ये रामनाथ गोयनका एवार्ड नहीं, ठग्गूमल लड्डू पुरस्कार है : पढ़िए, कैसे ठगे-छले जा चुके हैं पत्रकार प्रशांत और मनोज

रामनाथ गोयनका फाउंडेशन की तरफ से 12 जुलाई शाम चार बजकर बारह मिनट पर अंबरीन खान ने पत्रकार प्रशांत कोरटकर और पत्रकार मनोज जासवाल को एक-एक कर फोन किया और उन्हें सूचित किया कि.. ''आप दोनों को रामनाथ गोयनका एवार्ड के लिए चुन लिया गया है. यह चयन रीजनल कैटगरी में किया गया है. महाराष्ट्र के वाशिम जिले की एक सोशल न्यूज के लिए आप दोनों को चयन किया गया है. आप दोनों को आज या कल में इस आशय का लेटर मिल जाएगा. आप लोग 23 जुलाई को एवार्ड लेने सपरिवार दिल्ली आइएगा.''

आखिर कौन पत्रकार उपरोक्त सूचना पर खुश न होगा. प्रशांत और मनोज को एक पल के लिए लगा कि उनका पत्रकारिता में आने का जो मकसद था, वो पूरा हो गया. उन्हें उनकी पत्रकारिता के लिए रामनाथ गोयनका एवार्ड मिलने जा रहा है, जिसकी कल्पना उन्होंने सपने में भी न की थी. बड़े बड़े पत्रकारों को मिलने वाला यह एवार्ड अब उन्हें खुद मिलेगा, यह सोच सोच कर प्रशांत और मनोज रोमांचित, उत्तेजित थे. पर उन बेचारों को यह बिलकुल नहीं पता था कि इंडियन एक्सप्रेस अब पहले वाला इंडियन एक्सप्रेस नहीं रहा बल्कि यह घनघोर दलाल एक्सप्रेस में तब्दील हो चुका है. रामनाथ गोयनका एवार्ड अब पहले वाला रामनाथ गोयनाक एवार्ड नहीं रहा, बल्कि यह ठग्गूमल लड्डू एवार्ड बन चुका है जिसे अब कोई भी जुगाड़ से हासिल कर सकता है और कोई भी जुगाड़ से किसी को एवार्ड दिए जाने की घोषणा को कैंसल करा सकता है.

प्रशांत और मनोज के साथ यही हुआ. अगले ही दिन फिर से इनके पास रामनाथ गोयनका फाउंडेशन से फोन आ गया कि… ''हमें माफ़ करें, आपका अवार्ड जूरी ने डिसक्वालिफाई कर दिया है…'' प्रशांत और मनोज पूछते रह गए कि आखिर चौबीस घंटे में ऐसा क्या कारण सामने आ गया कि जिस एवार्ड के लिए पहले चयनित बताया गया, उसी के लिए बाद में डिसक्वालिफाई कर दिया गया? पर फाउंडेशन के पास कोई जेनुइन कारण होता तो वे बता भी पाते, सो चुप्पी मार गए.

ये दोनों पत्रकार भड़ास4मीडिया डाट काम bhadas4media.com से बातचीत में सवाल पूछते हैं–  ''एक दिन पहले ही अवार्ड घोषित कर दिल्ली आने की बात करने वाले रामनाथ गोयनका फाउंडेशन को ऐसा क्या हुआ कि एक ही दिन में अवार्ड कैंसल करना पड़ा. गोयनका अवार्ड कोई दो दिन में तय होने वाला अवार्ड नहीं है जो पल में बदल जाये… इसको तय करने वाली जूरी में देश के नामचीन लोग होते हैं… ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रामनाथ फाउंडेशन वाले छोटे शहर के पत्रकार से इस तरह का मजाक कर सकते हैं?''

प्रशांत और मनोज के परिचित भी जानना चाहते हैं कि एक बार जूरी ने इस अवार्ड को फाइनल कर प्रशांत और मनोज को फ़ोन करा दिया तो ऐसा क्या हुआ जो अवार्ड कंसल करना पड़ा? यह पुरस्कार किसी चैनल को नहीं बल्कि पत्रकार को दिया जाता है.. फिर अगर प्रशांत और मनोज ने भले ही आईबीएन छोड़ दिया हो, फिर भी जिस खबर को अवार्ड के लिए जूरी ने चुना था, वो तो प्रशांत और मनोज ने ही की थी.. उल्लेखनीय है कि प्रशांत कोरटकर नेटवर्क18 ग्रुप के मराठी चैनल 'आईबीएन लोकमत' के ब्यूरो चीफ थे और मनोज जैसवाल इसी चैनल में वाशिम के स्ट्रिंगर थे. 4 महीने पहले ही प्रशांत ने आईबीएन लोकमत छोड़ कर एक अन्य न्यूज चैनल में ज्वाइन कर लिया.

एवार्ड देने फिर कैंसल करने के पीछे जो राजनीति पता चली है, वो और दिलचस्प है. अवार्ड मिलने की खबर आईबीएन के मुंबई ऑफिस गई. उस वक़्त आईबीएन लोकमत के संपादक निखिल वागले दक्षिण अफ्रीका गए थे. दूसरे दिन जब वागले मुंबई पहुंचे तो उन्हें इस अवार्ड के बारे में पता चला फिर उन्होंने बड़े ही गुपचुप तरीके से काम शुरू किया. असल में पिछले दो वर्षों से रामनाथ गोयनका अवार्ड आईबीएन लोकमत के रिपोर्टरों को मिला. इस साल आईबीएन लोकमत से निकले व्यक्ति को यह अवार्ड मिले, यह निखिल वागले को पसंद नहीं आया. उनकी कोशिश है कि उनके ही चैनल में कार्यरत रिपोर्टर को यह एवार्ड मिले. सो, उन्होंने लाबिंग शुरू कर दी. अंतत: वागले की लाबिंग सफल हो गई. दिल्ली से रामनाथ गोयनका फाउंडेशन से प्रशांत को दोबारा फ़ोन आया और कहा गया कि …..हमें माफ़ करें, आपका अवार्ड जूरी ने डिसक्वालिफाई कर दिया है..

प्रशांत और मनोज सोच रहे हैं कि निखिल वागले ने ऐसा क्यों किया? क्या उन्हें इतनी घटिया सोच रखनी चाहिए थी? और, ये रामनाथ गोयनका फाउंडेशन को क्या हो गया जो किसी के भी दबाव में आ जाता है और अपने निर्णय को चौबीस घंटे के भीतर ही पलट देता है… रामनाथ गोयनका अवार्ड को देश के राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री के हाथों दिलाया जाता है.. रामनाथ गोयनका जैसे महान पत्रकार के नाम पर दिए जाने वाले इस पुरस्कार की अहमियत इतनी कम हो गई है कि पुरस्कार घोषित कर उसे वापस ले लिया जाता है… ??

रामनाथ गोयनका एवार्ड दिए जाने और फिर न दिए जाने की घोषणाओं से इन दोनों पत्रकारों को काफी मानसिक पीड़ा हुई है. इन दोनों ने इसी बहाने पत्रकारिता का असली सच जान लिया है. वो एक गाना भी है न… जुस्तजू जिसकी की, उसको तो न पाया हमने, इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने… पर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यह कहानी न तो किसी अखबार में छपेगी, और न किसी चैनल पर चलेगी. प्रशांत और मनोज के पास रामनाथ गोयनका फाउंडेशन की ओर से किये गए टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग मौजूद है… पर प्रशांत और मनोज, दोनों को उम्मीद है कि उनके साथ न्याय नहीं होगा, उन्हें पुरस्कार दिए जाने और न दिए जाने का असली सच कभी जानने को न मिलेगा और इस कारण उन्हें हुई मानसिक पीड़ा का मुआवजा कभी न मिलेगा.. क्योंकि यह इंडियन मीडिया है जो कारपोरेट के हाथों बिकी हुई है, जो लाबिस्टों के लिए दबाव में झुकी हुई है, जो सत्ता व पार्टियों के असर में पीत पत्रकारिता में तब्दील हो चुकी है…

प्रशांत और मनोज दोनों ने इस घटना के बाद रामनाथ फाउंडेशन और शेखर गुप्ता से संपर्क साधा, सच्चाई जानने का प्रयास किया लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया, इसलिए क्योंकि चोरों की दाढ़ी में तिनका तो होता ही है और सच्चाई का सामना करने के मामले में चोर बड़े कमजोर होते हैं .. आइए आप और हम, प्रशांत व मनोज की तरफ से एक बार रामनाथ गोयनका फाउंडेशन, दूसरी बार इंडियन एक्सप्रेस और तीसरी बार शेखर गुप्ता के लिए थू थू थू कर देते हैं, ताकि दिल दिमाग की भड़ास तनाव गुस्सा अवसाद निकल जाए… एक बार फिर… थू थू थू….

रामनाथ गोयनका फाउंडेशन के सताए पत्रकार प्रशांत से संपर्क आप pknagpur@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.

जय हो

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया
yashwant@bhadas4media.com

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