी छीछालेदर के बाद भी. सारे प्रवचनों के बाद भी कि हम तो इस ड्रामे को दिखाने के पक्ष में नहीं हैं और ना थे. अरे भाई, जब आप इस नौटंकी के पक्ष में नहीं हैं तो फिर काहे आधे-आधे घंटे का स्पेशल चलवा रहे हैं अपने चैनल पर. अब भी. यानी आपके खाने के दांत अलग हैं और दिखाने के अलग.

कल हिन्दी के तीन टीवी चैनलों पर साधु-सपना-खजाना और खुदाई का स्पेशल शो चल रहा था. इनमें से एक चैनल तो वह है, जो दूरदर्शन के बाद देश का सबसे पहला प्राइवेट हिन्दी न्यूज चैनल है लेकिन आज चैनल की दशा देखकर ये समझना मुश्किल है कि इतने वर्षों तक तपने-पकने के बाद भी ये चैनल खबर और तमाशा में फर्क कर पा रहा है या नहीं. या फिर टीआरपी मइया इतनी भूखी है कि उसकी क्षुधा को शांत करने के लिए ये अपना सर्वस्व अर्पण करने को तैयार है. अपनी प्रतिष्ठा और साख, सब कुछ.

साधु के सपने और महाखजाने की पोल खुलने के बाद हिन्दी के भी कई चैनलों ने इस मामले में अपना रुख ठंडा किया है लेकिन ये एक चैनल तो इतना महान निकला कि भविष्य की पड़ताल करने को रॉकेट की तरह नए-नए साइट्स-लोकेशंस पर जा गिरा. अभी ढोंगी साधु शोभन सरकार का पहला सपना ही सच नहीं हुआ है, 1000 टन सोना तो दूर, सोने का एक सिक्का भी वहां से नहीं निकला है लेकिन इस चैनल ने अपने तेज-तर्रार रिपोर्टर को साधु के दूसरे सपने की पड़ताल करने भेज दिया. वह भी तमाशा बनाकर. दरअसल शोभन ने एक और सपना देखा है और दावा किया है कि मौजूदा किले के अलावा एक अन्य जगह भी है जहां यहां से दोगुना यानी 2500 हजार टन सोना दबा पड़ा है. सो चैनल ने उस सोने और खजाने की पड़ताल को अपना पुनीत कर्तव्य समझ लिया. इसके लिए अपने उसी ज्ञानी रिपोर्टर को चुना जो अब तक किले में खजाने का तमाशा अच्छे से क्रिएट कर चुके थे. गॉगल्स लगाए और गन माइक हाथ में लेकर चैनल अपने रिपोर्टर को दोगुने यानी 2500 टन खजाने का ‘सच’ जानने के लिए चलता-फिरता-उलटता-घुलटता-पड़ताल करता दिखा रहा था.

यकीन मानिए किसी घटना या खबर या अफवाह या कानाफूसी की इससे घटिया कवरेज मैंने आज तक नहीं देखी है. सच्चाई तो दूर, सब कुछ पूरा का पूरा ड्रामा भी नहीं नहीं लग रहा था. स्क्रीन से सिर्फ और सिर्फ फूहड़ता टपक रही थी. रिपोर्टर वहां के एक मंदिर के गरीब पुजारी के सामने माइक तान देता है- –‘बाबा, आपको पता है यहां खजाना कहां है.’– लो कर लो बात. अरे बुड़बक, अगर पुजारी को पता होता तो अपनी गरीबी दूर ना कर लेते ये. इलाके के कई और लोग भी अपनी गरीबी से छुटकारा पा लेते. और वह कहां से बताएंगे कि खजाना कहां है, है भी या नहीं. जब एएसआई वाले और जीएसआई वाले नहीं बता पा रहे, तो बेचारे गरीब पुजारी की क्या औकात? जब पुजारी बाबा नहीं बता पाए तो वहां तमाशा देखने आए भीड़ से पूछना शुरु कर दिया रिपोर्टर ने. –‘बताओ, बताओ, कहां है खजाना, कछु मालूम है आप लोगन का’.

अब पब्लिक भी हंस रही है, बेचारे क्या बताएं इस सूट-बूट-गॉगल्सधारी रिपोर्टर साहब को. कह दिया- नहीं भइया, सुना ता है, पर कहां है नै मालूम. इतने में एक दारोगा जी वहां पहुंच गए. और कोई नहीं मिला तो गनमाइक उसके मुंह में भिड़ा दिया. पूछा-ऐ दारोगा जी, यहां खजाना है क्या? दारोगा जी बमक (गुस्सा) गए. बोले- ‘हम नहीं अधिकृत हैं टीवी पर बोलने के लिए–. लो जी, कोई नहीं बोल रहा कि यहां खजाना है, बस साधु की तरह आप को भी सपना आया और आ गए खजाना ढूंढने. वो भी नैशनल टेलिविजन पर. पब्लिक का खूब मनोरंजन किया उस चैनल के रिपोर्टर ने. जब कुछ नहीं मिला तो थक-हारकर एक शिव चबूतरा के पास चले गए और बताने लगे- पता चला है कि इसी चबूतरे के बीचोबीच कुछ फीट नीचे खजाना है. वहां मौजूद एक युवक से पूछा- बताओ. खजाना है क्या यहां. बेचारा बोला—‘सुने तो हैं नीचे दबा है, लेकिन किसी को मिला नहीं आजतक.”– लेकिन रिपोर्टर साहब कहां मानने वाले थे. वो तो इस ‘खोजी पत्रकारिता’ को और भी रहस्यमयी-भूत-प्रेती स्टाइल का बनाना चाहते थे. सो बता दिया कि यहां जो भी खजाना ढूंढने आता है, उसकी मौत हो जाती है. फिर वहां मौजूद एक नौजवान के मुंह में माइक घुसाकर इसकी तस्दीक भी करवा ली. वो बेचारा डरते-सहमते बोलता है— हां भइया, सुने हैं जो खजाना खोजने आता है, उसका कुछ पता नहीं चलता”–. रिपोर्टर विजयी मुस्कान काटता है. देखा, आज देश को हमने बता दिया, पड़ताल कर ही ली कि शोभन सरकार के दूसरे 2500 टनी खजाने का राज और रहस्य क्या है.

रिपोर्टर ने तो अपना काम कर दिया लेकिन चैनल का प्रोड्यूसर इतने से कहां मानने वाला था. उसने बाकायदा ग्राफिक्स बनवाकर देश को बताया कि साधु के सपने के मुताबिक दूसरे खजाने वाली अन्य जगहें, पहले खजाने वाली जगह से कहां-कहां और कितनी दूर है. वाह!! धन्य हो गया मैं. कृतार्थ हो गया इस खोजी पत्रकारिता को देखकर. अगर खजाना मिल गया तो उन महान रिपोर्टर और प्रोड्यूसर साहब को भी इसमें हिस्सा मिलना चाहिए. ये मेरी देश से विनम्र अपील है.

दूसरा चैनल भी कम महान नहीं था. अपने चीखते-चाखते वीओ में उसका प्रोड्यूसर ये बता रहा था कि खजाना नहीं मिला, तो इसके कितने खलनायक हैं? पहला खलनायक कौन, दूसरा कौन, तीसरा कौन. ये भी कोई आधे घंटे का स्पेशल शो था. पूरा ड्रामा. टीआरपी कूटने की कवायद. (पता नहीं मिलेगी भी या नहीं, जनता त्रस्त हो गई है ऐसे रचनाकारों से) कहने को तो चैनल जनता को ये बता रहा था कि इस मामले में कौन-कौन खलनायक हैं लेकिन प्रेजेंटेशन पूरा फिल्मी था. एक-दो दिन पहले तक जिस एएसआई-जीएसआई के कंधे पर बंदूक रखकर चैनल पीपली लाइव, पार्ट-2 का अहम किरदार निभा रहा था, आज उसी एएसआई-जीएसआई को भी उसने –खलनायकों में से -एक नंबर— दे दिया था. खलनायक नम्बर फलना. धड़ाक-धुडूम. क्या स्टाइल है. जैसे फिल्म चल रही हो- जी हां, मैं हूं खलनायक. (अब खलनायक कौन है, ये आप मत ही बताइए, इसका फैसला दर्शकों पर छोड़ दीजिए ना साहब.) खैर, इस चैनल पर आधे घंटे के इस तमाशे ने भी दर्शकों का खूब मनोरंजन किया.

अब तीसरे चैनल की बारी. ये साहब भी कमाल के थे. वीओ की आवाज ऐसी थी जैसे बोलते समय किसी ने संबंधित व्यक्ति की नाक कस के दबा दी हो. या यूं कहें कि नरेटी गगोट दी हो (ऐसी खबरों में ऐसे खतरनाक टाइप के वीओ जरूरी समझे जाने लगे हैं आजकल) खैर. इस चैनल ने भी आधे घंटे के शो में खूब तमाशा किया. ये तो इतना बेशर्म निकला कि पीपली लाइव, पार्ट-2 के रचाए ड्रामे को ऑन एयर तमाशा घोषित कर-कर के चलाता-दिखाता रहा. खूब मजे ले-लेकर. वैसे ये बताने में इन्होंने कोई-कसर नहीं छोड़ी कि वे भेड़चाल नहीं अपनाते. सो पीपली लाइव, पार्ट-2 का एक क्रिएटिव सा नाम रखा, –“पीपली लाइव रिटर्न्स”. जैसे अंग्रेजी फिल्मों में होता है- “The Mummy returns”. यहां भी जनता को “Educate-Aware’ करने के बहाने खूब नौटंकी हुई. इस चैनल वाले प्रोड्यूसर साहब भी क्रिएटिविटी से लबरेज थे, सो उन्होंने फिल्म Peepli Live के बहाने दर्शकों को ये बताने का बीड़ा उठाया कि उनके शो Peepli Live Returns के कौन-कौन से किरदार फिल्म Peepli Live के किस किरदार की जगह ले सकते हैं. मसलन वहां नत्था था तो यहां शोभन सरकार. वहां पॉलिटिशियन था तो यहां भी पॉलिटिशियन. वहां (Peepli live फिल्म में) भी मेला-रेला और यहां भी वैसा ही मेला-रेला और खेला.

वाह प्रोड्यूसर साहब. बहुत-बहुत शुक्रिया हम दर्शकों को बताने के लिए कि शोभन सरकार के महाखजाने की खोज और फिल्म पीपली लाइव में क्या-क्या समानताएं हैं. आप नहीं बताते तो हम निपट-गंवार-देहाती-बुड़बक-मैंगो पीपल कैसे जानते कि पीपली लाइव और महाखजाने की खोज, दोनों नौटंकी हैं. लेकिन एक बात बताइए. एक तो फिल्म थी यानी फिक्शन और दूसरा जो कुछ हो रहा है, वो है हकीकत. फिर भी समानताएं बता दीं आपने. वाह-वाह!! आप तो बड़े ज्ञानी-ध्यानी टाइप के आदमी मालूम पड़ते हैं. केबीसी यानी कौन बनेगा करोड़पति में क्यों नहीं जाते. 5-7 करोड़ तो जीत ही जाएंगे. वहां भी ऐसे ही कुछ सवाल पूछे जाते हैं और आप ऐसे सवालों के जवाब देने में मास्टर हैं. एक बार और धन्य हो गए हम सब दर्शक ‘पीपली लाइव’ और ‘पीपली लाइव रिटर्न्स’ का बह्मज्ञान आपके चैनल से पाकर. लगे रहो गुरुजी.

इन तीनों चैनलों ने महाखजाने की महाकवरेज पर जिन तीन अलग-अलग आइडियाज से प्रोग्राम बनाए, उन सबमें एक चीज कॉमन थी–टीआरपी की भूख–. यानी सभी ने अपने सेट-ग्राफिक्स में सोना-खजाना-साधु को चस्पा कर रखा था. सोना-खजाना तो भाई लोग ऐसे दिखा रहे हैं कि मानो खजाना निकल गया हो और वीडियो बनाकर उसका still चैनल पर परोस रहे हैं, जनहित में. यानी टीआरपी की खातिर चालू आहे नौटंकी, जारी है दर्शकों से धोखा. एक और बात. एक चैनल -व्यक्ति विशेष- में बता रहा था कि महाकथित महासाधु शोभन सरकार दाढ़ी नहीं रखते, क्लीन शेव रहते हैं, लेकिन एक दूसरा चैनल शोभन सरकार को दाढ़ीवाले बाबा के रूप में दिखा रहा है. यानी जितने मुंह, उतनी बातें. जितने टीवी के प्रोड्यूसर, उतनी अलग-अलग क्रिएटिविटी, उतनी कथाएं, उतने राज, उतने शोज. मतलब बाबा शोभन सरकार को जितना रहस्यमयी बताएंगे-दिखाएंगे, उतनी ही टीआरपी कूटेंगे.

इन हिन्दी न्यूज चैनलों का तमाशा देखकर एक ही बात मन में आ रही थी कि अगर कोई साधु कल ये कह दे कि फलां जगह रोज रात में रानी लक्ष्मीबाई की आत्मा आती है तो क्या वे अपनी टीम भेजकर जांच-पड़ताल शुरु कर देंगे. या फिर न्यूज मीटिंग में खबर बताने वाले को झिड़केंगे और इस स्टोरी आइडिया को रद्दी की टोकरी में डाल देंगे. फिर मान लीजिए कि सपना देखने वाला शख्स कथित रूप से कोई शोभन सरकार जैसा महान संत हो तब??? अगर कल वो कह दे कि 100000 यानी एक लाख टन सोना राष्ट्रपति भवन या ताजमहल के नीचे पड़ा है. जाओ खोदकर निकाल लो और अगर ना निकले तो मेरा और मेरे चेले का सिर कलम कर देना. तब..??!! तो क्या भावनाओं में बहकर संपादक जी और उनकी टीम राष्ट्रपति भवन-ताजमहल पहुंच जाएगी और लोगों से पूछेगी कि यहां सोना है, आपको पता है कि नहीं??? अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो फिर डौंडिया खेड़ा के खंडहर में मौजूदा नौटंकी को अंजाम देने का क्या मतलब है??? वो भी एक ऐसे सनकी साधु के कहने पर, जो आज तक ना मीडिया के सामने आया है और ना ही कैमरे पर कोई बात कही है. फर्ज कीजिए कि कल शोभन सरकार ये कह दे कि मैंने तो खजाने की बात ही कभी नहीं की थी. मैंने प्रधानमंत्री और दूसरे लोगों को कोई चिट्ठी भी नहीं लिखी थी. किसी ने फर्जी दस्तखत करके ये चिट्ठियां भेज दी होंगी. किसी की शरारत है. और मेरा ये जो तथाकथित चेला है-संत ओम जी महाराज, ये तो सनकी है. मेरी उससे ऐसी कोई बात नहीं हुई. मैंने उसे कभी कुछ नहीं कहा. आपने उसकी बात पर विश्वास क्यों किया. आप जानो. तब…???!!!

ऐसी स्थिति में साधु के सपने पर महाखजाने की महाखोज दिखा रहे संपादक लोग क्या बताएंगे कि वे देश को क्या जवाब देंगे?? एक संपादक टीवी पर कह रहे थे कि किसी खबर को दिखाने से पहले हम उसकी authenticity check करते हैं. तथ्यों की पड़ताल करते हैं. ये पत्रकारिता के BASICS है. फिर वो सम्पादक महोदय क्या ये बताने का कष्ट करेंगे कि शोभन सरकार के मामले में उन्होंने और उनकी टीम ने कितने facts खंगाले और किस आधार पर अपनी टीम-ओबी वैन को डौंडिया खेड़ा कवर करने के लिए भेजा? क्या इस बात का जवाब किसी के पास है कि ASI कई जगह खुदाई करती है, कितनी जगह आप अपने रिपोर्टर और ओबी वैन भेजते हैं?? नहीं भेजते हैं ना. फिर डौंडियाखेड़ा क्यों भेजा?? खजाने की बात से उत्साहित होकर ना. फिर खजाना होने की पुष्टि किसने की???!! ASI ने या फिर GSI ने. किसी ने नहीं ना. सिर्फ मेटल होने की बात कही जीएसआई ने. फिर उसकी बात को साधु के सपने से जोड़कर उस -मेटल- को सोना बताकर पूरे देश में अधेरगर्दी किसने मचाई???? आप ही ने ना.

तब आप आज नैतिकता की चादर ओढ़ने की कोशिश क्यों कर रहे हैं??!!!. ऑन एयर एएसआई के डायरेक्टर से पूछ रहे हैं कि आपने उस वक्त क्यों नहीं बताया कि वहां सोना नहीं है, जब हम वहां अपनी ओबी वैन लगा रहे थे. अरे, तो आपने ओबी लगाने से पहले उनसे क्यों नहीं पूछा कि वहां सोना है या नहीं. ये काम आपका है, मीडिया का है उनसे पूछने का, पता लगाने का. वो आकर आपको कब से बताने लगे? आप नहीं भी जाते तो वो खुदाई करते. अपने रूटीन में. और क्या अब आप लोग एएसआई के डायरेक्टर से पूछ के ओबी वैन लगाएंगे.?? कहां गया आप लोगों का news sense और आपकी नेतृत्व क्षमता??? खबर कहां है, कितनी बड़ी है, उसे कवर करना है या नहीं, ये सब आपके विवेकाधिकार और अधिकारक्षेत्र का मामला है. आप संपादक हैं. इसमें एएसआई के डायरेक्टर को खींचकर क्यो अपनी और पूरे पत्रकार बिरादरी की फजीहत करवा रहे हैं????!!!!

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. नदीम से संपर्क 085 05 843431 के जरिए किया जा सकता है.


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