राजनाथ सिंह सूर्य और दयानंद पाण्‍डेय का एक दूसरे को आईना दिखाने का काम अंजाम तक पहुंचना चाहिए

इन दिनों भड़ास को दयानंद पाण्डेय के उद्वेलित उद्वेलनों ने बहुत आप्लावित कर रखा है. इसका प्रारम्भ एक साक्षात्कार से हुआ जो डॉ. मुकेश मिश्रा ने इसी भड़ास के लिए किया. “सीएम के दबाव में मैनेजमेंट ने ट्रांसफर किया तो इस्तीफा दे मारा” शीर्षक से छपा यह साक्षात्कार अच्छा था, सुरुचिपूर्ण और प्यारा. कहीं से भी उसमे कड़वाहट, गर्माहट, आहट, तिक्तता या रिक्तता नज़र नहीं आ रहा था. तब तक जब तक उसमें दयानन्द पाण्डेय नहीं कूदे. मैं “कूदना” शब्द का प्रयोग इसीलिए कर रहा हूँ क्योंकि कई लोग यह मान सकते हैं और शायद सोचते हों कि जब इंटरव्यू राजनाथ सिंह ‘सूर्य’ का था तो इस प्रसंग में दयानंद पाण्डेय का भला क्या काम था?

यह कुछ ऐसा ही हुआ कि कथा महाभारत की चल रही हो और अचानक से रामायण के कुछ पात्र उसमें प्रवेश कर कथा की गति को किसी और ही दिशा में मोड़ दें. कुछ उसी तरह जैसे वर्तमान में भड़ास पर प्रकरण राजनाथ सिंह सूर्य बनाम दयानंद पाण्डेय का चल रहा है और मैं उसमे बीच में कूदने की कोशिश कर रहा हूँ. लेकिन शायद एक हक दयानंद पाण्डेय को भी था राजनाथ सिंह सूर्य के इंटरव्यू के सन्दर्भ में टिप्पणी करने का और एक हक मुझे भी है इस चल रहे द्वंद्व में निर्द्वन्द्व भाव से अवतरित होने का. वह हक है सार्वजनिक जीवन के आयामों का.

यदि राजनाथ सिंह सूर्य ने अपना एक इंटरव्यू भड़ास पर प्रकाशित होने के लिए मुकेश मिश्रा को दिया तो उन्हें यह बखूबी ज्ञात था कि यह अब उनका निजी मामला नहीं रह गया. जब बात एक सार्वजनिक मंच पर आएगी, जब आम आदमी इन बातों को पढ़ेगा तो वह इसे अपनी दृष्टि, अपनी निगाह, अपने परिदृश्य, अपनी पृष्ठभूमि, अपने विचारधारा के दृष्टिगत देखेगा और परखेगा. वह इन्ही बातों के अनुरूप अपना एक निष्कर्ष भी निकालेगा और शायद उसी के आधार पर अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया भी करेगा. तात्पर्य यह कि जब भी किसी भी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक मंच से कोई बात कही जायेगी तो कहने वाले व्यक्ति को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अपनी बात कहने के साथ ही उसने सर्व-साधारण को उस पर क्रिया-प्रतिक्रिया और टीका-टिप्पणी का पूरा अधिकार दे दिया.

इसी प्रकार से जैसे ही कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर गया, वह यह अधिकार खो बैठता है कि अपने आप को लोगों की निगाह से एकदम परे रख सके. जब आप जनता की निगाह में हैं तो तमाम आँखों की रोशनी तो आप पर पड़ेगी ही. मैं यह भी दावे से कह सकता हूँ कि राजनीति, पत्रकारिता, समाज सेवा आदि ऐसे प्रोफेशन हैं जिन्हें बड़े आराम से सार्वजनिक जीवन का हिस्सा माना जा सकता है. पुलिस की नौकरी भी. इसीलिए यदि एक पुलिस अधिकारी के रूप में, एक एसपी या डीआईजी के रूप में अमिताभ ठाकुर की कोई बुराई होती है, अमिताभ ठाकुर पर कोई प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं होती हैं तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि जनता को, जनता के नुमाइंदों को, जनता की आँख-कान के रूप में मीडिया को अमिताभ ठाकुर के कार्य और आचरण पर टीका-टिप्पणी करने का पूरा अख्तियार है. मुझे इस बात से नाराज़ हो जाने अथवा उसे बुरा मानने का शायद कोई उचित कारण नहीं है. हाँ, साथ ही मुझे यह भी अधिकार है कि मैं अपने पक्ष की बात उसी शिद्दत से अपने शब्दों अथवा अपने कृत्यों से सामने रखूं. यह नियम राजनाथ सिंह सूर्य पर भी उतना ही लागू है जितना दयानंद पाण्डेय, मुकेश मिश्रा, अमिताभ ठाकुर, मनोज दुबे या किसी और पर.

इसके साथ एक और बात मैं कहना चाहूँगा कि मेरी दृष्टि में सार्वजनिक टिप्पणी के प्रति हम सबों को अपना नजरिया कुछ बदलना भी पड़ेगा. इस सम्बन्ध में मैं कुछ बातों पर विशेष बल दूँगा. एक तो यह कि मैं किसी को इसीलिए अपना शत्रु नहीं मानने लगूं क्योंकि उसने मुझ पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी कर दी. जब मैं सार्वजनिक जीवन में हूँ तो मुझे अच्छा-बुरा दोनों समान रूप से स्वीकार करना होगा. दूसरी बात यह कि मुझे इस बात से कतराना नहीं चाहिए कि यदि मुझ पर कोई आक्षेप लगे हैं तो मुझे चुप रहना चाहिए. मेरा यह मानना है कि यदि सामने वाले को आरोप लगाने का अधिकार है तो मुझे अपना पक्ष रखने, अपना बचाव या आक्रमण करने का भी उतना ही अधिकार है, शायद मेरा कर्तव्य भी. मैं हमेशा से यही मानता हूँ कि ऐसे समय में चुप वही लोग हो जाया करते हैं, जिनके पास शायद कहने कोई कुछ नहीं होता और छिपाने को बहुत कुछ.

मुझ पर तुम एक हज़ार आरोप लगाओ, मैं एक हज़ार आरोपों का उत्तर दूँगा, यदि मुझे तुम्हारा बर्ताव कुछ व्यक्तिगत द्वेषभाव से ग्रस्त लगेगा तो मैं तुम पर दोहरी गति से हमला भी करूँगा. यह तो हुआ वीरोचित गुण. लेकिन यह देना कि अब मैं उस आदमी की बात का क्या उत्तर दूँ या मैं इसका उत्तर देना उचित नहीं समझता, मेरे जैसे आदमी के मन में ऐसी बातें कहने वाले व्यक्ति के प्रति कुछ शंका ही पैदा करता है. हमारा देश तो होली खेलने वाला देश है, आपस के गुण-दोष का भी सार्वाजनिक रूप से होली खेला जाना चाहिए. हममे से कोई भगवान नहीं है. मैं जानता हूँ कि मैंने अब तक के चालीस से ऊपर वर्षों के जीवन में इतने अधिक पाप कर दिये हैं कि यदि वास्तव में हमारे धर्मग्रंथों की तर्ज़ पर संताप और पाप की सजा के प्रावधान हुआ करें तो मैं शायद चालीस करोड़ जन्मों को यही सब करता रह जाऊँगा. मैं यह भी जानता हूँ कि बहुत सारे लोगों की दशा मुझे शायद कई गुणा बुरी ही बैठे. ऐसे में हमें अपने आरोपों को सुनना, उनका उत्तर देना और उनका मुकाबला करना एक आवश्यक आवश्यकता प्रतीत होता है. यह नियम हम सबो पर सामान भाव से लागू होता है.

एक बात और कहना चाहूँगा. मैं यह नहीं मानता कि अतीत की भूलों को भूले-बीसरे यादों की तर्ज़ पर किसी कोने में समेट देना चाहिए. मेरा यह मानना है कि हर जीवन का सिंहावलोकन होना चाहिए, उनके जीवनकाल में भी, उनके चले जाने के बाद भी. लेकिन इसके साथ टीका-टिप्पणी करने वाले व्यक्ति को दो बातें कभी नहीं भूलनी चाहिए- एक तो उसे अपनी टिप्पणियों के दौरान शिष्टता और सौम्यता के भावों को कभी नहीं छोडना चाहिए क्योंकि ये मानव समाज के अनिवार्य अंग हैं. दूसरा यह कि समस्त टिप्पणियाँ सत्यपरक और प्रामाणिक होनी चाहिए. मात्र व्यक्तिगत द्वेषभाव से ग्रस्त हो कर हमें किसी को लांछित नहीं करना चाहिए. ऐसा करने वाला व्यक्ति दूसरे का तो कम नुकसान करता है, अपना स्वयं अहित ज्यादा करता है क्योंकि इससे उसकी क्रेडिबिलिटी पर भारी धक्का लगता है- हमेशा, हमेशा के लिए.

इन बुनियादी संदेशों को प्रस्तुत करने के पीछे संकेत दोनों महायोद्धाओं राजनाथ सिंह सूर्य और दयानंद पाण्डेय से यह निवेदन करना था कि जो परस्पर एक-दूसरे को आईना दिखाने का सिलसिला शुरू हुआ है, उसे बीच रास्ते नहीं छोड़ कर गंतव्य तक पहुंचाना शायद देश और समाज के हित में ही होगा. दोनों ने अपने वक्तव्यों में तमाम छिटपुट तथ्य बिखेरे हैं पर अभी बहुत कुछ इनमें छिपा पड़ा है जिनका उजागर होना उचित ही होगा, अनुचित नहीं. भ्रम का बना रहना हमेशा ही सत्य के परिलक्षित हो जाने से ज्यादा नुकसानदेह होता है, यदि सत्य उतना कड़वा ना हो तो.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के वरिष्‍ठ आईपीएस अधिकारी हैं तथा इन दिनों रूल्‍स एवं मैनुअल्‍स विभाग में एसएसपी के रूप में कार्यरत हैं.

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