यौन शोषण रोकने में कितना कारगर है विशाखा दिशानिर्देश

तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल का मसला अब लगभग अपनी समाप्ति की ओर अग्रसर है। मीडिया के भारी दबाव व जनचेतना के चलते अब यह मामला कानून और कोर्ट की दहलीज पर पहुच चुका है। जहां समयानुसार व विधिसम्मत कार्यवाही होना लाजमी है।
 
पर इन सबके बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा यौन शोषण के संदर्भ में जारी की गई विशाखा गॉइडलाइन को जमीनी रूप से लागू किये जाने की मांग तेजी से उठ रही है। लगभग हर तरफ से ये आवाज उठ रही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किये गए विशाखा दिशा निर्देशों का पालन किया जाये और हर संस्थान अपने यहां महिलाओं की एक कमेटी बनाये जो यौन शोषण से जुड़े मामलो को देखे। इसलिए यहां पर विशाखा दिशा निर्देशों के विषय में भी थोड़ी सी चर्चा कर लेना आवश्यक है।
 
विशाखा दिशा-निर्देश वर्ष 1997 में अस्तित्व में आया। जिया मोदी ने अपनी किताब टेन जजमेंट दैट चेंज्ड इंडिया में लिखा है कि विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के संदर्भ में आया यह दिशा-निर्देश न्यायिक सक्रियता का चरमोत्कर्ष है। इस दिशा-निर्देश के तहत कंपनी की यह जिम्मेदारी है कि वह गुनाहगार के खिलाफ कार्रवाई करे। सुरक्षा को कामकाजी महिलाओं का मौलिक अधिकार मानते हुए इस निर्देश में यह कहा गया है कि शिकायत के संदर्भ में हर कंपनी में महिला-कमेटी बनाना अनिवार्य है, जिसकी अध्यक्षता न सिर्फ कोई महिलाकर्मी करेगी, बल्कि इसकी आधी सदस्य महिलाएं होंगी। इतना ही नहीं निर्देश में कहा गया है कि हर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने और ऐसे मामलों की सुनवाई का प्रबंध करने की ज़िम्मेदारी मालिक और अन्य ज़िम्मेदार या वरिष्ठ लोगों की हो। निजी कंपनियों के मालिक अपने संस्थानों में यौन शोषण पर रोक के विशेष आदेश दें। यौन उत्पीड़न की सुनवाई के दौरान पीड़ित या चश्मदीद के खिलाफ पक्षपात या किसी भी तरह का अत्याचार ना हो।
 
किन्तु यक्ष प्रश्न तो यही है कि क्या किसी संस्थान में विशाखा दिशा निर्देशों के तहत गठित कोई भी महिला कमेटी यौन शोषण की पीड़ित लड़की को इन्साफ दिला पायेगी? क्या जिन अधिकारों की बात इस दिशा निर्देश में कही गयी है कमेटी उनका समुचित उपयोग कर पायेगी? वो भी उस स्थिति में जब यौन शोषण का आरोप संस्थान के किसी मुलाजिम पर न लगकर उस व्यक्ति पर लगा हो जो उस पूरे संस्थान का कर्ता धर्ता हो। जाहिर सी बात है, जवाब ना में ही होगा क्योकि कमेटी भी उसी संस्थान का हिस्सा होगी जिसके मालिक या कर्ता धर्ता पर इस तरह के आरोप लगे होंगे। लिहाजा प्रत्यक्ष आ प्रत्यक्ष रूप से कमेटी आरोपी के ही प्रभाव में होगी। 
 
इसका सीधा और ताजा उदहारण तहलका काण्ड ही है जहां तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी पर ये आरोप लगा कि तेजपाल को बचाने के लिए उन्होंने पीड़िता पर दबाव बनाया कि वो चुप रहे।  
 
अब जरा सोचिये यदि तहलका में विशाखा दिशा निर्देशों के तहत कोई महिला कमेटी बनी भी होती तो क्या वो पीड़िता को इन्साफ दिला पाती? क्या तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी के प्रभाव क्षेत्र से वो कमेटी मुक्त होती? इसलिए ये कहना कि कार्यस्थल पर यौन शोषण के उत्पीड़न को विशाखा निर्देशों के तहत गठित कमेटी के माध्यम से रोका या नियंत्रित किया जा सकता है सिर्फ आत्म संतुष्टि का एक जरिया मात्र होगा न की समस्या का समाधान।
 
बेहतर होगा कि यौन शोषण से जुड़े मामलों को कानून की दहलीज पर ही सुलझाया जाये और इस देश की सशक्त न्यापालिका को ही यह तय करने दिया जाये कि दोनों पक्षों (यौन शोषण की पीड़िता और आरोपी) में कौन सही है और कौन गलत। 
 
हालांकि एक कटु सत्य यह भी है कि यौन शोषण के 70 फीसदी मामले अगर सही होते हैं तो 30 फीसदी मामले फर्जी और साजिशन फ़ंसाने वाले भी होते है। इसलिए यह भी जरुरी है कि यौन शोषण मामलो की जांच के समय इस बात का ध्यान रखा जाये कि मीडिया हाइप के दबाव में किसी निर्दोष को सजा न होने पाये क्योंकि ऐसे मामले में सबसे ज्यादा दबाव मीडिया का ही होता है।     
 
लेखक अनुराग मिश्र स्वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे सम्पर्क 09389990111 के जरिए किया जा सकता है.

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