ये हैं दुनिया के सात महापाप और सात महापुण्य

दुनिया के सात आश्चर्य की तर्ज पर सात महापाप भी एनाउंस कर दिया गया है. ये महापाप पश्चिमी दुनिया के दार्शनिकों ने अपने हिसाब से तय किया है. सात महापापों को अंग्रेज़ी में सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) भी कहा जाता है. ये सात इस प्रकार हैं:

1- लस्ट (Lust) : यानी लालसा, कामुकता, कामवासना (Intense or unrestrained sexual craving)- ये मनुष्य को दंडनीय अपराध की ओर ले जाते हैं और इनसे समाज में कई प्रकार की बुराईयां फैलती हैं. विशेषण में इसे लस्टफुल (lustful) कहते हैं

2- ग्लूटनी (Gluttony) : यानी पेटूपन. इसे भी सात महापापों में रखा गया है. जी हां दुनिया भर में तेज़ी से फैलने वाले मोटापे को देखें तो यह सही लगता है कि पेटूपन बुरी चीज़ हैं और हर ज़माने में पेटूपन की निंदा हुई है और इसका मज़ाक़ उड़ाया गया है. ठूंस कर खाने को महापाप में इस लिए रखा गया है कि एक तो इसमें अधिक खाने की लालसा है और दूसरे यह ज़रूरतमंदों के खाने में हस्तक्षेप का कारण है. मध्यकाल में लोगों ने इसे विस्तार से देखा और इसके लक्षण में छह बातें बताईं जिनसे पेटूपन साबित होता है. वह इस प्रकार हैं… eating too soon, eating too eagerly, eating too expensively, eating too daintily, eating too much, eating too fervently

3- ग्रीड (Greed) : यानी लालच, लोभ. यह भी लस्ट और ग्लूटनी की तरह है और इसमें अत्यधिक प्रलोभन होता है. चर्च ने इसे सात महापाप की सूची में अलग से इस लिए रखा है कि इसमें धन-दौलत का लालच शामिल है (An excessive desire to acquire or possess more than what one needs or deserves, especially with respect to material wealth)

4- स्लौथ (Sloth) : यानी आलस्य, सुस्ती और काहिली (Aversion to work or exertion; laziness; indolence). पहले स्लौथ का अर्थ होता था उदास रहना, ख़ुशी न मनाना. इसे महापाप में इसलिए रखा गया था कि इसका मतलब था ख़ुदा की दी हुई चीज़ से परहेज़ करना. इस अर्थ का पर्याय आज melancholy, apathy, depression, और joylessness होगा. बाद में इसे इसलिए पाप में शामिल रखा गया क्योंकि इसकी वजह से आदमी अपनी योग्यता और क्षमता का प्रयोग नहीं करता है.

5- रैथ (Wrath) : ग़ुस्सा, क्रोध, आक्रोश. इसे नफ़रत और ग़ुस्से का मिला जुला रूप कहा जा सकता है जिसमें आकर कोई कुछ भी कर जाता है. ये सात महापाप में अकेला ऐसा पाप है जिसमें आपका अपना स्वार्थ शामिल न हो (Forceful, often vindictive anger)

6- एनवी (Envy) : यानी ईर्ष्या, डाह, जलन, हसद. यह ग्रीड यानी लालच से इस अर्थ में अलग है कि ग्रीड में धन-दौलत ही शामिल है जबकि यह उसका व्यापक रूप है. यह महापाप इसलिए है कि कोई गुण किसी में देख कर उसे अपने में चाहना और दूसरे की अच्छी चीज़ को सहन न कर पाना.

7- प्राइड (Pride) : यानी घमंड, अहंकार, अभिमान को सातों माहापाप में सबसे बुरा पाप समझा जाता है. किसी भी धर्म में इसकी कठोर निंदा और भर्त्सना की गई है. इसे सारे पाप की जड़ समझा जाता है क्योंकि सारे पाप इसी के पेट से निकलते हैं. इसमें ख़ुद को सबसे महान समझना और ख़ुद से अत्यधिक प्रेम शामिल है.

पुराने ज़माने में ईसाई धर्म में इन सबको घोर पाप की सूची में रखा गया था क्योंकि इनकी वजह से मनुष्य सदा के लिए दोषी ठहरा दिया जाता था और फिर बिना कंफ़ेशन के मुक्ति का कोई चारा नहीं था. अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार क्रिस्टोफ़र मारलो ने अपने नाटक डॉ. फ़ॉस्टस में इन सारे पापों का व्यक्तियों के रूप में चित्रण किया है. उनके नाटक में यह सारे महापाप pride, greed, envy, wrath, gluttony, sloth, lust के क्रम में आते हैं.

सात महापाप की ही तरह दुनिया के सात महापुण्य भी बना दिए गए हैं, जो इस प्रकार हैं.

1- Chastity पाकीज़गी, विशुद्धता

2- Temperance आत्म संयम, परहेज़,

3- Charity यानी दान, उदारता,

4- Diligence यानी परिश्रमी,

5- Forgiveness यानी क्षमा, माफ़ी

6- Kindness यानी रहम, दया,

7- Humility विनम्रता, दीनता, विनय

उपरोक्त सात महापुण्य को ध्यान से देखें तो वे सात महापाप के ठीक विलोम हैं. या यूं कहें कि सात महापुण्य का जो विलोम है, वो सात महापाप हैं.

(इनपुट – बीबीसी)

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