ये लोकतंत्र की लाइफलाइन है, इसे काटोगे तो पछताओगे

सुबह से रात तक देश जिनके दम पर गुलजार है, वे नेता नहीं सिर्फ कामगार हैं. वे मेहनत से जी नहीं चुराते. ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों में रहने वालों की सुरक्षा में तैनात रहते हैं. सर्दी, गर्मी, बरसात में लाठी ठकठकाते हुए रातभर पहरा देते हैं और महीने के पहले हफ्ते में अपने गांव हजार-पन्द्रह सौ का मनीआर्डर भेजकर खुश हो लेते हैं कि अपना परिवार पाल रहे हैं. वे वाचमैन हैं. मशक्कत का ठाठ उनकी शिराओं में बहता है. वे दिन-रात टैक्सी चलाते हैं. लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाते हैं. शहरों की गति को अपने परिश्रम से कायम रखते हैं. सुलभ शौचालयों में फारिग हो लेते हैं. टैक्सी-आटो में नींद निकाल लेते हैं. 
 
वे भेलपूरी बेचते हैं, सींगदाना खिलाते हैं, समोसे पकाते हैं, सब्जी के ठेले लगाते हैं, कार, साइकिल, आटो के पंक्चर ठीक करते हैं. लोगों के घरों में कूरियर पहुंचाते हैं. चाय बनाते हैं, बडे लोगों की कारें चलाते हैं, कारें ठीक करते हैं. स्कूली बच्चों को उनके घर-स्कूल पहुंचाते हैं. पूरा देश उनका मुल्क है. वे गांवों से निकलकर देश के हर शहर में श्रम कर रहे हैं. वे सिर्फ कामगार हैं. राजनीति से उनका कोई लेनादेना नहीं है. वे अपने परिवार का पेट पालने के लिए शहरों में रोजगार तलाशने जाते हैं. शहरों में एक कमरे में आठ-आठ, दस-दस के हिसाब से अपनी जिंदगी बसर करते हैं. जिंदगी के हाशिए पर रहने के बावजूद वे शहरों की खुशहाली को संभव किए हुए हैं.
 
देश के हर शहर में उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, उत्तरांचल, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों के मेहनतकश बसते हैं. हर शहर में वे तमाम परप्रांतीय जीवन बिताते हैं, जिनका पसीना और श्रम शहरों को ग्लैमर और वैभव सौंपता है. 
 
देश एक बार फिर लोकसभा चुनाव की ओर बढ रहा है. मध्य प्रदेश में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. सियासत शुरू हो गयी है. हाल में मध्य प्रदेश के दतिया में सिंध नदी के पुल पर आस्थावान लोगों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. सैकड़ों बेकसूर, निर्दोष, मेहनतकश व आस्थावान महिलाओं, पुरुष व बच्चों की जानें चली गईं, जिस पर देश के राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान सियासत करने लगे. सियासत वोटों के लिए इन पर जुल्म भी करती है और दिखावटी मरहम भी लगाती है. 
 
सवाल है कि मुल्क और प्रांतीय हुकूमत आखिर कब तक इनका सियासी दमन करती रहेगी. राजनीतिक लठैत इन्हें मारपीट कर आखिर क्या संदेश देना चा​हते हैं. अब समय आ गया है कि राजनीतिज्ञों को यह समझ लेना चाहिए कि देश और प्रांत के शहर जिनके दम पर गुलजार हैं, वे नेता नहीं सिर्फ कामगार हैं. ये देश की लाइफलाइन है. इसे काटोगे तो पछताओगे, और फिर वोट लेने कहां जाओगे.
 
अतुल कुशवाह नई दुनिया मीडिया, जबलपुर, मध्य प्रदेश से जुड़े हैं. इनसे 07489007662 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

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