राजस्थान उर्दू अकादमी के अध्यक्ष ने अपने पिता को सर्वोच्च सम्मान दिलाया!

Prem Chand Gandhi : अगर आप किसी अकदमी के अध्‍यक्ष हैं तो अपने पिताजी को सर्वोच्‍च सम्‍मान दिला सकते हैं। यह कमाल किया है राजस्‍थान उर्दू अकादमी के अध्‍यक्ष हबीबुर्रहमान नियाजी ने। उनके पिता महबूबुर्रहमान नियाजी को उनकी मजहबी किताब के लिए अकादमी का प्रतिष्ठित महमूद शिरानी अवार्ड देने की घोषणा की गई है। राजस्‍थान में साहित्‍य-संस्‍कृति का ऐसा बेहाल इतिहास में कभी देखने को नहीं मिला…

        Dush Yant congrats for this historical development ! We all are proud of it ! 😉 we must consider it as respect to elders.. Hahaha

        Rakesh B. Bhargava bat apane apno ki hai

        Manik Ji wah

        Prem Chand Gandhi हां दुष्‍यंत जी, बुजुर्गों का सिर्फ उम्र और संबंधों के कारण सम्‍मान करने की परंपरा का सूत्रपात पिछले दिनों राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी ने शुरु किया था। देखिये परंपरा कहां तक जाती है।

        Hari Jaipur kash mera beta bhi kuch ban jaaye dua karo prem bhai

        Vivek Nirala wah!jugad kijiye mere kahin hone ka shayad Mahakavi Nirala ko maranoparant koi PURASHKAR mil jaye.

        Akbar Rizvi shocking

        Saddiq Ahmed like this

        Rakesh Kumar shameful

        Ramakant Roy मत कहिये नहीं तो साम्प्रदायिकता की चर्चा होने लगेगी और आप सांप्रदायिक कहे jayenge…

        Gyanesh Upadhyay jab jod-tod hi sabse mahatwpurn ho jaye jo yahi hoga. phir bhi yah janana jaroori hai ki kaun kitna imandar hai aur kiske prati imandar hai? doosri baat, imandar hone ki jaroorat hai aur beimani par kewal rone aur halla machane se kaam nahin chalega.kuch pukhta kijiye.

        Vinod Bhaskar आप कहते हैं ऐसा देखने को नहीं मिला. तब आप पुरस्कारों के बारे में कुछ नहीं जानते. सच ये है कि सरे नहीं तो ९९.९९ पुरस्कार अपनों को ही दिए जाते हैं या वहां दिए जाते हैं जहाँ कोई स्वार्थ साधता हो. यहाँ तक कि नोबल प्राइज़ भी इसी में आते हैं. यही कारन है कि भारत में ही देखें तो शांति पुरस्कार गाँधी को नहीं मिलता मदर टेरेसा को मिल जाता है. नोबल कि अंदरूनी राजनीती पर इरविंग वैलेस ने एक पूरी पुस्तक लिखी है, पढ़ लीजिए.

        Atul Pandey ये है हमारे देश की गन्दी परम्परा जिसके सहारे हम झूठ की उंगली पकड़ कर आगे बढने की असफल कोशिश कर रहे हैँ लेकीन कब तक

        Atul Pandey ये है हमारे देश की गन्दी परम्परा जिसके सहारे हम झूठ की उंगली पकड़ कर आगे बढने की असफल कोशिश कर रहे हैँ लेकीन कब तक

        Rajendra Bora Itihaas aise hi banate aur bigadte hain.

        Mukesh Popli प्रेम जी, आप जैसा सीधे इंसान मैंने बहुत कम देखे हैं, राजनीति और स्‍वार्थपने की बेहूदा मिसालें सिर्फ और सिर्फ साहित्‍य क्षेत्र में ही मिलती हैं, आप तो पुरस्‍कारों की बात कर रहे हैं, न जाने कितनी मौलिक रचनाएं इधर-उधर का हेर-फेर कर दूसरे नामों से भी प्रकाशित हो जाती हैं और लेखक टापता रह जाता है। अधिकतर समूह चमचों की रचनाएं प्रकाशित करते हैं क्‍योंकि वह किसी प्रतिष्ठित का चमचा है,। आप दिल से मत लगाइए और अपना काम करते जाइए।

        Prabhakar Chaube aisa kamaal kai rajyo me hua hai

        Basant Vyas प्रेम जी, आप भी प्रेम जी, आप भी पुरस्कार के पीछे पड़े हैं.
        उन किताबो की भी कुछ बात करो जिनका रोज
        लोकार्परण हो रहा है ओर वो बाज़ार मैं कॅन्ही नज़र
        नही आती. आप भी उनकी फेस बुक पर जम कर
        तारीफ करते हैं.पुरस्कार मिलने से कम से कम किताबो
        की चर्चा तो हो जाती है घर मे रेवड़ी बाटने का रिवाज़
        भारत मैं पुराना है. राजनीति मैं तो ही रहा है फिर साहित्य
        इससे अछूता क्यो रहे. आज के ज़माने मे बेटा बाप को कुछ
        देदे तो भय्या बहुत बड़ी बात है. समझो बेटा बहुत लायक है.

        Basant Jaitly बाज़ार में ढूँढने से सब नज़र आता है, मिलता है. यह बात अलग है कि किताब ढूँढने में वो लगन नहीं है जो हम एक टीशर्ट ढूँढने में भी दिखा देते हैं.इस युग में जब यू -निवार्सिटी, कॉलेज और स्कूल के अधिकाँश मास्टर ही किताबें / पत्रिकाएं नहीं पढ़ रहे तो अन्य से तो उम्मीद ही क्या राखी जाए ? ढूँढने की बात तो छोडिये यह बताएं कि पुस्तकों के लोकार्पण पर जाने वाले लोगों में से भी कितने उस पुस्तक को खरीदते हैं ?अगर ऐसा है तो पुस्तक को दोष क्यों दिया जाए ? किसी का गर किसी पुस्तक से अपरिचय है तो उसे मात्र इसीलिये खारिज नहीं किया जा सकता कि कोई उससे अपरिचित है.कम से कम लोग इस चर्चा से उसके बारे में कुछ जान तो पाते हैं और कुछ मेरे जैसे मूर्ख भी हैं जो उसे ढूंढते हैं ,पढते हैं और अपनी राय बनाते हैं. रही बात पुरस्कार की तो यदि पिता के लेखन की वस्तुतः अनदेखी हुई है, यदि वह स्तरीय है और किसी अन्य कारण से बाहर रखा गया है तो मेरे विचार से पुत्र द्वारा यह काम किया जाना कतई गलत नहीं है.

        Sankalp Sharma Kamanwala Ye thread hi aisa hai Gandhi ji … is par baat shuru hogi to bahut door tak jaayegi aur haath men kuch nahin lagega…
        waise Habib ur rahman niyazi sahab FB par hain kya???

        Shiv Shambhu Sharma कोइ कुछ भी कहे कुछ भी करे
        किसकी कहाँ कैसी गलती है
        यहाँ तो बाजार मे,चिकनी चमेली ही चलती है ।

        Priyanka Singh hmmm

        Govind Mathur ये जानना भी जरूरी है कि क्या सम्मान केवल पिता होने के कारण ही दिया गया है या साहित्यिक अवदान के कारण. वैसे पिता का सम्मान करना अच्छी बात है ? बेटा ही सम्मान नहीं करेगा तो कौन करेगा ?

        Basant Vyas जेटली साहिब, आपके यूनिवर्सिटी के बुक वर्ल्ड
        पर ही कितनी लोकार्पण वाली पुस्तके हैं. हम
        तो कॉसिश करके हार गये. आप बता दीजिए कहाँ
        मिलेगी. यदि आप मेरी बात करे तो जहाँ मैं बुलाया
        गया हूँ उनकी पुस्तके मेरे पास हैं. अश्विन शर्मा की
        अभी हाल ही मे हुए लोकार्पण की दोनो पुस्तके मेरे
        पास हैं. पुस्तक विक्रेता भी पूरे कमर्शियल हैं ओर उनसे
        ज़्यादा पुस्तक प्रकाशक हैं जो लेखक की किताब अपनी शर्तो
        पर छापते है उनके भी गुरु साहित्य के पी. आर. ओ हैं जो लेखक.
        को इस भरम मे रखते हैं की आपकी पुस्तक सरकारी vacnalay
        मे लगवा देगे. हमारे यॅन्हा लेखक की दशा उस मजदूर जैसी
        है जिसे लिखने के चार आने मिलते हैं ओर छापने वाले को
        बारह आने. वंदना शर्मा ओर लीना महलोट्रा अच्छा लिख रही
        हैं मगर इनका कलाम आवाम तक भी सही तरीके से पहुचना bhi
        चाहिए. इस सम्बन्द मे मेरे योग्य सेवा हो तो बताए.

        Basant Vyas गोविंद जी आपकी बात सही है की बेटा ही बाप
        का सम्मान नही करेगा तो कोन करेगा, मगर उसके
        लिए जा निसार अख़्हत्तर होना ज़रूरी है जिनके बेटे
        जावेद अख़्हत्तर हैं. पाव उसी के छूने चाहिए जो उसके
        लायक हो. पुरषकार का यही पॅमाना है तो साहू शांति
        प्रसाद जैन को ज्ञान पीठ कभी का मिल गया होता.

        Basant Jaitly मैंने पहले ही कहा कि मास्टर ही नहीं पढते, ९५ प्रतिशत छात्र भी पास बुक्स ही पढ़ रहे हैं.बुक वर्ल्ड में सारी पुस्तकें नहीं हो सकतीं हालाकि उन्होंने मुझे अनेक पुस्तकें न होने पर भी अलग से मंगाकर उपलब्ध कराई हैं.सारी पुस्तकें कहीं भी नहीं हो सकतीं.लेकिन ऐसा मेरे साथ नहीं हुआ कि मैंने कोई पुस्तक खोजी और मुझे कहीं नहीं मिली. यह अलग बात है कि कई बार नेट से मंगानी पडी. कई पुरानी पुस्तकें पी.डी.एफ. में नेट से डाउनलोड करनी पड़ीं लेकिन ९० प्रतिशत से अधिक किताबें मिलीं. यह बात अलग है कि लेखक किसके शिकार हैं.खास तौर पर मेरे जैसे कविता लिखने वाले को तो प्रकाशक ही मिल जाए तो बहुत है. अक्सर लेखक को चार आने तो छोडिये धेला भी नहीं मिलता. मैं पुस्तक खरीदने के सन्दर्भ में आपकी नहीं सामान्य लोगों की बात कर रहा था और मैं जानता हूँ कि मैं गलत नहीं हूँ. रही कविता की बात तो आम आदमी की कविता में रूचि वैसे भी कम रही है तो कवि कोई भी हो वह अवाम तक मुश्किल ही पहुंचता है भले ही उसे जनकवि का तमगा क्यों ना दे दिया जाए. ज़रूरी नहीं कि आप भी ऐसा ही सोचते हों कविता के मामले में.अंत में मेरे सहनाम मित्र मैं नहीं जानता कि आप क्या सेवा कर सकते हैं या किस सेवा की बात कर रहे हैं.अगर जान सकूं तो ठीक रहेगा.

        Prem Chand Gandhi इस मसले पर एक स्‍पष्‍टीकरण जरूरी है और वो यह कि पुरस्‍कृत पिताजी मजहबी किताबों के लेखक के रूप में जाने जाते हैं, साहित्‍यकार के तौर पर नहीं।… पुरस्‍कारों की सारी राजनीति से मैं भी उतना ही परिचित हूं जितने बाकी रचनाकार। खुद भी एकाधिक बार निर्णायक रह चुका हूं। लेकिन मेरे कहने का मूल मंतव्‍य यह था कि यह जो प्रक्रिया चल रही है, वह कहां जाकर समाप्‍त होगी… बिना गवर्निंग कौंसिल के पुरस्‍कारों की घोषणाएं हो रही हैं। जिन्‍हें दो साल पहले पुरस्‍कार घोषित किये गये, उन्‍हें अब तक पुरस्‍कृत नहीं किया गया। ऊपर से आनन-फानन में अमृत पुरस्‍कारों की वर्षा होती है। ऐसा लगता है कि नियम, कायदे, नैतिकता सब कुछ ताक पर रख दिए गए हैं। सब अपनी मर्जी के मालिक बने हुए हैं। यह किस लोकतांत्रिक समाज की कला-संस्‍कृति है।

        Ashutosh Joshi मुखोटा धम्भ बन स्वयं अकड़ा
        हुआ आहत विस्वास स्वयं श्रीहत पासो से
        कहू इसको नहीं धोखा
        नहीं युग को जगाऊ क्या
        बताओ चुप रहू केसे !!

        Basant Jaitly अगर ऐसा है तो यह पुरस्कार नितांत अनुचित है. वैसे मुझे भी पुरस्कारों पर भरोसा नहीं है और इसकी राजनीति से भी मैं परिचित हूँ. एक बात और कह दूं — हालाकि मुझे कोई पुरस्का कभी मिलने की संभावना नहीं है लेकिन यह मैं तय कर चुका हूँ कि यदि जीवन में कोई अवसर आया तो कोई भी सरकारी पुरस्कार मैं नहीं स्वीकार करूँगा लेकिन खुदा गंजे को नाखून देगा तभी तो ऐसा होगा.

        Abhishek Goswami लोकतन्त्र मे विश्वास रखने वाला तथाकथित प्रगतिवादी वामपंथी समुदाय भी इस 'फेवरिस्म' (पक्षवादिता) से अछूता नहीं है। ……अफसोस…..चहुंओर घटाटोप है।

        Basant Jaitly अछूता कोई नहीं है यही अधिक कष्ट की बात है.

        Basant Vyas जेटली साहिब, मेरे योग्य सेवा का अर्थ सिर्फ़
        ये था की नये लेखको की रचनाओ कोजनता तक किस तरहा
        पहुचाया जाए. आप जानते हैं मैं कुछ हद तक भगवान की दया
        से इसके योग्ग हूँ की साहित्य की लेखन मे ना सही ओर तरीके
        से तो सेवा कर ही सकता हूँ.

        Basant Jaitly अरे बाबा, मेरे जानने का क्या ? मैं तो चाहता था कि दूसरे भी जानें इसलिए उकसा रहा था कि कुछ अतिरिक्त बोलो तो मेरे अलावा दूसरे भी जान लें. अब सब तक तो मेरी पहुँच नहीं है ना तो इसके लिए फेसबुक सही माध्यम है. लेकिन तुम भी पक्के हो ना मेरे उकसाने से भी उकसे नहीं. ठीक है अब मुझे ही तुमसे कुछ सेवा लेनी होगी दूसरों के फायदे के लिए. ज़रूरत पडने पर पकड़ लूँगा.अपनी बात याद रखना और भूलना चाहोगे तो अब भूलने नहीं दूंगा. तुम भी मुझे जानते हो एक लंबे अरसे से 🙂

        Aar Ravi बेट्टा न मारी लूंगटी, बाप गोलंदाज…बाबाजी धूणी तपो हो ? कहो, भाया काय जाणै है …बाबाजी बछड़ा घेरो .. कह बाबा जी , बछड़ा घेरता तो स्यामी क्यूं होता..

        Basant Vyas रवि जी, आपको शायद मालूम नही है की जेटली साहिब
        से मेरा बहुत पुराना परिचय है व मेरा निक नेम बाबा है
        अधिकांश लोग मुझे बाबा के नाम से ही बुलाते हैं. इसलिए
        उन्होने बाबा के नाम से सम्भोधित किया है. बाबा नाम मे मैं
        भी ज़्यादा आत्मीयता महसूस करता हूँ.

        DrSagar Jnu dukhad……………

        Govind Mathur यदि पिता का कोई साहित्यिक योगदान नहीं है तो ये बिल्कुल गलत निर्णय है , इसका विरोध होना चाहिए . @ बसंत & बसंत , जिन लोगों कि पढ़ने में रुचि होती है वह किताबें ढूंढ लेता है. सभी प्रकाशित किताबें न तो पढ़ी जा सकती है और न ही पढ़ने योग्य होती है.

        Basant Jaitly ‎@Govind Mathur — maine bhi to yahi kaha hai govind ki agar padhanee ho to pustak mil hi jaati hai lekin har pustak ko na to dhoondhane ki zaroorat hai aur na padhne ki lekin jahaan tak lokaarpan ka svaal hai to main aise kaaryakram me jaata hi nahin jahaan mujhe pustak khareedni na ho 🙂

        Anju Sharma सचमुच पुरस्कार तो अंधे की रेवड़ी हो गए हैं……

        Durgaprasad Agrawal बात पुरस्कार से शुरू होकर पुस्तक तक पहुंच गई. यह भी अच्छा ही हुआ. Basant Vyas जी, यह एक कड़वी सच्चाई है कि हिंदी में किताबें कम बिकती हैं. एक दुश्चक्र बन गया है कि कम सुलभ होती हैं और कम बिकती हैं. अगर हम लोग ज़्यादा खरीदने लगेंगे तो मिलने भी लगेंगी. Basant Jaitly जी ने सही कहा है कि जितनी मेहनत हम टीशर्ट तलाश करने में करते हैं, उतनी किताब तलाश करने में नहीं. वैसे मेरा तो अनुभव यही रहा है कि जिस किताब को मैंने पढ़ना या खरीदना चाहा है वह मुझे मिल गई है. इधर फ्लिपकार्ट वगैरह से भी काफी सुगमता हो गई है. Premchand Gandhi ने जो कहा है वह अगर सही है (और कोई वजह नहीं है कि वे सही न कहें) तो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. अच्छा हो वे महबूबुर्रहमान साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर थोड़ा विस्तार से लिखें.

        Shastri Kosalendradas Dekhte chalo kya kya hota hai!!!!!

        Prem Chand Gandhi एक बात मैं फिर साफ कर देना चाहता हूं कि मेरा इस मसले से कोई व्‍यक्तिगत लेना-देना नहीं है। लेकिन एक लेखक होने के नाते ऐसे सरकारी सांस्‍कृतिक निर्णयों पर प्रश्‍न और बहस करने का जो लोकतांत्रिक अधिकार है उसी के तहत अपनी बात कह रहा हूं। मैं दोनों पिता-पुत्र से अपरिचित हूं। मुझे तो उर्दू के लेखक-मित्रों ने ही सारा सच बताया है और कहा है कि अकादमी अध्‍यक्ष के पिताजी दीनी-मजहबी किताबें लिखते रहे हैं। … बात संबंधों की नहीं, बात यह है कि बिना गवर्निंग कौंसिल के प्रदेश में अकादमियां अपनी मनमानी कर रही हैं। पहले जब बिना अध्‍यक्षों के अकादमियां चल रहीं थीं तो अकादमी का प्रशासनिक ढांचा अपने मन से काम कर रहा था। अब जब अकादमियों में अध्‍यक्ष आ गये हैं तो वे अपनी मरजी का राज चला रहे हैं। … एक अध्‍यक्ष ने तो उम्र को ही सम्‍मान का आधार मानकर अपने मनचाहे बुजुर्गों को मुख्‍यमंती से सम्‍मानित करवा दिया… जबकि उसी अकादमी में दो साल से पुरस्‍कृत लेखक अब तक सम्‍मान की बाट जोह रहे हैं। … उर्दू अकादमी ने बिना गवर्निंग बॉडी के पुरस्‍कार घोषित कर दिये हैं, जिसमें सबसे हास्‍यास्‍पद बात सब जान ही गये हैं। …. ऐसा लगता है कि प्रदेश में कला'संस्‍कृति के नाम पर ऐसी मनमर्जी का राज है कि गोविंदा की फिल्‍म का गाना याद आ रहा है…. मैं चाहे ये करुं…मैं चाहे वो करुं…मेरी मरजी… एक 'अ-शोक-ग्रस्‍त सरकार' में आखिर यही होना था कला-संस्‍कृति का हश्र…. दुखद है लेकिन सत्‍य है….

        Basant Jaitly मैं सहमत हूँ और जानता हूँ कि आपको ही नहीं हममे से किसी को भी कोई व्यक्तिगत विद्वेष नहीं है इन सज्जन के साथ. हम इन्हें जानते तक नहीं हैं लेकिन अगर कुछ गलत लगता है तो उसके बारे में बोलना गलत नहीं है और न हो सकता है.

        Kavita Vachaknavee छोटी से छोटी स्थानीय और संकायीय प्रतियोगिता तक में यह नियम सबसे पहले लिखा होता आया है कि संस्था से जुड़े अथवा उनके परिवारीजन इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते। हम तो यही जानते आए हैं।

        श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी Shame on an individual as well as on the system

        Prem Chand Gandhi ‎Kavita Vachaknavee जी, लेकिन जब कोई यह तय ही कर ले कि अंतत: पुरस्‍कार यहीं दिया जाना है तो सारे नियम-कायदे ताक पर रख दिये जाते हैं।…

        Basant Vyas अग्रवाल साहिब, किताबे कॅन्हा तलाश करे. टी शर्ट तो
        हर मोल मे मिल जाती है, मगर नये लेखको की पुस्तके
        हर कोई रखता भी नही. सबसे पहले ये पूछता है की प्रकाशक
        का नाम बताइए. सर, वैसे भी कविताये लोग कम पढ़ते हैं.
        जितने भी पुस्तक मेले होते हैं उनमे जॉब ओरियेनटेड ,व
        कंप्यूटर आदि पर ज़्यादा किताबे होती हैं. नये पुस्तक प्रेमिओ
        मे अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ने वाले अधिक हैं. वो शिव खेड़ा, चेतन भगत
        अरुंधती राय को ज़्यादा अहमियत देते हैं. ये सब देख कर प्रकाशक
        घाटे का सोदा क्यो करेगा. कविताए तो अब सिर्फ़ पुरस्कारो के लिए
        रह गई हैं.

        Prem Chand Gandhi बाबा, बात इतनी आसानी से टालने वाली भी नहीं कि प्रकाशक विक्रेता पर मामला टरका दिया जाए… हिंदी के अधिकांश प्रकाशक झूठ बोलते हैं… उनकी कविता की किताब की चो हजारों प्रतियां बिक जाएं, वो कवि को बताते तक नहीं कि किताब कहां खरीदी गई है।

        Basant Jaitly कविताये लोग कम पढ़ते हैं. नये पुस्तक प्रेमिओ
        मे अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ने वाले अधिक हैं. वो शिव खेड़ा, चेतन भगत
        अरुंधती राय को ज़्यादा अहमियत देते हैं — इन दोनों बातों से मैं सहमत हूँ, जयपुर के पुस्तक मेला भी एक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं हैं यह भी सही है लेकिन यह भी सही है कि बहुतेरे लोग पुस्तक ढूंढ ही लेते हैं. यह लगन भी कम है, कम होती जा रही है.अब मेरी बात भी कुछ तो मानने लायक है बाबा.

        Prem Chand Gandhi अब तो दोनों बाबाओं की माननी होगी…

        Shrawan Kumar पुरस्कृत पुस्तक का नाम भी तो होगा बिना पढ़े निष्कर्ष कैसे दिया जाए

        Basant Jaitly यह भी सही है कि प्रकाशक कविता कि किताबें बेच लेते हैं.हाँ, छापने में नाटक करते हैं ताकि पैसा कवि दे, उनसे मांगे नहीं.

        Basant Vyas प्रेम जी, आपने जो कहा वही बात मैं कह रहा हूँ
        प्रकाशक ही लेखको के माइ बाप हो रहे हैं. बाढ़ ही
        खेत को खाये तो आप ओर हम क्या कर सकते हैं
        लेखक तो सिर्फ़ लिख सकते हैं मार्केटिंग उनके बस की
        बात नही है. इस विशय पर सब को संगठित हो कर
        विचार करना चाहिए. लेखको के शोषण पर लगाम लगनी
        आवश्यक है.

        Basant Jaitly ऐसा करो कि एक सहकारी प्रकाशन संस्था बना डालो- कष्ट यही है कि कहीं उसका हश्र भी राजेन्द्र यादव के अक्षर प्रकाशन सा ना हो जाए लेकिन अगर कुछ करना है तो जोखिम भी लेना ही होगा.

        Basant Vyas जैटली साहिब,लॉटरी पाने के लिये टिकट तो खरीदना
        ही होगा. हज़ारो मील का सफ़र तय करने के लिए
        एक कदम तो उठाना ही पड़ता है मुझे लगता है की प्रेम जी
        भी ये सब पढ़ कर थक गये होगे इसलिये इस बहस को
        यही विराम देना चाहिए.

        Yash Goyal wait you will see another "jodi breaker" of father and son in one of the academies. I keep finger crossed.

        Basant Jaitly मैं कोशिश करने के पक्ष में हूँ. लेकिन शायद बहस वाकई ज्यादा लंबी हो गयी है इसलिए मिलकर कुछ सोचते हैं. यह विशवास है कि प्रेम जी भी हमसे बाहर नहीं रह सकते.

        Prem Chand Gandhi मैं कहां बाहर हूं… लेकिन लेखकों को संगठित करना सबसे मुश्किल काम है… पाठकों को संगठित करा जाये तो मामला बन सकता है… साहित्‍य को बाजार से मुक्‍त करने की कोशिश हो… लेखक खुद जब पैसे देकर किताब छपवा सकते हैं तो अपना ही प्रकाशन क्‍यों ना करे… विक्रेता को किताब दे, बिकने पर पैसे ले… लेकिन मुफ्त में किसी को ना दे…

        Manoj Pandey पितर ऋण भी कोई चीज होती है भाई

प्रेमचंद गांधी के फेसबुक वॉल से साभार

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