ये फुटेला प्रभाष जोशी पर कीचड़ उछाल चुका है, यशवंत क्या चीज हैं

भडस पर यशवंत भाई द्वारा लिखित एक पोस्‍ट को देखा जिसमें उन्‍होंने पत्रकार जगमोहन फुटेला के गरियाने एवं खुद के कथित भीख मांगने के आरोपों पर विस्‍तार से अपने दर्द को बयान किया। इस पोस्‍ट के कुछ देर बाद दूसरी पोस्‍ट आई जिसमें कहा गया कि जगमोहन फुटेला ने अपने सारे लेख भड़ास से हटाने की बात यशवंत भाई से कही। यह भी पता चला कि फुटेला जी अपनी साइट को पॉपुलर करने के लिए भड़ास पर बेवजह अटैक कर रहे हैं और यशवंत व भड़ास का इस तरह यूज कर रहे हैं जैसे वे खुद इनके माई-बाप हों।

मैं अपनी इस पोस्‍ट के माध्‍यम से न तो यशवंत जी का पक्ष ले रहा हूं और ना ही जगमोहन फुटेला का। लेकिन कुछ ऐसी सच्‍चाइयां हैं जिनके अब बाहर आने का वक्‍त आ गया है। सबसे पहले तो मैं यशवंत भाई के जज्बे को सलाम करता हूं जिन्‍होंने हिंदुस्‍तान की पत्रकारिता के घर में चल रही पोलमपोल को सार्वजनिक किया और कर रहे हैं। पत्रकारों के दुख दर्द, उनके सुख सभी को भड़ास के माध्‍यम से खुलकर सार्वजनिक किया। हर पत्रकार से यह कहा कि आपके शब्‍द यदि कहीं जगह नहीं पा सकते तो भड़ास आपके लिए ही है। नतीजा यह निकला कि ढेरों पत्रकारों ने अपने काम में हो रहे शोषण, पत्रकारों के लिए बने आयोग के मुताबिक वेतन न मिलने, पीएफ न मिलने या पीएफ चट कर जाने, ग्रेच्‍युएटी न मिलने, मीडिया मालिकों द्धारा शोषण किए जाने, अपने सीनियरों द्धारा अपमानित किए जाने, राज्‍य सरकारों एवं अधिकारियों और पुलिस द्वारा सताए जाने की बातों को भड़ास पर खुलकर लिखा और उनके सुखद नतीजे निकले।

इन बातों के अलावा ऑडियो एवं वीडियो के माध्‍यम से भी भड़ास ने कई ऐसे मसले सार्वजनिक किए जो उम्‍दा खोजी पत्रकारिता के अवॉर्ड योग्‍य हैं। असल में भड़ास दर्द झेल रहे पत्रकारों का अपना घर है जहां कोई भी कभी भी आ सकता है। इसे पत्रकारों का मैके (पीहर) कहा जा सकता है। अनेक पत्रकारों के सीने में जो दर्द है उसे लेकर वे पत्रकार हमेशा घूमते रहे लेकिन कहीं व्‍यक्‍त ही न कर सके कि नौकरी का क्‍या होगा, नौकरी चली जाएगी यदि जुबान खोली तो, भले अपने को लोकतंत्र का चौथा खंभा गाते फिरते हों ये मीडियावाले। खैर!

अब बात यशवंत भाई की पोस्‍ट और जगमोहन फुटेला जी की। यशवंत भाई ने जो जबाव दिया है, वह बेहद साफ और बिना लाग लपेट के है। यशवंत भाई से मैं आज तक कभी साक्षात नहीं मिला हूं। लेकिन उनकी भाषा इस तरह की होती है कि जैसे… जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ। जगमोहन जी ने ''भड़ासिए ने भीख मांगनी बंद कर दी'' सहित जो जो लिखा उन्‍हें यहां रिपीट करना उचित नहीं समझता लेकिन फुटेला जी का लगता है कि चरित्र ही ऐसा है कि जो भी मिले उस पर कीचड़ उछालते चलो। मानसिकता इसलिए ऐसी है कि शायद पैदाइश ही ठीक नहीं रही है।

जगमोहन जी ने यशवंत जी पर ही कीचड़ नहीं उछाला बल्कि ये सज्‍जन स्‍वर्गीय पत्रकार प्रभाष जोशी जी पर भी कीचड़ उछाल चुके हैं। उनके चरित्रहनन में इन्‍होंने कोई कमी नहीं छोड़ी। फुटेला जी को याद नहीं आ रहा हो तो बता देता हूं कि वर्ष 1988 में राजस्‍थान के एक पत्रकार ने कोटा में अपने घर के आंगन में नीम के पेड़ पर लटककर आत्‍महत्‍या कर ली थी। आत्‍महत्‍या के समय वह पत्रकार राजस्‍थान पत्रिका का कर्मी नहीं था या था, यह बहस रही, एवं कहा जाता है कि ड्रग्‍स की आदत की वजह से यह आत्‍महत्‍या हुई थी। यह खबर जनसत्ता दिल्‍ली के पहले पेज पर बॉटम में छपी।

इसके बाद जगमोहन फुटेला ने एक लंबा चौड़ा पत्र राजस्‍थान पत्रिका के प्रबंधन को लिखा जिसमें जनसत्ता में छपी उस खबर को एक मीडिया हाउस द्वारा दूसरे मीडिया हाउस के लिए गलत परंपरा बताया गया। इन सज्‍जन ने अपने पत्र में लिखा कि मैं आपको यह पत्र भेज रहा हूं और आप जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी के खिलाफ सामग्री छापकर उनके होश उड़ा सकते हैं। लेकिन मेरा नाम गुप्‍त रखिए। किसी को सार्वजनिक न करें यह पत्र जगमोहन फुटेला ने लिखा है। उन दिनों संभवत: फुटेला जी जनसत्ता चंडीगढ़ संस्‍करण में नौकरी कर रहे थे या निकाले जा चुके थे।  

इन्‍होंने अपने पत्र में प्रभाष जोशी जी के लिए लिखा था कि पंडित जी हिंदुओं में हज नहीं होता, लेकिन कभी हज पर जाएं तो अपने केबिन से दस कदम दूर बैठी नीलिमा से अपने घिनौने कारनामे पूछकर जाएं। इस पूरे पत्र में प्रभाष जी के चरित्र की ऐसी तैसी की गई। इन्‍होंने अपनी महानता में लिखा कि पंत नगर यूनिवर्सिटी में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्‍या की साजिश रची गई थी और उसका खुलासा मैंने किया था लेकिन प्रभाष जी मुझे कहा कि कि मुझे रिपोर्टिंग करनी नहीं आती। फुटेला जी यदि आपके पास उस पत्र की कॉपी हो तो आप सही सही छापना और वह आपके पास न हो तो मैं मार्च में जयपुर जाऊंगा तब उसकी जिरोक्‍स यशवंत भाई को भेजूंगा, ताकि दूसरों पर कीचड़ उछालने की आपकी आदत हर कोई जान सके। हालांकि यह बता दूं

कमल शर्मा
कमल शर्मा
कि राजस्‍थान पत्रिका ने अपनी गरिमा के अनुरूप जगमोहन फुटेला के उस पत्र को नहीं छापा था। 

लेखक कमल शर्मा, लेखक पिछले 22 वर्ष से पत्रकारिता में हैं. इन दिनों मुंबई में एक मीडिया कंपनी में पदस्थ हैं.


…पूरे प्रकरण से अगर आप परिचित नहीं हैं तो नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ समझ सकते हैं…

भड़ास के खिलाफ जगमोहन फुटेला की भड़ास

फुटेला जी, आप 'गरियाना' जारी रखें, और मैं 'भीख' मांगना

फुटेला को सीरियस और सींसियर मानता था, पर बड़ा छिछोरा निकला

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