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राजस्थानी व भोजपुरी की मान्यता का मार्ग हुआ प्रशस्त

: यूपीएससी से अनुमति की बाध्यता हुई समाप्त, नई दिल्ली में केन्द्रीय गृहमंत्री सहित कई केन्द्रीय नेताओं से मुलाकात कर राजस्थान लौटा प्रतिनिधिमंडल, अब पूरा ध्यान दिल्ली पर : उदयपुर : भाषाओं को 8वीं अनुसूची में जोड़ने के संबंध में यूपीएससी से अनुमति की बाध्यता समाप्त हो जाने से अब राजस्थानी व भोजपुरी भाषाओं के लिए मान्यता का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

: यूपीएससी से अनुमति की बाध्यता हुई समाप्त, नई दिल्ली में केन्द्रीय गृहमंत्री सहित कई केन्द्रीय नेताओं से मुलाकात कर राजस्थान लौटा प्रतिनिधिमंडल, अब पूरा ध्यान दिल्ली पर : उदयपुर : भाषाओं को 8वीं अनुसूची में जोड़ने के संबंध में यूपीएससी से अनुमति की बाध्यता समाप्त हो जाने से अब राजस्थानी व भोजपुरी भाषाओं के लिए मान्यता का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

यह जानकारी अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के प्रदेश महामंत्री डॉ. राजेन्द्र बारहठ ने दी। दिल्ली में कई केन्द्रीय नेताओं से मुलाकात करने के बाद मंगलवार को यहां लौटकर उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री द्वारा गठित कमेटी ने भाषा-मान्यता के लिए यूपीएससी की अनुमति को आवश्यक नहीं माना है। बारहठ ने बताया कि संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से उनके निवास पर मुलाकात कर बजट सत्र में ही राजस्थानी तथा भोजपुरी को 8 वीं अनुसूची में जोड़ने की पुरजोर मांग की।

शिंदे ने समिति को प्रदेश की भावना का सम्मान किए जाने का आश्वासन दिया। प्रतिनिधिमंडल ने संस्कृति मंत्री चंद्रेश कुमारी, केन्द्रीय मंत्री सचिन पायलट, पूर्व राष्टपति प्रतिभा पाटील के पति देवीसिंह शेखावत, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा, कांग्रेस की मुख्य सचेतक डॉ. गिरिजा व्यास, राज्यसभा सांसद अश्कअली टाक, डॉ. प्रभा ठाकुर, सांसद अर्जुन मेघवाल, देवजी पटेल तथा इज्यराजसिंह से भी मुलाकात कर राजस्थानी मान्यता की दिशा में गंभीर प्रयास करने की अपील की।

प्रतिनिधिमंडल में डॉ. बारहठ के अलावा राजस्थानी अकादमी नई दिल्ली के अध्यक्ष रामनिवास लखोटिया, रिखबचंद जैन, राजस्थान संस्था संघ नई दिल्ली के अध्यक्ष सुरेश खंडेलवाल, महामंत्री के.के. नरेडा, समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बिजय कुमार जैन, मुंबई-ठाणे से कांग्रेसी नेता जनक व्यास शामिल थे।

बारहठ ने प्रसन्नता व्यक्त की राजस्थानी के मसले पर लम्बे समय से चली आ रही राजनीतिक उदासीनता से मुक्ति मिली है तथा राजस्थानी सांसद अब अपनी मातृभाषा से जुड़े इस मुद्दे के प्रति सजग हुए हैं। इस उदासीनता के चलते ही विधानसभा के 25 अगस्त 2003 के सर्वसम्मत संकल्प प्रस्ताव के बावजूद भी मैथिली, डोगरी, संथाली व बोडो के साथ राजस्थानी को मान्यता नहीं मिल पाई थी।

बारहठ ने कहा कि अब हर राजस्थानी की नजर दिल्ली पर है तथा बजट सत्र में ही राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिले इसके लिए पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि समिति ने दिल्ली में निवास कर रहे प्रवासी राजस्थानियों को इस मुद्दे से जोड़ने के लिए 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में बैठक रखी जिसमें 50 से अधिक संगठनों व संस्थाओं के प्रतिनिधि व कई राजनेता शामिल हुए। साथ ही देश व विदेश में बसे राजस्थानियों से इस मांग को मुखर करने की अपील की जा रही है। समिति का प्रतिनिधिमंडल शीघ्र ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात करेगा।

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