ये नहीं चलेगा कि आप ऊलजलूल भी दिखाएं और फिर नैतिकता भी बघारें

Nadim S. Akhter : महाखजाने की महाकवरेज पर मेरी टिप्पणियों से कुछ पत्रकार मित्र आहत हो रहे हैं. उनसे निवेदन है कि कृपया दिल पर ना लें. सवाल तो उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जो सेमिनारों-सभाओं में तो मीडिया एथिक्स पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और न्यूज रूम में वही करते हैं, जो उनकी समझ से टीआरपी के लिए जरूरी होता है.

मेरा फंडा साफ है. अगर मैं किसी चैनल का मैनेजिंग एडिटर बन गया तो मेरे न्यूज सेंस के हिसाब से ही चैनल पर खबरें चलेंगी. अगर छूट होगी तो अपनी आदत के मुताबिक गंभीर-जनसरोकारी पत्रकारिता करूंगा. अगर छूट नहीं होगी तो चैनल-मैनेजमेंट की नीतियों के अनुसार ही काम करना होगा. और इसमें कोई बुराई नहीं.

नौकरी करनी है तो ये सब करना पड़ेगा लेकिन फिर मैं ये ज्ञान नहीं दूंगा कि हम तो महाकवरेज दिखाकर लोगों को एजुकेट कर रहे थे. या तो एसपी की तरह गणेश जी दूध नहीं पी रहे थे, ये सब अंधविश्वास है, ये वाली लाइन लूंगा या फिर ये कहूंगा कि गणेश जी दूध पी रहे थे, ऐसा लोग मानते रहे आज दिन भर. घटना को सिर्फ खबर के रूप में रख दूंगा.

या फिर अगर घुटने ही टेकना है तो ये लाइन लेनी पड़ेगी कि आज चैत्र अमावस्या के दिन भगवान गणेश ने पूरे भारत में श्रद्धालुओं के हाथों दूध पिया. तीन-चार पंडितों को स्टूडियो में बुलाकर ये साबित कर दूंगा कि वाकई में आज भगवान गणेश ने दूध पिया है.

कहने का मतलब ये है कि जो लाइन लीजिए, डंके की चोट पर लीजिए. लेकिन ये नहीं चलेगा कि आप ऊलजलूल भी दिखाएं और फिर नैतिकता भी बघारें. आप सीधे कहिए कि टीआरपी की इस दौड़ में वह सब भी करना पड़ता है, जिसके फेवर में व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं हूं. जिस दिन छूट मिलेगी, खुद का चैनल होगा, किसी मालिक-मैनेजमेंट-बाजार का दबाव नहीं होगा, उस दिन ऐसी खबरें नहीं दिखाऊंगा.

एक बात और. घुटने के बल झुकने के लिए कहा जाए तो लेट मत जाइए. अगर कोई ऐसी खबर चलानी भी पड़े तो बैलेंस बनाकर ढंग से दिखाया जा सकता है. उसके लिए बिछ जाने का कोई मतलब नहीं. मुझे याद है कि जब कुछ वर्षों पहले जी न्यूज पर प्रिंस के गड्ढे में गिरने वाली खबर को उठाया गया था, तो देर-सबरे सब चैनलों को उस खबर पर आना पड़ा था. जी न्यूज ने उस खबर को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबर बना दिया था.

नदीम एस. अख्तर
नदीम एस. अख्तर
झक मारकर बाकी चैनलों को भी अपने ओबी वैन घटना स्थल पर भेजने पड़े थे. अंग्रेजी चैनलों को भी. लेकिन एक हिन्दी का चैनल था, जो काफी देर बाद इस खबर पर आया, यानी इस खबर का संज्ञान लिया. वह चैनल था एनडीटीवी इंडिया. तो मैं एनडीटीवी इंडिया वाले अप्रोच की बात कर रहा हूं. यानी जब तक टाला जा सके, ऐसी खबरों को टाला जाए.

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. नदीम से संपर्क 085 05 843431 के जरिए किया जा सकता है.


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