रवींद्र शाह से जुड़ी यादों की यात्रा : इंदौर-दिल्ली वाया हरसूद

: स्मृति-शेष : कुदरत को ही मंजूर नहीं था कि यह शख्स चैन से बैठे! : उत्तर प्रदेश के चुनावी कवरेज में उस दिन मैं मैनपुरी में था। शिवरात्रि का दिन था। व्रत रखा था। मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई से लौटते हुए ड्राइवर से मैंने कहा कि किसी शिव मंदिर ले चले। प्राचीन भीमसेन मंदिर में गया। लौटकर गाड़ी में बैठा ही था कि इंदौर से एक मित्र का फोन आया। शाम करीब साढ़े पांच का वक्त था। सूचना दी कि रवींद्र शाह का एक्सीडेंट हो गया है। जरा पता करो मामला क्या है? मैंने दिल्ली में धीरेंद्र पुंडीर को फोन लगाया। बिजी मिला। दूसरा नंबर डायल करता इसके पहले ही दो एसएमएस आ गए। इससे बुरी खबर कोई हो नहीं सकती थी कि रवींद्र शाह इंदौर से भोपाल के बीच एक सड़क हादसे में दुर्घटना स्थल पर ही मौत की नींद सो गए। यह लिखते हुए अब तक भी यकीन नहीं आ रहा है कि रवींद्रजी नहीं रहे।

हादसे के चार दिन पहले ही फोन पर बात हुई थी। उत्तर प्रदेश की अपडेट उन्होंने ली थी। इंदौर जाने के बारे में बताया था। यह भी तय हुआ था कि अगर कवरेज के दौरान मैं बदायूं और संभल के आगे आता हूं तो एक दिन गाजियाबाद भी पहुंचूंगा। वहीं मुलाकात करेंगे। रह-रहकर उनका चेहरा मेरी आंखों में कौंध रहा है। मैं अपने मोबाइल को बार-बार देख रहा हूं। लग रहा है कि अभी फोन बजेगा। रवींद्रजी की आवाज सुनाई देगी। हकीकत यह है कि उनकी आवाज अब कभी सुनाई नहीं देगी। 17 साल के रिश्तों की अनगिनत यादें ताजा हो रही हैं। इस दरम्यान वे जैसे थे, वैसे ही रहे। सदाबहार। सुदर्शन। सक्रिय। खुशमिजाज। तरोताजा।

1993। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के दूसरे बैच से पास होकर निकला था। इंदौर का नईदुनिया भोपाल में दैनिक नईदुनिया के नाम से छपने लगा था। यह मेरे पत्रकारीय सफर का पहला पड़ाव था। नईदुनिया इंदौर से भूपेंद्र चतुर्वेदी तब स्वदेश में कार्यकारी संपादक बनकर आए थे। हम प्रेस कॉम्पलैक्स के नीलम रेस्टॉरेंट में अक्सर मिलते थे। भूपेंद्रजी ने मुझे इंदौर धकेला। कहते थे कि अगर इस लाइन में गंभीरता से आए हो तो नईदुनिया जरूर जाओ। नईदुनिया की छवि तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसी थी। मैं सोचता था कि मुझ जैसे नौसिखिए को वहां कहां गुंजाइश होगी। पहले कुछ साल रियाज करें। फिर वहां जाएं। लेकिन भूपेंद्रजी ने मेरा इंदौर का टिकट कटाकर ही दम लिया। इंदौर मेरे लिए अजनबी शहर था। उन्होंने मुझे रवींद्रजी से मिलने को कहा, जो तब नईदुनिया को छोड़कर 'दी फ्री प्रेस' के पहले संपादक हो चुके थे। उनसे पहला सामना वहीं हुआ। जुलाई 1994। वे उसी लुक में हमारी आखिरी मुलाकात तक बने रहे। एक बार पत्रकारिता विवि के जनसंपर्क विभाग की प्रमुख देवेंदर कौर उप्पल ने किसी समारोह में कहा था कि रवींद्र को वे बरसों से ऐसा ही देख रही हैं। सदाबहार। वे वाकई सदाबहार थे।

इंदौर में जब मैं उनसे मिला, तब तक 'दी फ्री प्रेस' के अंदरुनी हाल अच्छे नहीं रहे होंगे। मैं रवींद्रजी के भरोसे दैनिक नईदुनिया में कभी न लौटने की कसम खाकर निकला था। गलत मुहूर्त रहा होगा। फ्री प्रेस में मंगल प्रवेश पर ग्रहण लग गया। तीन-चार दिन उनके दफ्तर गया। उन्हें भी अहसास था कि बंदा उनके भरोसे सड़क पर है। मैं भी समझ गया कि माजरा गड़बड़ है। न मैंने पूछा कि कब ज्वाइन करूं। न उन्होंने कहा कि यार गलत आ गए। अनादिकाल से मेरी पीढिय़ों में कोई मीडिया में रहा नहीं था, सो यहां की सुनिश्चित अनिश्चितताओं का कोई अनुभव नहीं था। वे हर मुलाकात में मुझे उत्साहित करते। कहते कि कोई रास्ता निकालते हैं।

नईदुनिया के दफ्तर बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग की ओर आखिरी धक्का उन्होंने दिया। इससे पहले कि वहां चयन होता, दैनिक भास्कर में मुझे चुन लिया गया। तब श्रवण गर्ग स्थानीय संपादक थे। रवींद्रजी ने ही मुझे उनके पास भेजा था। डूबते को ताकत से उभरते भास्कर में यह बड़ा सहारा था। मुझे बिजनेस पेज पर काम मिला, जिसमें मेरी दिलचस्पी जरा भी नहीं थी। एकाध महीने बाद ही नईदुनिया से बुलावा आ गया। मैं बुरे वक्त में सहारा देने वाले श्रवणजी को नाराज छोड़कर भारी मन से नईदुनिया में ज्वाइन हो गया। रवींद्रजी ने भी राहत की सांस ली। सीख दी कि जल्दबाजी में फैसले मत करना। डटकर काम करना। नईदुनिया की लाइब्रेरी से रिश्ता बनाना।

'दी फ्री प्रेस' एक उम्दा अखबार था। लोगों को इसे मालवे का जनसत्ता कहते सुना। लेकिन अक्सर अच्छी चीजों की उम्र लंबी नहीं होती। मुझे याद नहीं यह अखबार कब बंद हुआ। रवींद्रजी भी इंदौर में नहीं रहे। न ही मेरा उनसे कोई संपर्क रहा। वे मुझे एक किनारे पहुंचाकर अपने लिए दूसरे किनारे की तलाश में निकल गए। जब वे वेबदुनिया के संपादक होकर आए तो कभी-कभार किसी कार्यक्रम में उनसे आमना-सामना होने लगा। मुस्कराकर पूछते, 'कैसा चल रहा है?' हमने उनमें कोई बदलाव नहीं देखा। पहनावे के प्रति बेपरवाह रहने वाले पत्रकारों से अलग रवींद्रजी की खास पसंद उनके आकर्षक लिबास से भी झलकती थी। उम्र का असर करीने से सजी दाढ़ी में कभी झांकते नहीं देखा।

2002। साल के आखिर में एक दिन वेबदुनिया से उनके जाने की सूचना मिली। वे फिर एक नए किनारे की तलाश में इंदौर से निकल गए। अब की बार दिल्ली। सहारा समय न्यूज चैनल में उनके होने की खबर तब हुई, जब एक साल के भीतर मुकेश कुमारजी ने मुझे भी मध्यप्रदेश चैनल के लिए चुना। रवींद्रजी इनपुट हेड थे। वे नोएडा दफ्तर में। हम इंदौर ब्यूरो में। उनका घर इंदौर में ही था। अक्सर आते। हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। साथ काम करने का यह पहला अनुभव था। चैनल सितंबर 2003 में लांच हुआ। ऑन एयर होने के पहले लाइव प्रसारण के एक ट्रायल में रीगल चौराहे पर ओबी वैन, कैमरा, लाइट्स के बीच प्रकाश हिंदुस्तानी और रवींद्र शाह सितारों की तरह घिरे थे। 24 घंटे के पहले सेटेलाइट रीजनल न्यूज चैनल से दर्शकों का यह पहला परिचय था। नौ साल नईदुनिया में गुजारने के बाद मेरे लिए भी यह एक और नईदुनिया थी, जहां लिखना कम और दिखना ज्यादा था।

2004। दिग्विजयसिंह की दस साल की कांग्रेस सरकार को उमा भारती ने उखाड़ फेंका था। चुनाव से बड़े इम्तहान में आने की बारी अब उमा भारती की थी। एक हजार मेगावॉट बिजली की इंदिरा सागर परियोजना में बांध अपनी पूरी ऊंचाई तक बनकर तैयार था। तीस जून हरसूद शहर के खात्मे की तारीख तय कर दी गई थी। चैनल ने इस डूब को टेलीविजन पर लाइव प्रसारित करने की योजना बनाई।
रवींद्रजी दी फ्रीप्रेस के दिनों में सरदार सरोवर इलाके पर कई चर्चित रिपोर्टिंग करा चुके थे। चैनल हेड मुकेश कुमार भी मध्यप्रदेश मूल के ही हैं। मुझे हरसूद जाने का हुक्म हुआ। नोएडा से भुवनेश सेंगर आए। एक ओबी वैन समेत तीन कैमरा यूनिट हरसूद के इलाके में घूमने लगीं। देश ने पहली बार करीब डेढ़ महीने तक एक शहर के डूबने की दास्तान को टीवी पर लाइव देखा।

हरसूद से लौटकर मैं सो नहीं पाया। यह एक तकलीफदेह अनुभव था। हम हजारों परेशानहाल परिवारों को बुरे हाल में छोड़कर लौटे थे। हम उनकी आखिरी शवयात्राओं और शादियों में शामिल हुए। हमने पीढिय़ों से साथ रहते आए संयुक्त परिवारों को तिनका-तिनका बिखरते देखा। सरकारी तंत्र की बेरहमी। उजड़ते औरतों-बच्चों की बेबसी। जड़ों से कटने की पीड़ा। यह बलि विकास की खातिर थी। हरसूद के हजारों किरदारों के चेहरे। मैं मूलत: प्रिंट मीडिया का हूं। मैं जानता था कि टीवी का यह कवरेज ज्यादा दिनों तक लोगों को याद नहीं रहेगा। ऐसे हालातों में रिपोर्टिंग के मौके बार-बार नहीं आते। एक
बार रवींद्रजी इंदौर आए तो मैंने कुछ लिखने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह काम फौरन कर देना चाहिए। ब्यूरो प्रमुख प्रकाश हिंदुस्तानी ने मेरा शेड्यूल कुछ ऐसा तय किया कि मैं बिना अवकाश लिए हरसूद के डूबने की दास्तान इत्मीनान से लिख सकूं।

ढाई महीने में डायरी की शक्ल में लिखा एक दस्तावेज लेकर मैं दिल्ली गया। रवींद्रजी ने मुझे चार बड़े प्रकाशकों का रास्ता बता दिया। मैं सबके पास गया। हरसूद की स्क्रिप्ट दिखाई। ज्ञानपीठ प्रकाशन में तब प्रभाकर श्रोत्रिय थे। नया ज्ञानोदय के एक अंक में वे इस किताब के कुछ अंश से कवर स्टोरी छाप चुके थे। मैं उनसे भी मिला। सबने इसे पसंद तो किया, लेकिन छापने के नाम पर हाथ खड़े किए। समस्या यह थी कि यह न तो कहानी थी, न कविता, न उपन्यास। यह साहित्य की किसी श्रेणी में नहीं थी। इसे पढ़ता कौन? किसी ने कहा कि स्क्रिप्ट दे जाइए, विचार करेंगे। नवंबर 2004 में मुझ जैसे नए नवेले लेखक की शर्त यह थी कि यह किताब हर हाल में जून 2005 के पहले छपकर बाजार में आनी चाहिए, क्योंकि हरसूद के विस्थापन का सिलसिला खत्म नहीं हुआ था।

आखिरकर मैं राजकमल प्रकाशन के एमडी अशोक महेश्वरी से मिला। रवींद्रजी उन्हें इस किताब के बारे में बता चुके थे। उन्होंने तीन दिन के भीतर तय किया कि किताब राजकमल से आएगी और मेरी शर्त के मुताबिक जून के पहले आएगी। एग्रीमेंट साइन होते वक्त रवींद्रजी नोएडा से आए। मुझे बधाई दी। राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशन पूर्व की औपचारिकताओं के लिए स्क्रिप्ट की एडिटिंग का काम रवींद्रजी को ही सौंपा। मैं इंदौर लौटकर अपने काम में लग गया। होली की छुट्टियों में जब रवींद्रजी इंदौर आए तो एक दोपहर मुझे फोन किया। बोले कि तुरंत नीचे आओ। इंदौर में एबी रोड पर इंडस्ट्री-हाऊस के छठवें माले पर स्थित चैनल के ऑफिस से उतरकर मैं बाहर आया। वे कार में बैठे थे। एक बड़ा सा लिफाफा मुझे दिया। मैंने पूछा कि क्या है? वे बोले कि खोलकर देखो। तुम्हारे काम की चीज है। मैंने बेसब्री से खोला। हरसूद 30 जून की पांच कॉपियां मेरे हाथ में थीं। वे बधाई देकर चले गए। कहा कि अपन फोन पर बात करते हैं।

मैं ऑफिस में लौटा। घंटों तक किताब को उलट-पलटकर देखता रहा। मेरे पैर जमीन पर नहीं थे। हरसूद का कवरेज आंखों में जिंदा हो उठा था। वह अमानवीय विस्थापन दस्तावेज में दर्ज हो चुका था। मेरे लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव था। अगले तीन महीनों में दिल्ली में दो आयोजन हुए। एक में कमलेश्वर, प्रभाष जोशी, सुरेंद्र मोहन, राहुल देव, अजय उपाध्याय, आनंद प्रधान, वर्तिका नंदा समेत मीडिया की कई हस्तियों ने शिरकत की। किताब पर बोला। लिखा। अननिगत अखबारों और पत्रिकाओं में समीक्षाएं छपीं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने इस पर नाटक लिखा। भारतेंदु हरिश्चंद्र अवार्ड के लिए चयन हुआ। मैं देश के करीब एक दर्जन विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में इस कवरेज पर बोलने के लिए बुलाया गया। हरसूद वालों की आखिरी आवाज इस किताब में हमेशा के लिए कैद चुकी थी। उनका विस्थापन गुमनाम नहीं हुआ था।

30 जून 2005 को हरसूद के हजारों विस्थापित नागरिकों ने अपने शहर की पहली बरसी मनाने का फैसला लिया। खंडहरों में तब्दील हो चुके हरसूद में इस किताब को बाकायदा दफनाने का निर्णय हुआ। रवींद्र शाह दिल्ली से रामबहादुर राय, राहुल देव समेत मीडिया और पर्यावरण से जुड़े कई कार्यकर्ताओं के साथ हरसूद आए। गीतकार विट्ठलभाई पटेल पहुंचे। 1984 में जिस जगह हरसूद को बचाने का संकल्प स्तंभ मेधा पाटकर की ऐतिहासिक रैली में स्थापित किया गया था, उसके बगल में यह किताब एक ताबूत में रखकर दफना दी गई। मैं एक बार फिर हरसूद में कवरेज के लिए मौजूद था। हम विस्थापन को साल भर से कवर कर ही रहे थे। इस बीच चैनल प्रमुख मुकेश कुमार सहारा समय को अलविदा कह चुके थे। किताब के संपादन में रवींद्रजी ने कुछ हिस्सों पर कैंची चलाई थी। इसमें
कई ऐसे नाम शामिल थे, जिन्होंने हरसूद के लाइव कवरेज में कई स्तरों पर योगदान दिया था। मैं उनसे कभी पूछ नहीं पाया कि इतनी सख्त एडिटिंग की जरूरत क्या थी?

धीरे-धीरे सहारा समय की ओपनिंग टीम के ज्यादातर खिलाड़ी बाहर जाते गए। मैं भी मार्च 2006 में दैनिक भास्कर में आ गया। रवींद्रजी कुछ समय जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में रहकर एस-वन चैनल में चले गए। फिर आजाद न्यूज चैनल। आउटलुक हिंदी में एसोसिएट एडिटर बने तो सालों बाद कुछ सुकून में देखे गए। मैं दो साल पहले भास्कर के नेशनल न्यूज रूम में आने के बाद कई दफा स्टोरी के लिए दिल्ली गया। सफदरजंग में गेस्ट हाऊस के पास ही उनका दफ्तर था। हम रात को घंटा-आधा घंटा टहलते। स्टोरीज के बारे में सुनाते। किताबों पर बात करते। इंदौर की यादें ताजा करते। अन्ना के आंदोलन के समय अगस्त में रामलीला मैदान गया। एक दिन अन्ना की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। हम साथ ही गए। लोधी रोड के इंडो-इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक सेमिनार में हमारे भाषण एक ही सत्र में थे।

रिश्तों के लिहाज से रवींद्रजी का भरोसा भीड़ में नहीं था। बहुत थोड़े लोग ही उनके इनर-सर्कल में रहे। उन्होंने चेले नहीं दोस्त बनाए। नए साथियों को वक्त-जरूरत मौके दिए। मौके नहीं दे पाए तो हौसला दिया। अच्छे पत्रकार बहुत हैं। वे अच्छे इंसान भी हों, यह बिल्कुल जरूरी नहीं। रवींद्रजी उस दुर्लभ प्रजाति के पत्रकार थे, जो अच्छे इंसान पहले थे। उनकी बातचीत के विषयों में कवरेज, स्टोरी, किताबें और शख्सियतें ज्यादा हुआ करती थीं। निराशा और नकारात्मकता के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी। दस सालों के दरम्यान वे दिल्ली की भीड़ में चुपचाप अपनी जगह बनाते हुए कई उतार-चढ़ावों से होकर गुजरे। मुश्किल दौर में भी मैंने उन्हें कभी हताश और उतरी शक्ल में नहीं देखा। वे हमेशा ही ऊर्जा से भरे और तरोताजा रहे। धार्मिक कर्मकांड, पूजा, कर्मफल की अवधारणा और ज्योतिष में उनका भरोसा नहीं था। न ही जिज्ञासा। लेकिन कभी इन चीजों की निंदा या आलोचना नहीं की। मीडिया की उस बिरादरी में वे कभी नहीं रहे, जो फायदों के जायज-नाजायज टुकड़ों की खातिर सरकारी दरवाजों के आगे दुम हिलाती है। ऐसे मुनाफामार लोगों से उनकी कुंडली कभी नहीं मिली।

मैं दावे से कह सकता हूं कि वे पाक दामन से पत्रकारिता में रहे। चैन से बैठना उनकी फितरत नहीं थी। इसलिए बार-बार ठिकाने बदले। अपनी जड़ें पत्रकारिता के सिवा कहीं नहीं फैलाईं। न किसी शहर में। न किसी संस्थान में। हर जगह शून्य से शुरू किया। उनका भरोसा शुरुआत में था, शिखरों में नहीं। वे उन पत्रकारों में से थे, जो खुद को कई बार शून्य तक लेकर गए। फिर शुरू हुए। एक हद तक आगे गए। फिर दूसरे शून्य तलाशे। जोखिम लेने की आदत सी बन गई थी। इसलिए जब आउटलुक में गए तो मैंने उन्हें ज्ञापन सौंपा कि बेहतर होगा कि धूनी रमा लीजिए। भटके बहुत। सत्य की अनुभूति अब यहीं कीजिए। वे बहुत खुश थे। चैनलों में चिल्लपों ज्यादा है। नए चैनलों में जरूरत से ज्यादा। एस-वन और आजाद में उनकी शांति भंग ही रही। सफदरजंग के नए दफ्तर में वे समाधि के भाव से स्टोरी में जुटे दिखाई दिए। शायद कुदरत को ही यह मंजूर नहीं था कि यह शख्स चैन से बैठे।

पत्रकारीय जीवन के अनुभवों पर उनका एकमात्र आलेख दो साल पहले माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि के दस्तावेज में छपा-'क्या भूलूं क्या याद करूं।' तब वे आजाद न्यूज चैनल में संपादक थे। इसमें उन्होंने लिखा कि रज्जू बाबू हिंदी पत्रकारिता का अश्वमेध करना चाहते थे। लेकिन नवभारत टाइम्स के माध्यम से प्रयास करने के बावजूद सफल नहीं हुए। यह काम दरअसल किसी ने किया तो वे सुधीरजी हैं। दैनिक भास्कर के प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल। जयपुर इस अश्वमेध का आरंभ बिंदु माना जाना चाहिए। रवींद्रजी का यह आलेख उनके 25 सालों सालों की पत्रकारिता के साक्षी पांच शहरों के सफरनामे पर केंद्रित है। इसमें पत्रकारिता में तेजी से आए बदलावों और उनके साथ उनके हमकदम होने की शानदार झलक है।

उत्तर प्रदेश की 40 दिन की यात्रा से लौटकर इंदौर गया। रवींद्रजी के घर। उनकी बुजुर्ग मां से मिला, जिनकी सेहत देखने के लिए वे दिल्ली से आए थे। बच्चों से मिला, जिनसे वे बेइंतहा प्यार करते थे। तीन पुलिया के उस घर में पहले रवींद्रजी की मौजूदगी में ही आता रहा। इस दफा गुलाब के फूलों की माला में उनका मुस्कराता हुआ चेहरा सामने पाया। मुझे फिर यकीन नहीं आया कि यह सच है। इंदौर में उन्होंने कई साल गुजारे थे। कुछ मित्रों ने शिकायत की कि इंदौर के अखबारों ने सड़क हादसे की खबर तक उनकी मृत्यु को सीमित रखा। सिर्फ प्रवीण शर्मा ने हैलो हिंदुस्तान में उन्हें अलग से याद किया। भुवनेश सेंगर ने दिल्ली से फोन पर बताया कि नोएडा की श्रद्धांजलि सभा में उन्हें याद करने कई लोग इकट्ठा हुए। मध्यप्रदेश के अखबारों में जगह भले ही कम हो, रवींद्रजी दोस्तों के दिलों में ज्यादा बड़ी जगह रखते हैं। यह अखबार से ज्यादा स्थाई और शाश्वत है। अगर मैनपुरी में उनकी मौत की मनहूस खबर न आई होती तो मुमकिन है कि मैं संभल से एकाध दिन का वक्त निकालकर गाजियाबाद में इंदिरापुरम् के उनके घर जरूर जाता। हम नोएडा से होकर ही दिल्ली साथ जाते। वे फिर किसी किताब का जिक्र करते या किसी स्टोरी पर बात करते। मैं जानता हूं कि अब यह बात कभी नहीं होगी!

सहारा-समय के नोएडा परिसर में 'हरसूद 30 जून' का लोकार्पण समारोह।

इंदौर प्रेस क्लब में हरसूद के विस्थापन पर आयोजित चर्चा में।

हरसूद की पहली बरसी पर आए राहुलदेव, रामशरण जोशी, विट्ठलभाई पटेल के साथ रवींद्रजी।

लेखक विजय मनोहर तिवारी दैनिक भास्कर से जुड़े पत्रकार हैं. उनसे संपर्क vijaye9@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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