पत्रकारिता दिवस नाम का ये छलावा अब 187 साल का हो गया है। ये तो शायद कोई नहीं कह सकता कि ये दिवस देश के सबसे पहले हिंदी अख़बार के शुरू होने की ख़ुशी में मनाया जाता है या चंद महीने में ही उसके बंद होने के ग़म में? लेकिन इतना तो तय है कि आज के दौर में जब चारों तरफ नज़र डालते हैं तो पत्रकारिता कहीं नज़र ना आने के सबब इसके नाम पर दिवस मनाते हुए यक़ीनन ज़ोर सा पड़ता है।
अपने गिरेबान में झांक कर देखने पर इसके लिए सबसे ज़्यादा दोषी भी सामने आ जाता है! लेकिन चूंकि हम लोग शब्दों के जादूगर होने का दावा करते हैं और उसी के लच्छों से अच्छे अच्छों को ढेर करने की सोच रखना हमारी फितरत भी। हमारे शहर ग़ाजियाबाद में भी इस दिवस को मनाने के लिए कई पत्रकार जमा हुए कुछ ने भाषण दिये कुछ ने सुने। किसी ने ताली बजाई तो किसी ने किसी दूसरे को कोसा। किसी ने कहा कि ओबामा कि शर्ट पर लिपिस्टिक के निशान होने से क्या फर्क पड़ता है तो किसी ने दुहाई दी कि पत्रकारिता का स्तर गिर रहा है। लेकिन इस सबसे पहले इस समारोह के मुख्य अतिथि पर नज़र डाली तो लगा कि इससे बड़ा मज़ाक़ और क्या होगा कि मीडिया के हाथों अपनी पोतियों की उम्र की लड़कियों के साथ रंगरेलियां मनाने का स्टिंग सामने आने के बाद जिस राज्यपाल को अपना पद गंवाना पड़ गया था, वही नेता जी यहां पर लोगों को नैतिकता का पाठ पढा़ रहे थे।
इतना ही नहीं ग़ाज़ियाबाद और एनसीआर के कई बड़े पत्रकार जिन नेता जी से नैतिकता का पाठ ले रहे थे उन्हीं की एक बेचारी अवैध संतान पिछले दिनों अदालत में अपने हक़ और सम्मान की लड़ाई महज़ इसलिए लड़ रही थी कि उनका पिता उसको अपना बेटा तो मान ले। और दिलचस्प बात ये कि नेता जी नैतिकात का पाठ पढ़ाते रहे और लोग तोते की तरह पढ़ते भी रहे थे। ख़ैर अपना अपना टेस्ट है। लेकिन बात वहीं से, कि जिन साहेब ने सवाल उठाया कि ओबामा की शर्ट पर लिपिस्टिक के निशान से क्या फर्क पड़ता है? शायद वो भूल गये थे कि किसी भी देश के राष्ट्रपति के चरित्र से उसकी जनता का सीधा सरोकार होता है, और ओबामा उसी देश के मुखिया हैं जो पूरी दुनिया की ठेकेदारी करने की जुगत में रहता है, और जहां बिल क्लिंटन और मोनिका लेवंस्की की यांदे अभी भी पूरी दुनियां के ज़हन में ज़िंदा हैं। साथ ही एक सज्जन जो कुछ महीने पहले तक उसी टीम का हिस्सा थे जो कोल घोटाले के नाम पर नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपए की फिरौती मांगने के आरोप में कई माह तक जेल की सैर कर आई है।
जी हां ये वही सज्जन थे जिन्होंने इस 100 करोड़ की मांग करने वाली अपनी टीम और अपने मालिक की टीवी स्क्रीन पर जमकर वकालत भी की थी। ये अलग बात है कि कुछ दिनों बाद उनको इससे अच्छा ऑफर मिला और उन्होंने डूबते जहाज से कूद कर आगे की मिसाल को पूरा किया। अब इसे क्या कहें कि जनता की मेमोरी शार्ट है, वो बातें जल्द ही भूल जाती है नहीं तो पत्रकारिता दिवस के नाम पर जमा होने वाले सज्जन ये कभी ये ना बताते कि पत्रकारिता का स्तर गिर रहा है। क्योंकि इनमें कई का धंधा ही लाइजनिंग और पालिटिकल ब्रोकरशिप है। पेड न्यूज़ के नाम पर भाषण देने वाले भला किस मुंह से अपनी बात कह रहे थे, जबकि कभी टूटी साइकिल को तरसते इन लोगों में कई लोग आज आलीशान शीशे के घरों और लग्ज़री गाडियों में घूमते हैं। और सच बात ये है कि इनकी आन, बान और शान महज़ इनकी मेहनत और तनख्वाह के दम पर है, ये बात कहने की हिम्मत ये ख़ुद भी नहीं जुटा सकते।
लेखक आज़ाद ख़ालिद सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ समेत कई राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों पर महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं।





