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राजनीति और धर्म पर दो किताबों पकवान बनाने की विधियां अज्ञात भाषा में दर्ज!

भारत के संदर्भ में राजनीति और धर्म मुझे लाइब्रेरी में रखी दो ऐसी किताबें लगती हैं जिनमें पकवान बनाने की ढेर सारी विधियां किसी अज्ञात भाषा में लिखी गई हैं। हम सिर्फ चित्र देखकर उन पकवानों के बारे में अनुमान लगा सकते हैं। हम में से हर कोई खुद के अनुमान को सही ठहराने का दावा करता है। इन किताबों को हम पसंद या नापसंद कर सकते हैं, लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते। इन दोनों विषयों पर मैंने कभी कुछ नहीं लिखा, क्योंकि ऐसा जरूरी नहीं समझा।

भारत के संदर्भ में राजनीति और धर्म मुझे लाइब्रेरी में रखी दो ऐसी किताबें लगती हैं जिनमें पकवान बनाने की ढेर सारी विधियां किसी अज्ञात भाषा में लिखी गई हैं। हम सिर्फ चित्र देखकर उन पकवानों के बारे में अनुमान लगा सकते हैं। हम में से हर कोई खुद के अनुमान को सही ठहराने का दावा करता है। इन किताबों को हम पसंद या नापसंद कर सकते हैं, लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते। इन दोनों विषयों पर मैंने कभी कुछ नहीं लिखा, क्योंकि ऐसा जरूरी नहीं समझा।

मैं न तो राजनीति का विरोधी हूं और न ही नास्तिक हूं। देश चलाने के लिए राजनीति अनिवार्य है और धर्म इस दुनिया के ज्यादातर लोगों की जिंदगी से जुड़ा है। एक व्यक्ति को जितना आस्तिक होना चाहिए, उतना मैं भी हूं, लेकिन कुछ दिनों पूर्व एक बहुत पुरानी घटना के बारे में सुनकर इन दिनों मैं धर्मगुरुओं की हमारे जीवन में भूमिका के बारे में विचार कर रहा हूं।

इस घटना के बारे में मुझे मेरी मां ने बताया। यह एक बिल्कुल सच्ची घटना है। इससे पहले मैंने कभी इसके बारे में नहीं सुना था। भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौर की बात है। मेरे गांव के पुराने घर में एक लड़की का जन्म हुआ। प्यार से नाम रखा – छोटी। वह रिश्ते में मेरे दादाजी की बुआ लगती थी। जब वह पांच साल की हुई तो पड़ोस के शहर में रहने वाले एक लड़के से उसकी शादी तय कर दी गई। वह लड़का छोटी की उम्र से करीब चार गुना बड़ा था। जब बारात आई तो मालूम हुआ कि दूल्हे की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है। जब उसकी हालत और बिगड़ने लगी तो पंडितजी का हुक्म हुआ- शुभ मुहूर्त्त निकला जा रहा है। कन्या को फेरों के लिए जल्द हाजिर करो। खैर… किसी तरह रस्म पूरी हुई, लेकिन आखिरी फेरे तक दूल्हे की नाड़ी भी थम चुकी थी। छोटी का हमसफर हाथ थामने से पहले ही उसे छोड़कर जा चुका था। तब गांव के धार्मिक विद्वानों की बैठक हुई और फैसला लिया गया कि दूसरे गांव का शव हमारे दरवाजे से नहीं निकाला जा सकता। लिहाजा रस्सियों का इंतजाम हुआ और शव को उनसे बांधकर घर की छत से नीचे उतारा गया। छोटी के लिए धर्मगुरुओं का हुक्म हुआ कि भगवान ने तुम्हारी जिंदगी का फैसला शादी के पहले दिन ही कर दिया है, इसलिए तुम हमेशा विधवा के वेश में अपने मायके रहो। सात जन्मों का साथ निभाने वाला इतनी जल्दी अलविदा कह देगा, छोटी ने ऐसा ख्वाब में भी नहीं सोचा था।

वक्त गुजरते वक्त नहीं लगता। धीरे-धीरे छोटी के मन से उस दूल्हे की तस्वीर धुंधली पड़ती गई जिसके साथ उसने कभी सात फेरे लिये थे। वह पूरी जिंदगी विधवा बनकर जिंदा रही, क्योंकि उसकी जिंदगी का फैसला कुछ लोग ले चुके थे। उसने हमेशा सफेद साड़ी पहनी, क्योंकि कुछ लोगों ने उसकी जिंदगी के लिए सिर्फ यही रंग चुना था। वह अपनी जिंदगी का कोई फैसला अपनी मर्जी से नहीं ले सकती थी, क्योंकि जिंदा रहने के सभी अधिकार उससे बहुत पहले छीन लिए गए थे। कई साल बाद छोटी ने इस दुनिया को अलविदा कहा और हमेशा के लिए मर गई। कम्प्यूटर पर जब मैं ये लफ्ज टाइप कर रहा हूं तो मेरी अंगुलियां कांप रही हैं। मैं उन सब लोगों को छोटी की ‘हत्या’ का जिम्मेदार मानता हूं जिन्होंने कुछ ग्रंथों की मनमानी व्याख्या के आधार पर उसकी सभी खुशियां छीन लीं।

कुछ दिनों पहले मैं एनबीटी की वेबसाइट पर एक धार्मिक नेता से संबंधित समाचार पढ़ रहा था। उनका कहना है कि 2014 के चुनावों में यदि हम सत्ता में आएंगे तो कानून बनाकर अयोध्या में राम मंदिर बनाएंगे। यह समाचार पढ़ने के बाद मुझे कई दशक पहले धर्म के विद्वान कहलाने वाले उन लोगों की याद आ गई जिन्होंने उस जिंदगी को खत्म कर दिया था जो शुरू भी नहीं हुई थी। मैं फिर इस बात का जिक्र करना चाहूंगा कि श्रीराम मेरे भी उतने ही भगवान हैं जितने वे और प्राणियों के हैं। मैं कितना भी बड़ा बन सकता हूं लेकिन उनसे बड़ा कभी नहीं बन सकता।

आप आस्तिक बनते हैं तो आजाद हैं। आप नास्तिक बनते हैं तो भी आजाद है, लेकिन अगर आप अपने धार्मिक और राजनीतिक फैसले किसी और पर छोड़ते हैं तो आप भविष्य में निश्चित रूप से गुलाम होने वाले हैं। हमें अयोध्या या देश के किसी भी हिस्से में तब तक राम मंदिर बनाने का कोई हक नहीं जब तक कि हर घर तक शिक्षा, चिकित्सा, रोटी और इंसाफ न पहुंचा सकें। यही बात मस्जिद और इस श्रेणी की दूसरी इमारतों पर लागू होती है। मैं देश में हिंदू आधिपत्य के खिलाफ हूं लेकिन मैं मुस्लिम आधिपत्य के भी खिलाफ हूं। अल्लाह पूरी कायनात का मालिक है और कहीं मस्जिद बनने या न बनने से उसकी हैसियत को कोई फर्क नहीं पड़ता। आज जब जन्नत से मुहम्मद (सल्ल.) इस जमीन को देखते होंगे तो उन्हें इस बात का जरूर अफसोस होता होगा कि किन लोगों के लिए मैंने पत्थर और जुल्म सहे? ये तो आज तक इन्सान भी नहीं बन सके।

मैं नहीं जानता कि देश के अगले प्रधानमंत्री कौन बनेंगे। मैं इस देश के कानून को मानता हूं और उसके मुताबिक जो चुना जाएगा उसे मैं भी प्रधानमंत्री ही कहूंगा। भारत के नए प्रधानमंत्री जी, मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप टीका लगाते हैं या टोपी पहनते हैं। मुझे आपके कुर्ता या साड़ी पहनने से भी कोई ऐतराज नहीं है। मुझे इस बात से भी कोई मतलब नहीं कि आपका चुनाव चिह्न क्या है। मुझे इस बात से जरूर मतलब है कि देश चलाने की आपकी नीतियां क्या हैं। हमें अब और मंदिर-मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे नहीं चाहिए। कृपया हमारे लिए स्कूल, अस्पताल और कारखानों का प्रबंध कीजिए। हमें अमेरिका और ब्रिटेन से भी बेहतर लोकतंत्र चाहिए। हम माला, टोपी, कृपाण और क्रॉस जैसे कई मसलों को एक संदूक में बंद करना चाहते हैं, क्योंकि फिलहाल हमें रोटी की जरूरत है। अगर मुमकिन हो तो इस संदूक को ताला लगाकर अरब सागर में दफन करवा दीजिए, ताकि इसे कोई नहीं खोल सके। आप धर्म के उन गुरुओं को नजरअंदाज कीजिए जो अपने उटपटांग फैसले जनता पर थोपते हैं और ग्रंथों की मनमानी व्याख्या करते हैं। असल में ये लोग हमारे लिए गुलामी का फंदा तैयार कर रहे हैं। और सिर चाहे फंदे में दिया जाए या फंदा सिर में लगाया जाए, खत्म तो जिंदगी ही होती है।

राजीव शर्मा

ganvkagurukul.blogspot.com

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